
मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ भारतीय समाज का वह आईना हैं, जिसमें समाज की खूबियां और कुरीतियां दोनों साफ झलकती हैं। ‘नाग पूजा’ भी एक ऐसी ही उत्कृष्ट रचना है, जो धर्म के नाम पर पाले गए अंधविश्वास और मानवीय स्वभाव के दोहरेपन को उजागर करती है।
पंडित गोपीनाथ की अटूट श्रद्धा
पंडित गोपीनाथ गाँव के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। उनके लिए पूजा-पाठ, नियम-धर्म और रीति-रिवाज जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा थे। उनका मानना था कि देवी-देवताओं को प्रसन्न रखना ही जीवन की सार्थकता है। गोपीनाथ जी न केवल भगवान शिव के परम भक्त थे, बल्कि वे नाग देवता की पूजा में भी विशेष विश्वास रखते थे। हर साल नाग पंचमी के अवसर पर वे बड़े उत्साह से अनुष्ठान कराते थे। उनके मन में यह पक्का विश्वास था कि यदि सांपों को दूध पिलाया जाए और उनकी आराधना की जाए, तो वे कभी किसी का अहित नहीं करेंगे।
गाँव के लोग भी पंडित जी की इस श्रद्धा को देखकर उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखते थे। गोपीनाथ अक्सर लोगों को यह उपदेश देते थे कि जीव मात्र पर दया करनी चाहिए और विशेष रूप से नाग देवता का अपमान तो कभी नहीं करना चाहिए, क्योंकि वे रक्षक भी हैं और संहारक भी।
नाग पंचमी का त्यौहार और भय का साया
एक बार नाग पंचमी के दिन पंडित जी ने सुबह-सुबह पूरे घर को गंगाजल से शुद्ध किया। मिट्टी के बर्तनों में ताजा दूध मंगाया गया और घर के कोने-कोने में रखा गया ताकि नाग देवता आकर उसे ग्रहण कर सकें। पूरा वातावरण अगरबत्ती और चंदन की खुशबू से महक रहा था। गोपीनाथ जी मंत्रोच्चार कर रहे थे और उनकी धर्मपत्नी भी श्रद्धापूर्वक इस कार्य में हाथ बंटा रही थीं।
पंडित जी का मानना था कि उनके घर में नाग देवता का वास है और वे उनकी रक्षा करते हैं। लेकिन नियति का खेल भी अजीब होता है। उसी शाम जब घर में उत्सव का माहौल था, अचानक पंडित जी की पत्नी ने रसोई के अंधेरे कोने में कुछ फुफकारने की आवाज सुनी। जब उन्होंने दीपक उठाकर देखा, तो उनके होश उड़ गए। वहाँ एक विशाल काला नाग फन फैलाए बैठा था।
श्रद्धा और डर का संघर्ष
जैसे ही यह खबर पंडित गोपीनाथ तक पहुंची, उनके चेहरे की हवाइयां उड़ गईं। जिस नाग देवता की वे सुबह पूजा कर रहे थे, साक्षात सामने होने पर उनके प्रति श्रद्धा गायब हो गई और प्राणों का मोह जाग उठा। पंडित जी, जो अब तक लोगों को सांपों से न डरने और उन्हें ईश्वर का रूप मानने की सीख दे रहे थे, सबसे पहले लाठी ढूंढने लगे।
उनकी पत्नी ने घबराते हुए कहा, “स्वामी, यह क्या कर रहे हैं? आज तो नाग पंचमी है, आपने खुद कहा था कि वे देवता हैं। उन्हें लाठी से मारना क्या पाप नहीं होगा?”
पंडित जी का उत्तर बदल चुका था। उन्होंने तर्क दिया, “देवता अपनी जगह हैं, लेकिन यह प्राणी विषैला है। यदि इसने काट लिया तो धर्म और कर्म धरे के धरे रह जाएंगे। सुरक्षा सर्वोपरि है।”
पाखंड की पराकाष्ठा
पूरे घर में कोहराम मच गया। पड़ोसी भी लाठी-डंडे लेकर जमा हो गए। वह नाग, जो चुपचाप कोने में बैठा था, अब लोगों की भीड़ और शोर-शराबे से डरा हुआ था। पंडित गोपीनाथ अब तक जो प्रवचन दे रहे थे, वे पूरी तरह से बदल चुके थे। अंततः सपेरे को बुलाया गया। पंडित जी ने सपेरे को निर्देश दिया कि इसे पकड़कर कहीं दूर ले जाए या खत्म कर दे, क्योंकि यह परिवार के लिए खतरा है।
सपेरे ने जब नाग को पकड़ा और उसे टोकरी में बंद किया, तब जाकर पंडित जी के मन को शांति मिली। इसके बाद उन्होंने फिर से गंगाजल छिड़कर घर शुद्ध किया और भगवान से प्रार्थना की कि अब कोई खतरा न रहे। यहाँ प्रेमचंद जी ने बड़ी सूक्ष्मता से दिखाया है कि कैसे इंसान अपनी सुविधा के अनुसार धर्म और विश्वास की व्याख्या बदल लेता है। जब तक नाग पत्थर का था या दूर था, वह पूजनीय था; लेकिन जैसे ही वह वास्तविकता बनकर सामने आया, वह दुश्मन बन गया।
कहानी का सार
‘नाग पूजा’ कहानी केवल एक सांप और पंडित के बारे में नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज के उस खोखलेपन को दर्शाती है जहाँ हम प्रतीकों की तो पूजा करते हैं, लेकिन वास्तविकता से डरते हैं। हम दया और अहिंसा की बातें करते हैं, लेकिन जब स्वयं पर संकट आता है, तो हम अपने ही सिद्धांतों को भूल जाते हैं। प्रेमचंद की यह कहानी हमें आत्म-मंथन करने की प्रेरणा देती है कि क्या हमारी श्रद्धा वास्तविक है या केवल एक दिखावा?
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