
मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ केवल शब्दों का संग्रह नहीं होतीं, बल्कि वे मानवीय स्वभाव और समाज की विद्रूपताओं का एक आईना होती हैं। उनकी प्रसिद्ध कहानियों में से एक ‘मनोवृत्ति’ (Mano Vritti) मनुष्य के आंतरिक नजरिये और उसके चरित्र के विश्लेषण पर आधारित है। यह कहानी हमें बताती है कि हम संसार को वैसे नहीं देखते जैसा वह है, बल्कि वैसे देखते हैं जैसे हम स्वयं हैं।
उद्यान की वह शांत शाम
कहानी की शुरुआत एक सार्वजनिक उद्यान (पार्क) के शांत और सुरम्य वातावरण से होती है। शाम का समय था और लोग अपनी थकान मिटाने के लिए यहाँ-वहाँ टहल रहे थे। उसी पार्क के एक कोने में, एक सुंदर और सजी-धजी युवती एक बेंच पर अकेली बैठी थी। उसकी आँखों में एक अजीब सा सूनापन और चेहरे पर गंभीरता थी। वह चुपचाप आने-जाने वालों को देख रही थी, लेकिन उसकी अपनी दुनिया शायद कहीं और ही बसी हुई थी।
प्रेमचंद ने यहाँ उस युवती के माध्यम से एक केंद्र बिंदु स्थापित किया है, जिसके चारों ओर समाज के अलग-अलग वर्गों की मानसिकता घूमती है।
नजरिया और इंसान की सोच
उस युवती को वहाँ अकेले बैठा देखकर वहाँ से गुजरने वाले हर व्यक्ति ने अपनी ‘मनोवृत्ति’ के अनुसार उसके बारे में एक धारणा बना ली।
सबसे पहले वहाँ से एक नवयुवक गुजरा। उसने उस युवती को देखा, उसकी सुंदरता को निहारा और मन ही मन मुस्कुराया। उसकी नजरों में वह युवती एक ‘अवसर’ की तरह थी। उसने सोचा कि शायद वह किसी के इंतजार में है या फिर किसी नए साथी की तलाश में। उस युवक की मनोवृत्ति चंचलता और कामुकता से भरी थी, इसलिए उसे उस युवती की शांति में भी एक निमंत्रण नजर आया।
उसके पीछे एक अधेड़ उम्र का संभ्रांत व्यक्ति आया। उसने युवती को देखकर अपनी नाक सिकोड़ी। उसकी मनोवृत्ति में नैतिकता का एक कड़ा मापदंड था। उसने मन ही मन सोचा, “आजकल की लड़कियों को देखो, घर-बार छोड़कर यहाँ पार्कों में बेमतलब बैठी रहती हैं। न जाने इनके माता-पिता इन्हें कैसे छूट दे देते हैं?” उस व्यक्ति के लिए वह युवती केवल एक ‘बिगड़ी हुई लड़की’ थी।
समाज की विभिन्न धारणाएँ
तभी एक साधु प्रवृत्ति का व्यक्ति वहाँ से निकला। उसने युवती को देखा और उसकी आँखों में करुणा उमड़ आई। उसने सोचा, “बेचारी कितनी दुखी लग रही है। शायद किसी बड़ी मुसीबत में है या किसी प्रियजन के वियोग में यहाँ बैठी शांत होने की कोशिश कर रही है। ईश्वर इसकी रक्षा करे।” यहाँ उसकी मनोवृत्ति दया और सहानुभूति से ओतप्रोत थी।
इस तरह, जितने लोग उतनी बातें। किसी के लिए वह एक ‘अभिसारिका’ थी, किसी के लिए ‘बेहया’ और किसी के लिए ‘बेचारी’। लेकिन हकीकत क्या थी? यह कोई नहीं जानता था और न ही कोई जानने की कोशिश कर रहा था। सब केवल अपनी-अपनी सोच का चश्मा पहनकर उसे देख रहे थे।
कहानी का मर्म और वास्तविकता
प्रेमचंद इस कहानी के माध्यम से यह समझाते हैं कि हमारी मनोवृत्ति ही हमारे संसार का निर्माण करती है। कहानी के अंत में यह रहस्य खुलता है कि वह युवती वास्तव में कौन थी। वह न तो किसी गलत इरादे से वहाँ बैठी थी और न ही वह किसी सहानुभूति की पात्र थी। वह तो बस अपने जीवन के एक महत्वपूर्ण निर्णय के बारे में शांति से सोचने के लिए उस एकांत का सहारा ले रही थी।
वह युवती अपने आप में पूर्ण थी, लेकिन समाज के अलग-अलग अंगों ने उसे अपनी मानसिक गंदगी या अपनी अच्छाई के अनुसार अलग-अलग साँचों में ढाल दिया। यह कहानी आज के दौर में भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी तब थी। हम आज भी सोशल मीडिया या सार्वजनिक स्थानों पर किसी अजनबी को देखकर उसके बारे में तत्काल एक राय बना लेते हैं, बिना यह जाने कि वह व्यक्ति किस दौर से गुजर रहा है।
निष्कर्ष
‘मनोवृत्ति’ कहानी हमें आत्म-मंथन की प्रेरणा देती है। यह हमें सिखाती है कि दूसरों के प्रति कोई धारणा बनाने से पहले हमें अपने मन को टटोलना चाहिए। हमारी सोच ही हमारे व्यक्तित्व का परिचय होती है। यदि हमारा मन साफ है, तो हमें पूरी दुनिया में अच्छाई दिखेगी, और यदि हमारे मन में विकार हैं, तो हम निर्दोषों में भी दोष ढूँढ लेंगे।
मुंशी प्रेमचंद की यह कलाकारी ही उन्हें ‘कथा सम्राट’ बनाती है, जहाँ वे एक छोटी सी घटना के माध्यम से मानव मनोविज्ञान की गहराइयों को छू लेते हैं।
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