
भूमिका: मुंशी प्रेमचंद का कालजयी व्यंग्य
मुंशी प्रेमचंद की लेखनी की यह विशेषता रही है कि वे समाज की कुरीतियों और मानवीय स्वभाव की विसंगतियों को बहुत ही सरल और रोचक ढंग से प्रस्तुत करते हैं। उनकी कहानी ‘सत्याग्रह’ (Satyagrah) भी एक ऐसी ही रचना है, जो राजनीति, धर्म और व्यक्ति की निजी लालसाओं के बीच के द्वंद्व को हास्य और व्यंग्य के साथ उकेरती है। इस कहानी के केंद्र में हैं पंडित मोटेराम शास्त्री, जो प्रेमचंद के सबसे मनोरंजक पात्रों में से एक हैं।
प्रशासन की चाल और मोटेराम शास्त्री का आगमन
कहानी उस समय की है जब भारत में स्वतंत्रता आंदोलन अपने चरम पर था। असहयोग आंदोलन की लहर गाँव-गाँव, शहर-शहर फैल रही थी। बनारस में कांग्रेस का एक बड़ा अधिवेशन होने वाला था, जिससे स्थानीय प्रशासन और पुलिस के अधिकारी बेहद परेशान थे। वे किसी भी कीमत पर इस अधिवेशन को रोकना चाहते थे।
प्रशासन को डर था कि अगर लोग बड़ी संख्या में एकत्रित हुए तो शांति व्यवस्था बनाए रखना मुश्किल हो जाएगा। तभी डिप्टी साहब के दिमाग में एक तरकीब सूझी। उन्होंने सोचा कि क्यों न धर्म और परंपरा का सहारा लेकर इस आंदोलन को रोका जाए। इस काम के लिए उन्हें एक ऐसे व्यक्ति की तलाश थी जो लोगों को प्रभावित कर सके और ‘सत्याग्रह’ के नाम पर उन्हें सभा में जाने से रोके। उनकी खोज पंडित मोटेराम शास्त्री पर आकर खत्म हुई।
पंडित मोटेराम शास्त्री: भोजन और सिद्धांत
पंडित मोटेराम शास्त्री काशी के विद्वान थे, लेकिन उनकी विद्वत्ता से अधिक चर्च उनके भोजन प्रेम के थे। वे पक्के ‘पेटू’ थे और मालपुए, रबड़ी और पकवानों के लिए कुछ भी कर सकते थे। डिप्टी साहब ने पंडित जी को बुलाया और उन्हें लालच दिया कि अगर वे कांग्रेस की सभा के सामने धरने पर बैठ जाएं और भूख हड़ताल (सत्याग्रह) का नाटक करें, तो उन्हें भारी इनाम और दक्षिणा दी जाएगी।
मोटेराम जी पहले तो हिचकिचाए, क्योंकि भूख हड़ताल करना उनके स्वभाव के बिल्कुल विपरीत था। वे तो दिन में चार बार भरपेट भोजन करने वाले व्यक्ति थे। लेकिन जब दक्षिणा की मोटी रकम और पकवानों की व्यवस्था का वादा किया गया, तो वे तैयार हो गए। उन्होंने सोचा कि ‘सत्याग्रह’ भी करेंगे और बाद में पेट पूजा भी हो जाएगी।
सत्याग्रह की शुरुआत और भूख का तमाशा
अगले दिन, पंडित मोटेराम शास्त्री अपने पूरे दलबल के साथ सभा स्थल के मुख्य द्वार पर जम गए। उन्होंने घोषणा कर दी कि जब तक लोग सभा में जाना बंद नहीं करेंगे, वे अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगे। लोग पंडित जी का सम्मान करते थे, इसलिए वे धर्मसंकट में पड़ गए।
जैसे-जैसे समय बीतने लगा, पंडित जी की हालत बिगड़ने लगी। लेकिन यह हालत भूख से नहीं, बल्कि भोजन की याद से बिगड़ रही थी। उनके दिमाग में बार-बार रबड़ी और लड्डुओं के विचार आ रहे थे। प्रशासन ने उनके लिए गुप्त रूप से भोजन की व्यवस्था की थी, लेकिन वे उसे सार्वजनिक रूप से नहीं खा सकते थे क्योंकि उनका ‘सत्याग्रह’ चल रहा था।
भूख और लालसा के बीच संघर्ष
कहानी का सबसे रोमांचक मोड़ तब आता है जब पंडित जी को खुशबू आने लगती है। उनके विरोधी, जो जानते थे कि पंडित जी की कमजोरी क्या है, उन्होंने वहीं पास में हलवाइयों की दुकानें सजवा दीं। गरम-गरम समोसे और इमरती की खुशबू पंडित जी के नथुनों से टकरा रही थी।
पंडित मोटेराम शास्त्री का संकल्प डगमगाने लगा। उनके अनुयायी उन्हें धैर्य रखने को कह रहे थे, जबकि उनका मन चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा था कि यह सत्याग्रह खत्म करो और पत्तल उठाओ। प्रेमचंद ने यहाँ पंडित जी की मानसिक स्थिति का बहुत ही सजीव वर्णन किया है। पंडित जी को लग रहा था कि वे इस भूख हड़ताल के चक्कर में कहीं अपने प्राण ही न गँवा दें।
निष्कर्ष: एक व्यंग्यात्मक अंत
अंततः, पंडित मोटेराम शास्त्री का भोजन प्रेम उनके ‘सत्याग्रह’ पर भारी पड़ गया। जब उनके सामने लजीज पकवानों की थाल सजाकर रखी गई, तो वे खुद को रोक नहीं पाए। उन्होंने अपने सिद्धांतों और प्रशासन के वादों को दरकिनार करते हुए भोजन पर धावा बोल दिया। उनका सत्याग्रह एक बड़े हास्य के साथ समाप्त हुआ।
मुंशी प्रेमचंद की यह कहानी हमें बताती है कि किस प्रकार स्वार्थ और व्यक्तिगत इच्छाएं कभी-कभी बड़े-बड़े सिद्धांतों को भी बौना कर देती हैं। ‘सत्याग्रह’ केवल एक कहानी नहीं, बल्कि मानवीय स्वभाव की परतों को खोलने वाला एक आइना है।
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