
हिंदू धर्म में प्रत्येक दिन किसी न किसी देवता को समर्पित होता है। गुरुवार का दिन देवताओं के गुरु, बृहस्पति देव (भगवान विष्णु) को समर्पित है। ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से बृहस्पतिवार का व्रत रखता है और कथा पढ़ता है, उसके जीवन से दरिद्रता दूर हो जाती है और घर में सुख-संपत्ति का वास होता है। आइए, विस्तार से जानते हैं बृहस्पतिवार की वह पौराणिक कथा जिसने लाखों लोगों के जीवन में विश्वास और समृद्धि का संचार किया है।
एक प्रतापी राजा और उसकी अभिमानी रानी की कथा
प्राचीन काल में एक बहुत ही प्रतापी और परोपकारी राजा राज्य करता था। वह अत्यंत धनवान और दयालु था। वह हर गुरुवार को व्रत रखता था और गरीबों की सहायता करता था। लेकिन उसकी रानी इसके बिल्कुल विपरीत थी। रानी को दान-पुण्य करना बिल्कुल पसंद नहीं था और वह राजा के इस दयालु स्वभाव से चिढ़ती थी। वह अक्सर कहती थी कि राजा सारा धन लुटा रहे हैं।
एक बार की बात है, राजा शिकार खेलने जंगल गए हुए थे। तभी बृहस्पति देव एक साधु का रूप धारण करके महल के द्वार पर आए और भिक्षा मांगी। उस समय रानी महल के आंगन में सफाई कर रही थी। जब साधु ने भिक्षा मांगी, तो रानी ने चिढ़कर कहा, “हे साधु महाराज! मैं इस दान-पुण्य और सफाई के कामों से तंग आ चुकी हूँ। कृपा करके मुझे कोई ऐसा उपाय बताएं जिससे यह सारा धन नष्ट हो जाए और मैं शांति से रह सकूं।”
साधु का मशवरा और रानी की भूल
साधु के रूप में आए बृहस्पति देव रानी की बात सुनकर हैरान रह गए। उन्होंने रानी को समझाने की कोशिश की, “पुत्री! धन तो लक्ष्मी का रूप है, इसे कोई क्यों नष्ट करना चाहेगा? यदि तुम्हारे पास अधिक धन है, तो इसे भूखों को भोजन कराने, प्याऊ लगवाने और धर्मशालाएं बनवाने में लगाओ। इससे तुम्हें स्वर्ग की प्राप्ति होगी।”
लेकिन रानी अपनी जिद पर अड़ी रही। तब साधु ने कहा, “यदि तुम्हारी यही इच्छा है, तो जैसा मैं कहता हूँ वैसा ही करो। आने वाले बृहस्पतिवार को तुम घर को गोबर से लीपना, अपने बाल धोना, राजा से हजामत बनवाने को कहना और भोजन में मांस-मदिरा का प्रयोग करना। ऐसा सात बृहस्पतिवार करने से तुम्हारा समस्त धन नष्ट हो जाएगा।”
रानी ने ठीक वैसा ही किया। केवल तीन-चार बृहस्पतिवार बीतते-बीतते राजा का सारा खजाना खाली हो गया। राजा की स्थिति ऐसी हो गई कि उसके परिवार को दो वक्त की रोटी के लिए तरसना पड़ा।
निर्धनता का दंश और आत्म-बोध
जब राजा बहुत गरीब हो गया, तो वह काम की तलाश में दूसरे देश चला गया। यहाँ रानी और उसकी दासी दाने-दाने को मोहताज हो गईं। एक बार जब सात दिनों तक उन्हें खाना नहीं मिला, तो रानी ने अपनी दासी को अपनी बहन के पास भेजा, जो बहुत धनवान थी। लेकिन वहां भी दासी को अपमानित होकर खाली हाथ लौटना पड़ा।
दासी बहुत दुखी थी। रास्ते में उसे वही साधु महाराज फिर मिले। उन्होंने दासी को सारा हाल पूछा। दासी ने रोते हुए अपनी व्यथा सुनाई। तब साधु ने कहा, “पुत्री! यह सब रानी के अहंकार और दान के प्रति अनादर का फल है। तुम रानी से कहो कि वह फिर से बृहस्पतिवार का व्रत प्रारंभ करे। चने की दाल और गुड़ से बृहस्पति देव की पूजा करे और कथा सुने। इससे सब ठीक हो जाएगा।”
व्रत का प्रभाव और सुखों की वापसी
दासी ने घर आकर रानी को सब बताया। पहले तो रानी तैयार नहीं हुई, लेकिन भूख और लाचारी ने उसे झुकने पर मजबूर कर दिया। रानी ने पड़ोसियों से थोड़ी चने की दाल और गुड़ मांगकर व्रत किया। जैसे ही रानी ने पूरी श्रद्धा के साथ बृहस्पतिवार की कथा सुनी और भगवान विष्णु का ध्यान किया, चमत्कार होने लगा।
दूर देश में गए राजा को वहां के राजा ने बहुत सम्मान दिया और उसे बहुत सारा धन देकर विदा किया। घर लौटते ही राजा ने देखा कि रानी अब बदल चुकी थी। वह अब अहंकारी नहीं थी और हर गुरुवार को नियमपूर्वक व्रत रखती थी। देखते ही देखते राजा का महल फिर से धन-धान्य से भर गया। बृहस्पति देव की कृपा से उनका खोया हुआ वैभव वापस लौट आया।
बृहस्पतिवार व्रत की विधि (Vrat Vidhi)
यदि आप भी अपने जीवन में सुख और शांति चाहते हैं, तो बृहस्पतिवार के दिन यह विधि अपनाएं:
- प्रातःकाल स्नान करके पीले वस्त्र धारण करें।
- भगवान विष्णु या बृहस्पति देव की प्रतिमा के सामने घी का दीपक जलाएं।
- पूजा में पीले फूल, चने की दाल, मुनक्का और गुड़ का भोग लगाएं।
- केले के वृक्ष की पूजा करें और वहां जल अर्पित करें।
- इस दिन सिर नहीं धोना चाहिए और न ही नमक का सेवन करना चाहिए। पीले भोजन (जैसे बेसन के लड्डू या पीले चावल) का सेवन करें।
बृहस्पतिवार की यह कथा हमें सिखाती है कि धन का अहंकार कभी नहीं करना चाहिए और सदैव परोपकार के मार्ग पर चलना चाहिए।
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