
मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ भारतीय समाज, पारिवारिक ताने-बाने और मानव स्वभाव का जीवंत आईना होती हैं। उनकी प्रसिद्ध कहानी ‘गिला’ (Gila) दांपत्य जीवन के सूक्ष्म मनोविज्ञान, अपेक्षाओं और आपसी शिकायतों की एक बेहद मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति है। यह कहानी एक पत्नी के नजरिए से कही गई है, जिसके दिल में अपने पति के सीधेपन, अत्यधिक आदर्शवाद और सामाजिकता को लेकर एक गहरा ‘गिला’ यानी शिकायत है। आइए, प्रेमचंद की इस कालजयी रचना के गहरे अर्थों और इसके सुंदर कथानक को विस्तार से समझते हैं।
पति का आदर्शवाद और पत्नी की शिकायतें
कहानी की मुख्य पात्र और कथावाचक एक साधारण मध्यमवर्गीय गृहणी है। उसके पति एक बेहद सीधे-साधे, नेकदिल और आदर्शवादी व्यक्ति हैं। पत्नी की सबसे बड़ी शिकायत यह है कि उसका पति दुनिया भर के लिए मसीहा बना फिरता है, लेकिन अपने खुद के घर और परिवार के प्रति बेहद उदासीन है।
वह अक्सर अपनी तुलना पड़ोस की अन्य महिलाओं से करती है। वह कहती है कि दूसरों के पति अपनी पत्नियों के लिए सुंदर साड़ियाँ लाते हैं, गहने बनवाते हैं और उनके आराम का पूरा ध्यान रखते हैं। इसके विपरीत, उसके पति महोदय को समाज सुधार, दोस्तों की मदद और देश-दुनिया की चिंता से ही फुर्सत नहीं मिलती। जब भी घर के लिए किसी जरूरी सामान की बात आती है, तो पति का बटुआ खाली मिलता है। लेकिन यदि कोई अनजान व्यक्ति भी मदद की गुहार लेकर आ जाए, तो वे अपनी जेब खाली करने में एक पल का भी संकोच नहीं करते।
समाज सेवा बनाम पारिवारिक जिम्मेदारी
कहानी में पत्नी अपने पति के इस परोपकारी स्वभाव के कई मजेदार और थोड़े दुखद उदाहरण पेश करती है। वह बताती है कि कैसे एक बार घर के राशन और बच्चों की फीस के लिए बचाकर रखे गए पैसों से उसके पति ने अपने एक दूर के बीमार दोस्त की दवाइयाँ खरीद लीं। एक अन्य घटना में, उन्होंने अपनी बहन की शादी के लिए कर्ज लिया था, लेकिन जब उनके एक मित्र को व्यापार में घाटा हुआ, तो उन्होंने वह पूरी रकम उस मित्र की मदद के लिए सौंप दी।
पत्नी का तर्क व्यावहारिक है। उसका मानना है कि किसी भी पुरुष का पहला कर्तव्य उसका अपना परिवार होना चाहिए। यदि घर के लोग ही तंगहाली और मानसिक तनाव में जी रहे हों, तो ऐसी समाज सेवा और परोपकार का क्या औचित्य? वह कहती है, “दुनिया भले ही उन्हें महात्मा या देवपुरुष कहे, लेकिन एक पत्नी के रूप में मेरे लिए वे केवल एक ऐसे पति हैं जो अपनी गृहस्थी की जिम्मेदारियों से हमेशा कतराते रहते हैं।”
आत्म-मंथन और सत्य का अहसास
जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, कुछ ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं जो पत्नी को गहरे आत्म-मंथन पर मजबूर कर देती हैं। एक बार उनके मोहल्ले में एक गंभीर संकट आ खड़ा होता है। एक गरीब पड़ोसी के घर में कोई कमाने वाला नहीं बचता और वह गंभीर रूप से बीमार हो जाता है। जहाँ समाज के अन्य तथाकथित ‘सफल’ और अमीर लोग अपनी आँखें फेर लेते हैं, वहीं इस महिला का पति अपनी जान की परवाह किए बिना उस बीमार व्यक्ति की दिन-रात सेवा करता है।
जब वह पड़ोसी ठीक हो जाता है, तो पूरे मोहल्ले के लोग इस निस्वार्थ सेवा के लिए उसके पति को भगवान की तरह पूजने लगते हैं। समाज में उनके लिए उमड़े इस असीम आदर और सच्चे सम्मान को देखकर पत्नी का सिर गर्व से ऊंचा हो जाता है। उसे इस बात का अहसास होता है कि जो सच्चा सम्मान और आत्मिक शांति उसके पति को लोगों की दुआओं से मिल रही है, वह दुनिया के किसी भी सोने के गहने या महंगे उपहार से कहीं अधिक मूल्यवान है।
‘गिला’ का अंत और प्रेम की विजय
अंततः, पत्नी के मन का सारा ‘गिला’ (शिकायत) कपूर की तरह उड़ जाता है। उसे समझ आ जाता है कि उसके पति का यह सीधापन और परोपकार कोई कमजोरी नहीं, बल्कि उनके चरित्र की सबसे बड़ी ताकत और उनकी आत्मा की असली खूबसूरती है। वह समझ जाती है कि भौतिक सुख-सुविधाएं तो क्षणभंगुर हैं, लेकिन जो सम्मान और निस्वार्थ प्रेम कमाया गया है, वह अमर है।
प्रेमचंद ने इस कहानी के माध्यम से बहुत ही सहजता से यह संदेश दिया है कि वैवाहिक जीवन केवल लेन-देन और शिकायतों का नाम नहीं है। यह एक-दूसरे के आंतरिक गुणों को समझने, उनका सम्मान करने और विपरीत स्वभाव के बावजूद एक-दूसरे का संबल बनने की यात्रा है।
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