Kamna Taru: मुंशी प्रेमचंद की एक मार्मिक रचना

Kamna Taru
मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ‘कामना तरु’ (Kamna Taru) यहाँ पढ़ें। यह कहानी मानवीय लालसा और संतुष्टि के द्वंद को दर्शाती है।

मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ केवल शब्द नहीं, बल्कि समाज का आईना होती हैं। उनकी ऐसी ही एक कालजयी रचना है ‘कामना तरु’। यह कहानी एक ऐसे विषय पर आधारित है जो आज के भौतिकवादी युग में और भी प्रासंगिक हो जाती है—मानवीय इच्छाएँ और उनकी अंतहीन दौड़। ‘कामना तरु’ का शाब्दिक अर्थ है ‘इच्छाओं का वृक्ष’।

कहानी का परिचय

यह कहानी एक गरीब ब्राह्मण की है, जिसका जीवन अभावों में बीत रहा है। प्रेमचंद जी ने बड़ी कुशलता से उसके जीवन की दरिद्रता और उसके मन में पलने वाली बड़ी-बड़ी इच्छाओं का वर्णन किया है। वह ब्राह्मण अक्सर सोचा करता था कि काश कोई ऐसी शक्ति होती जो उसकी सारी दरिद्रता को एक झटके में खत्म कर देती। उसकी कल्पनाओं का संसार बहुत बड़ा था, लेकिन वास्तविकता बहुत ही कठोर।

जादुई वृक्ष का मिलन

एक दिन वह ब्राह्मण जंगल के रास्ते से जा रहा था कि उसे एक दिव्य वृक्ष दिखाई दिया। यह कोई साधारण वृक्ष नहीं था, बल्कि साक्षात ‘कामना तरु’ था। लोक कथाओं में प्रसिद्ध है कि इस वृक्ष के नीचे बैठकर जो भी मांगो, वह तुरंत पूरा हो जाता है। ब्राह्मण को पहले तो विश्वास नहीं हुआ, लेकिन जैसे ही उसने मन में भोजन की इच्छा की, उसके सामने नाना प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन प्रकट हो गए।

उसकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा। उसने भरपेट भोजन किया और फिर विश्राम करने के लिए एक नरम बिस्तर की कामना की। पलक झपकते ही वहां एक मखमली शय्या तैयार थी। ब्राह्मण को लगा कि अब उसके जीवन के सारे दुख खत्म हो गए हैं। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा था? यहीं से प्रेमचंद जी कहानी में मनोवैज्ञानिक मोड़ लाते हैं।

इच्छाओं का अंतहीन सिलसिला

जैसे-जैसे उसकी भौतिक आवश्यकताएं पूरी होने लगीं, उसके मन का लालच बढ़ता गया। उसने धन, संपत्ति, महल और दास-दासी की कामना की। ‘कामना तरु’ ने सब कुछ प्रदान कर दिया। लेकिन जैसे-जैसे उसे वस्तुएँ मिलती गईं, उसके भीतर का संतोष गायब होता गया। वह अब और भी बड़ी चीजों के बारे में सोचने लगा। उसे डर सताने लगा कि कहीं कोई उसका यह वैभव छीन न ले।

प्रेमचंद यहाँ स्पष्ट करते हैं कि मनुष्य का स्वभाव ऐसा है कि वह जितना प्राप्त करता है, उसकी तृष्णा उतनी ही बढ़ती जाती है। वह ब्राह्मण जो कभी एक वक्त की रोटी के लिए तरसता था, अब करोड़ों की संपत्ति पाकर भी अशांत था। उसकी शांति और नींद गायब हो गई थी।

वैचारिक द्वंद और बोध

कहानी के अंत की ओर बढ़ते हुए, ब्राह्मण को यह अहसास होने लगता है कि सुख बाहर की वस्तुओं में नहीं, बल्कि मन के भीतर के संतोष में है। वह ‘कामना तरु’ के वरदान के बोझ तले दबने लगा था। उसे समझ आया कि बिना परिश्रम के प्राप्त हुई वस्तुएं आनंद तो दे सकती हैं, लेकिन गौरव और आत्म-संतुष्टि नहीं।

‘कामना तरु’ कहानी के माध्यम से प्रेमचंद ने यह संदेश दिया है कि इच्छाएं एक अग्नि के समान हैं—आप जितना इसमें घी डालेंगे, यह उतनी ही और भड़केगी। जीवन की असली सफलता अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण पाने में है, न कि उन्हें बेतहाशा बढ़ाने में।

निष्कर्ष

मुंशी प्रेमचंद की यह कहानी आज भी हमें रुककर सोचने पर मजबूर करती है। आज हम सब भी तो एक ‘कामना तरु’ की तलाश में भाग रहे हैं, चाहे वह तकनीक हो, पैसा हो या पद। लेकिन अंत में जीत उसी की होती है जो संतोष का मार्ग चुनता है।

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