
मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ समाज का वह दर्पण हैं, जिसमें आज भी हम अपनी कुरीतियों और मानवीय संवेदनाओं को साफ़ देख सकते हैं। उनकी सुप्रसिद्ध कहानियों में से एक ‘दूध का दाम’ (Doodh Ka Daam) न केवल जातिवाद पर चोट करती है, बल्कि यह मातृत्व के उस शोषण को भी दर्शाती है, जिसे समाज अक्सर अनदेखा कर देता है।
बाबू महेशनाथ के घर खुशियाँ और भूंगी का आगमन
कहानी की शुरुआत बाबू महेशनाथ के घर से होती है, जहाँ वर्षों के इंतजार के बाद एक पुत्र का जन्म हुआ है। पूरे घर में जश्न का माहौल है, मंगल गीत गाए जा रहे हैं और दान-पुण्य हो रहा है। लेकिन इस खुशी के बीच एक समस्या खड़ी होती है। बाबू साहब की पत्नी, यानी मालकिन, काफी कमजोर हैं और उनके पास इतना दूध नहीं है कि वह बालक का पेट भर सकें।
ऐसे में ‘भूंगी’ को बुलाया जाता है, जो उसी गाँव की एक ‘भंगी’ (दलित) परिवार की महिला है। भूंगी का भी अपना एक छोटा बच्चा है जिसका नाम ‘मंगल’ है। बाबू साहब के बेटे सुरेश को पालने-पोसने की जिम्मेदारी भूंगी पर आ जाती है। वह दिन-रात सुरेश को अपना दूध पिलाती है और उसे एक माँ की तरह दुलारती है।
ममता और सामाजिक भेदभाव का विरोधाभास
यहाँ प्रेमचंद एक बड़ा सवाल खड़ा करते हैं। एक तरफ जहाँ भूंगी का दूध बाबू साहब के वारिस के लिए अमृत के समान है और उसे पवित्र माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर भूंगी खुद समाज की नजरों में अछूत है। जिस बच्चे को वह अपना खून-पसीना एक करके पाल रही है, उसी समाज में उसे ऊंचे स्थान पर बैठने की अनुमति नहीं है।
भूंगी का अपना बेटा, मंगल, उपेक्षित रह जाता है। उसे वह ममता और वह पोषण नहीं मिल पाता जिसका वह हकदार था, क्योंकि उसकी माँ का दूध ‘बाबू साहब’ के बेटे की संपत्ति बन चुका था। यह एक माँ का त्याग नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवस्था द्वारा किया गया एक मजबूर सौदा था।
समय का क्रूर प्रहार और मंगल की बेबसी
समय बीतता है और सुरेश बड़ा होने लगता है। दुर्भाग्यवश, एक महामारी के दौरान भूंगी और उसके पति की मृत्यु हो जाती है। अब नन्हा मंगल अनाथ हो गया है। जिस घर के वारिस को उसकी माँ ने अपने दूध से सींचा था, उसी घर के बाहर मंगल अब एक लावारिस कुत्ते की तरह जीवन जीने को मजबूर है।
वह बाबू महेशनाथ के दरवाजे पर पड़ा रहता है। उसे जूठन दी जाती है, वह भी दूर से फेंककर, ताकि कोई उसे छू न ले। सुरेश और उसके दोस्त मंगल के साथ खेलते तो हैं, लेकिन उसे हमेशा अपनी दूरी याद दिलाई जाती है। वह बालक जो कभी अपनी माँ की गोद में सुरेश के साथ खेलता था, आज उसी सुरेश के घर के सामने एक ‘अछूत’ बनकर रह गया है।
‘दूध का दाम’: एक कड़वा सच
कहानी का चरमोत्कर्ष तब आता है जब मंगल को भूख लगती है और उसे खाने के लिए मिट्टी के बर्तन में जूठन दी जाती है। मंगल उस अपमान को महसूस करता है, लेकिन पेट की आग उसे सब कुछ सहने पर मजबूर कर देती है। उसे वह दिन याद आते हैं जब उसकी माँ उसे बताती थी कि उसने सुरेश को दूध पिलाया है।
मंगल सोचता है कि क्या यही उसकी माँ के ‘दूध का दाम’ है? क्या उसकी माँ ने अपनी ममता और सेहत इसलिए दांव पर लगाई थी कि उसका बेटा एक दिन उसी दरवाजे पर जूठन के लिए तरसे? प्रेमचंद यहाँ समाज के उस पाखंड को उजागर करते हैं जो सेवा तो ‘नीची जाति’ से लेना चाहता है, लेकिन उन्हें इंसानियत का दर्जा देने से कतराता है।
निष्कर्ष
‘दूध का दाम’ मात्र एक कहानी नहीं है, बल्कि यह उन हजारों ‘भूंगियों’ की व्यथा है जिनके श्रम और सेवा पर यह समाज खड़ा है, लेकिन बदले में उन्हें केवल तिरस्कार मिलता है। आज के दौर में भी, भले ही छुआछूत कानूनी रूप से खत्म हो गई हो, लेकिन मानसिक रूप से यह भेदभाव आज भी कहीं न कहीं जीवित है। मुंशी प्रेमचंद की यह कहानी हमें आत्ममंथन करने के लिए मजबूर करती है।
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