
प्रस्तावना: धर्म और आडंबर की कशमकश
मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ समाज का वह आईना हैं, जिसमें हर युग की बुराइयाँ और अच्छाइयाँ स्पष्ट झलकती हैं। उनकी कहानी ‘झाँकी’ भी एक ऐसी ही कृति है, जो हमें धर्म के नाम पर फैले पाखंड और सच्ची भक्ति के बीच के अंतर को समझाती है। यह कहानी न केवल धार्मिक अनुष्ठानों पर सवाल उठाती है, बल्कि मनुष्य के भीतर छिपे अहंकार और वर्ग-भेद को भी बेनकाब करती है। प्रेमचंद ने इस कहानी के माध्यम से दिखाया है कि कैसे ईश्वर के मंदिर में भी ऊंच-नीच की दीवारें खड़ी कर दी गई हैं।
झाँकी का भव्य आयोजन
कहानी का केंद्र एक भव्य मंदिर है, जहाँ कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर ‘झाँकी’ सजाई गई है। पूरे नगर में धूम मची हुई है। मंदिर को रेशमी पर्दों, झिलमिलाते दीपों और सुगंधित फूलों से सजाया गया है। दूर-दूर से लोग इस दिव्य दर्शन के लिए खिंचे चले आ रहे हैं। सेठों और रईसों ने इस आयोजन में पानी की तरह पैसा बहाया है। चारों तरफ मंत्रों का उच्चारण हो रहा है और वातावरण भक्तिमय लग रहा है, लेकिन क्या वाकई वहाँ भक्ति का वास है? प्रेमचंद यहाँ व्यंग्य करते हैं कि जहाँ सजावट पर अधिक ध्यान हो, वहाँ अक्सर हृदय की सरलता लुप्त हो जाती है।
भक्ति और सामाजिक भेदभाव
जैसे-जैसे भीड़ बढ़ती है, मंदिर के द्वार पर सुरक्षा और भेदभाव का पहरा सख्त हो जाता है। एक ओर वे लोग हैं जिन्होंने दान देकर अपनी जगह पक्की कर ली है, और दूसरी ओर वे साधारण जन हैं जो घंटों से कतार में खड़े हैं। इसी भीड़ में एक दीन-हीन व्यक्ति भी है, जो केवल एक बार उस ‘झाँकी’ को देखने की लालसा रखता है। उसके लिए कृष्ण केवल भगवान नहीं, बल्कि दुखों के हरणकर्ता हैं।
प्रेमचंद ने यहाँ मानवीय स्वभाव का सूक्ष्म चित्रण किया है। मंदिर के पुजारी और व्यवस्थापक, जो खुद को ईश्वर का सेवक कहते हैं, उन निर्धन भक्तों को धक्के देकर बाहर निकाल रहे हैं। उनके लिए भक्ति से बड़ा अनुशासन और धन है। वह गरीब आदमी, जिसकी आँखों में ईश्वर के प्रति अटूट प्रेम है, इस सामाजिक अन्याय को देखकर मौन रह जाता है। उसकी मूक वेदना पाठकों के हृदय को झकझोर देती है।
मंदिर के भीतर का अंधकार
जब झाँकी के दर्शन खुलते हैं, तो लोगों की भीड़ बेकाबू हो जाती है। हर कोई सबसे पहले देखना चाहता है। धक्का-मुक्की और चिल्लाहट के बीच, मंदिर की शांति कहीं खो जाती है। सेठ जी, जिन्होंने भारी दान दिया है, सबसे आगे खड़े होकर गर्व से ईश्वर की ओर देख रहे हैं। लेकिन क्या ईश्वर का आशीर्वाद केवल धन से खरीदा जा सकता है? प्रेमचंद सवाल उठाते हैं कि जिस ‘झाँकी’ के दर्शन के लिए हृदय में करुणा न हो, वह केवल एक तमाशा बनकर रह जाती है।
भीड़ के बीच वह गरीब व्यक्ति कुचल जाता है। उसे दर्शन तो दूर, मंदिर की सीढ़ियों तक पहुँचने की भी मनाही है। उसके लिए भगवान की मूरत केवल दूर से दिखने वाली एक धुंधली परछाई है। यहाँ प्रेमचंद यह स्पष्ट करते हैं कि समाज ने भगवान को भी अपनी मिल्कियत समझ लिया है।
कहानी का मर्म और निष्कर्ष
कहानी के अंत में, जब ‘झाँकी’ समाप्त होती है, तो लोग अपने घरों को लौट जाते हैं। वे मंदिर की सुंदरता और वैभव की प्रशंसा करते हैं, लेकिन किसी ने भी उस गरीब के आंसू नहीं देखे जो द्वार पर खड़ा रह गया था। मुंशी प्रेमचंद ‘झाँकी’ के माध्यम से यह संदेश देते हैं कि वास्तविक झाँकी पत्थर की मूरत में नहीं, बल्कि मनुष्य के दयावान हृदय में होती है। यदि हम अपने भीतर की बुराइयों, ईर्ष्या और भेदभाव को नहीं त्याग सकते, तो मंदिर की सबसे भव्य झाँकी भी केवल एक भौतिक प्रदर्शन है।
यह कहानी आज के समय में भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी तब थी। आज भी धर्म के नाम पर दिखावा अधिक और संवेदनाएँ कम होती जा रही हैं। ‘झाँकी’ हमें सिखाती है कि भक्ति का मार्ग प्रेम और समानता से होकर गुजरता है, आडंबर से नहीं।
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