
मुगल सल्तनत के बादशाह अकबर का दरबार अपनी भव्यता, न्याय और बुद्धिमानी के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध था। दरबार में रोजाना नए-नए मामले आते थे। कुछ मामले सीधे और सरल होते थे, तो कुछ इतने पेचीदा होते थे कि अच्छे-अच्छे मंत्रियों के पसीने छूट जाते थे। ऐसे कठिन समय में केवल एक ही व्यक्ति था, जिस पर बादशाह अकबर को आंख मूंदकर भरोसा था—वह थे उनके प्रिय और चतुर मंत्री बीरबल।
बीरबल अपनी तीक्ष्ण बुद्धि, हाजिरजवाबी और व्यावहारिक समझ के लिए जाने जाते थे। आज की कहानी ‘असली गुलाम’ भी बीरबल की उसी बेमिसाल सूझबूझ की गवाह है, जिसमें उन्होंने बिना किसी शारीरिक बल के, केवल मानवीय मनोविज्ञान का सहारा लेकर एक बेहद शातिर चोर को पकड़ लिया।
व्यापारी की व्यथा और अकबर का दरबार
एक दिन की बात है, नगर का सबसे धनी और प्रतिष्ठित व्यापारी रोता-बिलखता हुआ बादशाह अकबर के दरबार में हाजिर हुआ। वह मानसिक रूप से बेहद परेशान और डरा हुआ दिख रहा था। बादशाह अकबर ने उसे सांत्वना दी और उसकी इस दयनीय स्थिति का कारण पूछा।
व्यापारी ने हाथ जोड़कर कहा, “जहांपनाह! मैं तो पूरी तरह बर्बाद हो गया। बीती रात मेरे घर में एक बहुत बड़ी चोरी हुई है। चोर मेरे शयनकक्ष की तिजोरी से सोने के सिक्के, बहुमूल्य हीरे-जवाहरात और सबसे जरूरी व्यापारिक दस्तावेज लेकर फरार हो गया है।”
बादशाह अकबर ने गंभीरता से पूछा, “क्या तुम्हें किसी बाहरी व्यक्ति पर शक है? क्या तुम्हारे घर का कोई बाहरी ताला या खिड़की टूटी हुई मिली?”
व्यापारी ने सिर हिलाते हुए कहा, “नहीं हुजूर! घर के सारे ताले एकदम सही-सलामत थे। कहीं भी जबरन घुसने का कोई निशान नहीं मिला। मुझे पूरा यकीन है कि यह काम मेरे ही घर के नौकरों (गुलामों) में से किसी एक का है। मेरे घर में दर्जनों सेवक काम करते हैं, लेकिन मैं यह समझ नहीं पा रहा हूं कि इनमें से असली गुनहगार कौन है। यदि मैं सभी पर शक करूँगा, तो बेकसूरों का दिल दुखेगा और यदि बेकसूरों को सजा मिली, तो यह घोर अन्याय होगा। कृपया मेरी मदद करें!”
बीरबल को सौंपी गई जिम्मेदारी
मामले की संवेदनशीलता और पेचीदगी को देखते हुए बादशाह अकबर ने तुरंत अपने सबसे भरोसेमंद मंत्री बीरबल की तरफ देखा। बीरबल ने मुस्कुराते हुए व्यापारी से कहा, “आप बिल्कुल चिंता न करें। आज शाम होने से पहले ही आपके घर का असली चोर सलाखों के पीछे होगा। आप तुरंत अपने सभी सेवकों और गुलामों को शाही दरबार में हाजिर होने का हुक्म दें।”
कुछ ही घंटों में व्यापारी के सभी सेवक और गुलाम दरबार में पेश किए गए। वे सभी डरे हुए थे और चुपचाप सिर झुकाए खड़े थे। वे एक-दूसरे को शक की निगाहों से देख रहे थे। बीरबल ने सभी सेवकों के चेहरों को बहुत ध्यान से देखा। उनकी अनुभवी आँखें अपराधियों के चेहरे के हाव-भाव को क्षण भर में पढ़ लेती थीं, लेकिन चोर इतना शातिर था कि उसने अपने चेहरे पर जरा भी शिकन नहीं आने दी थी।
बीरबल समझ गए कि सीधे तरीके से पूछताछ करने पर यह चोर कभी अपना गुनाह नहीं कबूलेगा। इस शातिर चोर को पकड़ने के लिए किसी विशेष मनोवैज्ञानिक युक्ति की आवश्यकता थी।
जादुई लकड़ियों का अनोखा जाल
बीरबल अपने स्थान से उठ खड़े हुए और दरबार के एक सैनिक को आदेश दिया कि वह शाही बाग से समान लंबाई की कुछ लकड़ियां काट कर लाए। जब सैनिक लकड़ियां लेकर वापस आया, तो बीरबल ने उन सभी लकड़ियों को एक बार फिर परखा। वे सभी आकार, मोटाई और लंबाई में बिल्कुल बराबर थीं।
बीरबल ने सभी गुलामों को संबोधित करते हुए ऊंचे स्वर में कहा, “मेरे हाथ में जो लकड़ियां आप देख रहे हैं, वे कोई साधारण लकड़ियां नहीं हैं। इन्हें फारस के एक बहुत बड़े सिद्ध जादूगर ने विशेष मंत्रों से तैयार किया है। ये जादुई लकड़ियां हैं जो सच और झूठ का फैसला तुरंत कर देती हैं।”
