
मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ भारतीय समाज की उन कड़वी सच्चाइयों को उजागर करती हैं, जिन्हें अक्सर पर्दों के पीछे छुपा दिया जाता है। उनकी कहानी ‘नैराश्य लीला’ (Nairashya Leela) भी एक ऐसी ही रचना है, जो मनुष्य के स्वभाव, उसकी अतृप्त इच्छाओं और विशेष रूप से भारतीय समाज में पुत्र की चाहत से उत्पन्न होने वाली विडंबनाओं को दर्शाती है।
पुत्र की अनचाही लालसा और कैलासनाथ का द्वंद्व
कहानी के मुख्य पात्र कैलासनाथ एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति हैं, जिनके जीवन में सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं है, लेकिन उनके मन में एक गहरा घाव है—पुत्र का न होना। कैलासनाथ की पाँच बेटियाँ हैं। प्रेमचंद ने यहाँ समाज की उस मानसिकता को पकड़ा है जहाँ बेटियों का होना सौभाग्य नहीं, बल्कि एक बोझ या ‘अपूर्णता’ समझा जाता है।
कैलासनाथ अपनी बेटियों से प्रेम तो करते हैं, लेकिन उनके अंतर्मन में बैठा पितृसत्तात्मक समाज उन्हें बार-बार कचोटता है। उन्हें लगता है कि उनके वंश को चलाने वाला कोई नहीं है और बुढ़ापे में उनकी लाठी बनने वाला कोई ‘कुलदीपक’ नहीं होगा। इसी ‘नैराश्य’ (निराशा) की लीला का चित्रण इस कहानी का मुख्य आधार है।
निरुपमा का त्याग और मानसिक वेदना
कैलासनाथ की पत्नी निरुपमा इस कहानी की एक शांत लेकिन शक्तिशाली पात्र है। वह एक भारतीय नारी के उस रूप का प्रतिनिधित्व करती है, जो खुद को केवल इसलिए अपराधी मानती है क्योंकि उसने पुत्र को जन्म नहीं दिया। प्रेमचंद ने बड़े ही सूक्ष्म तरीके से दिखाया है कि कैसे एक पुरुष की हताशा का सबसे बुरा असर घर की स्त्री पर पड़ता है।
कैलासनाथ अपनी निराशा को कभी गुस्से में, तो कभी मौन रहकर व्यक्त करते हैं, जिसका सीधा प्रहार निरुपमा के हृदय पर होता है। वह मंदिरों के चक्कर लगाती है, मन्नतें माँगती है और साधु-संतों के बताए टोटके करती है। यहाँ प्रेमचंद अंधविश्वास पर भी प्रहार करते हैं, जो मनुष्य की लाचारी से उपजता है।
समाज की संकीर्णता और विडंबना
कहानी में प्रेमचंद ने यह भी रेखांकित किया है कि समाज किस तरह व्यक्ति की व्यक्तिगत निराशा को और अधिक बढ़ा देता है। पड़ोसियों और रिश्तेदारों के ताने, उनकी हमदर्दी वाली बातें कैलासनाथ को और भी अधिक व्याकुल कर देती हैं। प्रेमचंद लिखते हैं कि समाज में व्यक्ति की प्रतिष्ठा उसके चरित्र से नहीं, बल्कि उसके पास उपलब्ध ‘संसाधनों’ (जिसमें पुत्र भी शामिल है) से आंकी जाती है।
कैलासनाथ का नैराश्य इतना गहरा जाता है कि वे अपनी बेटियों की उपलब्धियों को भी अनदेखा करने लगते हैं। यह उनके चरित्र का एक नकारात्मक पहलू है, जिसे प्रेमचंद ने बहुत ही ईमानदारी से चित्रित किया है। वे दिखाना चाहते थे कि कैसे एक कुंठा इंसान को अंधा बना देती है।
कहानी का चरमोत्कर्ष: आशा और निराशा के बीच
जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, पाठक यह महसूस करता है कि असली ‘नैराश्य’ पुत्र का न होना नहीं, बल्कि उस मानसिकता का होना है जो हमें अपने पास मौजूद खुशियों को देखने से रोकती है। कैलासनाथ की बेटियाँ गुणी हैं, सुशील हैं, लेकिन कैलासनाथ के लिए वे केवल एक जिम्मेदारी हैं जिन्हें ‘पार’ लगाना है।
अंत में, प्रेमचंद यह संदेश देते हैं कि मनुष्य जिस चीज़ के पीछे भागता है, ज़रूरी नहीं कि वह उसे सुख ही दे। जीवन की सार्थकता कर्म में है, न कि इस बात में कि आपके बाद आपका नाम कौन आगे बढ़ाएगा। ‘नैराश्य लीला’ हमें आत्म-चिंतन करने पर मजबूर करती है कि क्या हम भी अपनी अधूरी इच्छाओं के कारण अपने वर्तमान के आनंद को तो नहीं खो रहे?
निष्कर्ष
‘नैराश्य लीला’ मुंशी प्रेमचंद की उन चुनिंदा कहानियों में से है जो आज के दौर में भी उतनी ही प्रासंगिक है। भले ही समाज विकसित हो गया हो, लेकिन पुत्र मोह की जड़ें आज भी कहीं न कहीं गहरी जमी हुई हैं। यह कहानी हमें सिखाती है कि परिवार में स्नेह और समानता का भाव ही सच्ची सुख-शांति का मार्ग है।
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