Vishesh Ghoda Akbar Birbal Ki Kahani | Hindi Moral Story

Vishesh Ghoda

महान मुग़ल सम्राट अकबर के दरबार में नौ रत्न थे, जिनमें से बीरबल उनके सबसे प्रिय और बुद्धिमान सलाहकार थे। बीरबल अपनी हाजिरजवाबी, तीक्ष्ण बुद्धि और हास्य-विनोद के लिए न केवल पूरे साम्राज्य में बल्कि इतिहास में भी अमर हैं। बादशाह अकबर अक्सर बीरबल की परीक्षा लेने के लिए नए-नए और पेचीदा सवाल पूछते रहते थे। बीरबल भी अपनी बुद्धिमानी से हर बार अकबर को निरुत्तर कर देते थे। ऐसी ही एक बेहद लोकप्रिय और मनोरंजक कहानी है “विशेष घोड़ा” (Vishesh Ghoda)। आइए इस कहानी को विस्तार से पढ़ते हैं।

बादशाह अकबर की अनोखी इच्छा

एक बार की बात है, राजा अकबर अपने शाही अस्तबल (घोड़ों के रहने की जगह) का दौरा कर रहे थे। उनके साथ बीरबल भी मौजूद थे। अस्तबल में एक से बढ़कर एक सुंदर, तेज तर्रार और अरबी नस्ल के घोड़े मौजूद थे। घोड़ों की सुंदरता और उनकी विभिन्न प्रजातियों को देखकर अकबर के मन में एक शरारत सूझी। वे हमेशा की तरह बीरबल की परीक्षा लेना चाहते थे।

अकबर ने बीरबल की तरफ देखा और मुस्कुराते हुए कहा, “बीरबल, हमारे अस्तबल में बहुत से शानदार घोड़े हैं। लेकिन आज मेरे मन में एक विशेष घोड़े को पाने की इच्छा जागी है।”

बीरबल ने विनम्रतापूर्वक सिर झुकाया और पूछा, “जहांपनाह! आपके पास दुनिया के सर्वश्रेष्ठ घोड़े हैं। फिर भी आप किस तरह का घोड़ा चाहते हैं? मुझे आज्ञा दें, मैं आपकी इच्छा अवश्य पूरी करूँगा।”

अकबर ने अपनी चाल चलते हुए कहा, “बीरबल, मुझे एक ऐसा विशेष घोड़ा चाहिए, जो न तो काले रंग का हो, न सफेद रंग का, न भूरे रंग का और न ही चितकबरे (grey) रंग का हो। क्या तुम मेरे लिए ऐसा घोड़ा खोज सकते हो?”

बीरबल के सामने खड़ी हुई बड़ी चुनौती

अकबर की इस अजीबोगरीब मांग को सुनकर दरबार के अन्य लोग हैरान रह गए। सभी जानते थे कि आमतौर पर घोड़े काले, सफेद, भूरे या चितकबरे रंग के ही होते हैं। इन रंगों के अलावा किसी अन्य रंग का घोड़ा मिलना पूरी तरह से असंभव था। अकबर वास्तव में देखना चाहते थे कि बीरबल इस असंभव मांग का क्या समाधान निकालते हैं।

अकबर ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, “बीरबल, इस विशेष घोड़े को खोजने के लिए मैं तुम्हें ठीक एक सप्ताह (सात दिन) का समय देता हूँ। यदि तुम सात दिनों के भीतर ऐसा घोड़ा नहीं ला पाए, तो तुम्हें सजा दी जाएगी।”

बीरबल भांप गए कि महाराज उनके साथ मजाक कर रहे हैं और उन्हें फंसाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन बीरबल भी हार मानने वालों में से नहीं थे। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “जो आज्ञा जहांपनाह! मुझे आपकी यह शर्त मंजूर है। मैं अगले सात दिनों में आपके लिए इस विशेष घोड़े की खोज अवश्य करूँगा।”

बीरबल की खोज और सात दिनों का इंतजार

दरबार से विदा लेकर बीरबल अपने घर चले गए। उन्होंने अगले सात दिनों तक कोई काम नहीं किया। वे जानते थे कि ऐसा कोई घोड़ा इस दुनिया में मौजूद ही नहीं है, इसलिए उसे ढूंढने का प्रयास करना केवल समय की बर्बादी होगी। बीरबल ने इन सात दिनों का उपयोग आराम करने, किताबें पढ़ने और परिवार के साथ समय बिताने में किया।