दरबार में अचानक फुसफुसाहट शुरू हो गई। सभी सेवक अचरज और भय से उन लकड़ियों को देखने लगे।
बीरबल ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा, “मैं आप सभी को एक-एक लकड़ी दे रहा हूं। आप सब इसे आज रात अपने पास रखेंगे और कल सुबह इसे वापस दरबार में लेकर आएंगे। इस लकड़ी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि आप में से जिसने भी चोरी की होगी, उसकी लकड़ी आज रात को जादुई प्रभाव से ठीक दो इंच लंबी हो जाएगी। जो लोग निर्दोष हैं, उनकी लकड़ी का आकार जस का तस रहेगा।”
सभी सेवकों को एक-एक लकड़ी दे दी गई और उन्हें अगले दिन सुबह दरबार में हाजिर होने का आदेश देकर घर भेज दिया गया।
चोर की घबराहट और खुद का बुना जाल
व्यापारी के सभी सेवक अपने-अपने घरों को लौट गए। निर्दोष सेवक तो चैन की नींद सो गए, क्योंकि उन्हें पता था कि उन्होंने कुछ गलत नहीं किया है। लेकिन असली चोर के मन में भयंकर खलबली मची हुई थी। वह रात भर सो नहीं सका। वह बार-बार अपनी लकड़ी को देखता और सोचता, “बीरबल की बात कभी झूठी नहीं होती। अगर यह सचमुच जादुई लकड़ी है, तो सुबह तक यह दो इंच बड़ी हो जाएगी। तब तो राजा मुझे कठोर मृत्युदंड देंगे!”
डर और घबराहट में उसने एक अत्यंत मूर्खतापूर्ण योजना बनाई। उसने सोचा, “क्यों न मैं इस लकड़ी को अभी से दो इंच काट दूं? जब रात में यह जादुई प्रभाव से दो इंच बढ़ेगी, तो इसकी लंबाई फिर से बाकी लकड़ियों के बराबर हो जाएगी! इस तरह कोई भी मुझे पकड़ नहीं पाएगा और मैं साफ बच जाऊंगा।”
अपनी इस चालाकी पर मन ही मन खुश होते हुए चोर ने एक धारदार औजार लिया और अपनी लकड़ी को नीचे से ठीक दो इंच काट दिया। इसके बाद वह निश्चिंत होकर सो गया।
असली गुलाम की पहचान और न्याय
अगली सुबह, सभी सेवक अपनी-अपनी लकड़ियों के साथ दोबारा दरबार में हाजिर हुए। बादशाह अकबर, बीरबल और पीड़ित व्यापारी भी वहां बेहद उत्सुकता से बैठे थे।
बीरबल ने मुस्कुराते हुए सभी सेवकों को अपनी-अपनी लकड़ियां दिखाने को कहा। बीरबल ने एक-एक करके सभी की लकड़ियों की लंबाई मापना शुरू किया। जब वह उस चोर सेवक के पास पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि उसकी लकड़ी अन्य सभी लकड़ियों की तुलना में ठीक दो इंच छोटी थी।
बीरबल के चेहरे पर एक विजयी मुस्कान तैर गई। उन्होंने तुरंत उस सेवक का हाथ हवा में उठाया और चिल्लाए, “जहांपनाह! यही है वह चोर जिसने व्यापारी के घर चोरी की है!”
चोर बुरी तरह थर-थर कांपने लगा। वह समझ गया कि उसका खेल खत्म हो चुका है। वह तुरंत बीरबल और बादशाह के पैरों में गिर पड़ा। उसने रोते हुए अपना गुनाह कबूल कर लिया और चुराया हुआ सारा धन और दस्तावेज वापस करने की बात मान ली।
बादशाह अकबर हैरान थे। उन्होंने बीरबल से पूछा, “बीरबल! तुमने यह चमत्कार कैसे किया? क्या सचमुच ये लकड़ियां जादुई थीं?”
बीरबल जोर से हंसे और बोले, “नहीं जहांपनाह! ये बिल्कुल साधारण लकड़ियां थीं। जादू लकड़ियों में नहीं, बल्कि चोर के मन के डर में था। चोर हमेशा अपने ही किए गए पाप और डर का ‘असली गुलाम’ होता है। उसे लगा कि उसकी चोरी पकड़ी जाएगी, इसलिए उसने खुद ही अपनी लकड़ी दो इंच काट दी। इस तरह उसने खुद को खुद ही बेनकाब कर दिया।”
पूरा दरबार बीरबल की इस अद्वितीय बुद्धिमानी के जयकारों से गूंज उठा। बादशाह अकबर ने बीरबल की पीठ थपथपाई और उन्हें कीमती उपहारों से सम्मानित किया।
कहानी से सीख
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि गलत काम करने वाला व्यक्ति चाहे कितना भी चालाक क्यों न हो, उसका आंतरिक डर और अपराधबोध उसे एक दिन जरूर पकड़वा देता है। सच को कभी छुपाया नहीं जा सकता, और बुराई का अंत हमेशा पराजय में होता है। मनुष्य को कभी भी अपने लालच या डर का गुलाम नहीं बनना चाहिए।
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