
भारतीय साहित्य के पन्नों में जब भी मानवीय संवेदनाओं और ग्रामीण परिवेश की बात आती है, तो मुंशी प्रेमचंद का नाम सबसे ऊपर आता है। प्रेमचंद ने अपनी लेखनी से समाज के उन कोनों को छुआ है, जहाँ आज भी भावनाएँ जीवित हैं। इसी परंपरा को जीवंत करते हुए ‘ममता’ की यह कहानी हमें निस्वार्थ प्रेम और त्याग के उस शिखर पर ले जाती है, जहाँ एक माँ का हृदय धड़कता है।
गाँव की एक निस्वार्थ मूरत
बनारस के पास बसे एक छोटे से गाँव ‘अमृतपुर’ में एक बुढ़िया रहती थी, जिसे सब प्यार से ‘ममता’ कहकर पुकारते थे। उसका अपना कोई न था, लेकिन पूरे गाँव के बच्चे उसे अपनी माँ मानते थे। ममता के पास धन-दौलत के नाम पर बस एक टूटी हुई झोपड़ी और एक छोटी सी गाय थी। लेकिन उसका दिल इतना बड़ा था कि गाँव का कोई भी मुसाफिर उसके द्वार से भूखा नहीं लौटता था। वह प्रेमचंद की कहानियों के उन पात्रों जैसी थी, जो अभाव में भी मानवता का दामन नहीं छोड़ते।
ममता का कठिन संघर्ष
ममता का जीवन संघर्षों की एक लंबी दास्तान था। जवानी में ही विधवा हो जाने के बाद, उसने समाज की रूढ़ियों का सामना किया। लोग उसे डराते थे, उसे ‘अशुभ’ कहते थे, लेकिन उसने अपनी ममता को कभी मरने नहीं दिया। वह अक्सर गाँव के चौराहे पर बैठकर Moral Story सुनाया करती थी, जिससे बच्चों में अच्छे संस्कारों का बीजारोपण हो सके। उसका मानना था कि इंसान का चरित्र ही उसकी असली संपत्ति है।
एक बार गाँव में भयंकर अकाल पड़ा। कुएँ सूख गए और खेतों की दरारें कलेजा चीरने लगीं। लोग गाँव छोड़कर शहर की ओर पलायन करने लगे। लेकिन ममता ने अपनी झोपड़ी नहीं छोड़ी। उसने अपनी गाय का दूध उन कुपोषित बच्चों को पिलाना शुरू किया, जिनके माता-पिता के पास खिलाने को कुछ न था। उसकी यह सेवा किसी Dharm से कम नहीं थी।
एक शाम की घटना
उसी अकाल के दौरान, एक शाम एक थका-हारा सिपाही ममता के द्वार पर आया। वह भूखा था और प्यास से उसका कंठ सूख रहा था। ममता ने बिना सोचे-समझे अपनी अंतिम रोटी और कटोरी भर दूध उसे दे दिया। वह सिपाही वास्तव में उस इलाके के जमींदार का बेटा था, जो शिकार के दौरान रास्ता भटक गया था। ममता के इस निस्वार्थ भाव ने उस युवक का हृदय परिवर्तन कर दिया। उसे समझ आया कि असली सुकून महल के बिस्तरों में नहीं, बल्कि किसी गरीब की निःस्वार्थ सेवा में है।
प्रेम की जीत और अंतिम संदेश
ममता की कहानी हमें सिखाती है कि जीवन का अर्थ केवल अपने लिए जीना नहीं है। जब हम दूसरों के दुखों को अपना समझते हैं, तभी हम सच्चे अर्थों में इंसान कहलाते हैं। मुंशी प्रेमचंद की कहानियों की तरह, ममता का जीवन भी सादगी और उच्च विचारों का संगम था। समय बीतता गया, अकाल खत्म हुआ, लेकिन ममता की वह निस्वार्थ सेवा गाँव वालों के दिलों में हमेशा के लिए अंकित हो गई। आज भी जब गाँव में प्रेम और करुणा की बात होती है, तो ममता का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है।
हमें अपने जीवन में Romantic Story की कल्पनाओं से परे जाकर, वास्तविक जीवन की इन ‘ममताओं’ को पहचानना चाहिए। समाज का कल्याण तभी संभव है जब हम एक-दूसरे के प्रति संवेनदशील बनें।
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