इधर अकबर सोच रहे थे कि बीरबल इस बार निश्चित रूप से अपनी हार मान लेंगे, क्योंकि पृथ्वी पर ऐसे किसी घोड़े का अस्तित्व ही नहीं है। अकबर मन ही मन अपनी इस योजना पर बेहद खुश हो रहे थे।

दरबार में बीरबल की वापसी

ठीक आठवें दिन, बीरबल दरबार में हाजिर हुए। उनके चेहरे पर हमेशा की तरह एक आत्मविश्वास भरी मुस्कान थी। उन्हें देखकर अकबर बहुत उत्सुक हो गए।

अकबर ने पूछा, “कहो बीरबल! क्या तुम्हें मेरा वह विशेष घोड़ा मिला? या तुमने अपनी हार स्वीकार कर ली है?”

बीरबल ने झुककर अभिवादन किया और कहा, “जहांपनाह! आपकी कृपा से मैंने उस अनोखे और विशेष घोड़े को खोज लिया है। वह घोड़ा सचमुच अत्यंत दुर्लभ और अद्भुत है।”

अकबर चौंक गए। उन्हें अपनी कानों पर विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने पूछा, “क्या सचमुच? तुमने उसे ढूंढ लिया? तो फिर उसे अभी हमारे सामने पेश क्यों नहीं किया? वह घोड़ा कहाँ है?”

बीरबल का चतुर उत्तर

बीरबल ने बहुत ही गंभीर चेहरा बनाते हुए कहा, “हुजूर, वह घोड़ा इतना विशेष है कि उसके मालिक ने उसे देने के लिए दो बहुत ही कड़ी शर्तें रखी हैं। उन शर्तों को पूरा किए बिना वह घोड़ा आपको नहीं मिल सकता।”

अकबर ने उत्सुकता से पूछा, “शर्तें? कैसी शर्तें? हम इस साम्राज्य के शहंशाह हैं, हम कोई भी शर्त पूरी कर सकते हैं। जल्दी बताओ, क्या शर्तें हैं?”

बीरबल ने कहा, “जहांपनाह, पहली शर्त यह है कि उस विशेष घोड़े को लाने के लिए आपको स्वयं जाना होगा। कोई दूसरा सेवक या सैनिक उसे लेने नहीं जा सकता।”

अकबर ने कहा, “यह तो बहुत ही आसान शर्त है। हम खुद उस अद्भुत घोड़े को देखने और लाने के लिए तैयार हैं। अब दूसरी शर्त बताओ।”

बीरबल ने थोड़ा रुककर और अपनी आँखों में चमक लाते हुए कहा, “जहांपनाह, दूसरी शर्त थोड़ी कठिन है। घोड़े के मालिक का कहना है कि चूंकि वह घोड़ा बहुत ही विशेष और अलग रंग का है, इसलिए उसे ले जाने का दिन भी विशेष होना चाहिए। आप उसे लेने के लिए सप्ताह के सात दिनों (सोमवार, मंगलवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार, शनिवार और रविवार) को छोड़कर किसी भी अन्य दिन आ सकते हैं!”

अकबर की प्रतिक्रिया और सीख

बीरबल का यह जवाब सुनते ही पूरे दरबार में सन्नाटा छा गया और फिर अगले ही पल खुद बादशाह अकबर जोर से ठहाका मारकर हंस पड़े। अकबर समझ गए कि बीरबल ने उनकी ही चाल से उन्हें मात दे दी है। सप्ताह में केवल सात ही दिन होते हैं और इन सात दिनों के अलावा कोई आठवां दिन होता ही नहीं है।

अकबर ने बीरबल की पीठ थपथपाते हुए कहा, “वाह बीरबल! तुम्हारी बुद्धिमानी का कोई जवाब नहीं। तुमने एक बार फिर साबित कर दिया कि दुनिया में कोई भी ऐसी समस्या या पहेली नहीं है, जिसका हल तुम्हारे पास न हो।”

बीरबल को उनकी इस चतुराई के लिए अकबर द्वारा ढेर सारे उपहार और पुरस्कार दिए गए।

कहानी से सीख: इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि चाहे परिस्थिति कितनी भी कठिन या असंभव क्यों न लगे, यदि हम अपनी बुद्धि, धैर्य और चतुराई का सही उपयोग करें, तो हम किसी भी मुश्किल पहेली या समस्या का समाधान आसानी से निकाल सकते हैं।


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