
मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ भारतीय समाज के उस यथार्थ को दर्शाती हैं, जो आज भी कहीं न कहीं हमारे समाज की जड़ों में मौजूद है। ‘सवा सेर गेहूँ’ केवल एक कहानी नहीं, बल्कि ऋण के उस कुचक्र और शोषण की दास्तां है, जिसमें एक सीधा-सादा किसान अपनी ईमानदारी के कारण ही फंस जाता है।
शंकर की सादगी और एक छोटी सी भूल
शंकर एक सीधा-सादा, भोला-भाला और कठिन परिश्रम करने वाला किसान था। उसके पास अपनी थोड़ी सी जमीन थी, जिससे वह अपने परिवार का गुजर-बसर करता था। एक बार उसके घर एक साधु-महात्मा पधारे। अतिथि सत्कार की परंपरा को निभाने के लिए शंकर के पास घर में गेहूँ नहीं था। उसने सोचा कि साधु को मोटा अनाज खिलाना उचित नहीं होगा, इसलिए वह गाँव के विप्र (ब्राह्मण) महाराज के पास गया और उनसे ‘सवा सेर गेहूँ’ उधार माँग लाया।
साधु को भोजन कराने के बाद शंकर ने सोचा कि विप्र जी को यह सवा सेर गेहूँ खलिहान आने पर लौटा देगा। लेकिन समय बीतता गया और शंकर इस छोटी सी बात को भूल गया। विप्र जी ने भी उस समय कुछ नहीं कहा।
ऋण का भयावह जाल
सात साल बीत गए। एक दिन विप्र जी ने शंकर को रोककर कहा, “शंकर, तुम्हारे पास मेरे सवा सेर गेहूँ बकाया हैं, उसका हिसाब कब करोगे?” शंकर चौंक पड़ा। उसने विनम्रता से कहा, “महाराज, मैं तो उसे भूल ही गया था। मैं अभी खलिहान से सवा सेर गेहूँ भिजवा देता हूँ।”
लेकिन विप्र जी चतुर थे। उन्होंने कहा, “सवा सेर गेहूँ आज के हिसाब से सवा मन हो गया है। सात साल का ब्याज भी तो जोड़ो!” शंकर सन्न रह गया। कहाँ सवा सेर गेहूँ और कहाँ सवा मन! विप्र जी ने अपने हिसाब की पोथी खोली और चक्रवृद्धि ब्याज लगाकर उस मामूली सी उधारी को पाँच मन गेहूँ में बदल दिया।
शोषण की पराकाष्ठा
शंकर के पास इतना अनाज नहीं था। उसने विनती की, गिड़गिड़ाया, लेकिन विप्र जी नहीं माने। अंत में तय हुआ कि शंकर पाँच मन गेहूँ के बदले विप्र जी के यहाँ मजदूरी करेगा। शंकर दिन-भर अपने खेत में काम करता और रात को विप्र जी के काम निपटाता। लेकिन विप्र जी का कर्ज था कि कम होने का नाम ही नहीं लेता था। शंकर के जीवन का हर क्षण उस कर्ज को उतारने में बीतने लगा।
उसकी ईमानदारी ही उसके गले की फाँस बन गई थी। वह चाहता तो शहर भाग सकता था, लेकिन उसने अपनी नैतिकता नहीं छोड़ी। धीरे-धीरे शंकर की हालत बिगड़ती गई। कुपोषण और अत्यधिक श्रम के कारण वह बीमार रहने लगा।
एक दुखद अंत और विरासत का बोझ
शंकर की मृत्यु हो गई, लेकिन कहानी यहाँ खत्म नहीं हुई। विप्र जी ने शंकर के जवान बेटे को पकड़ लिया और कहा, “तुम्हारे पिता का कर्ज अभी पूरा नहीं हुआ है। अब तुम्हें यह चुकाना होगा।” सवा सेर गेहूँ की कीमत शंकर की पूरी जिंदगी और उसके बेटे की आजादी बन गई। शंकर का बेटा भी उसी विप्र जी के यहाँ ‘बंधुआ मजदूर’ बन गया।
प्रेमचंद की यह कहानी हमें सिखाती है कि कैसे सूदखोरी और सामाजिक असमानता एक निर्दोष व्यक्ति के जीवन को लील लेती है। यह कहानी आज के दौर में भी प्रासंगिक है, जहाँ कर्ज का बोझ किसानों को आत्महत्या की ओर धकेलता है।
निष्कर्ष
‘सवा सेर गेहूँ’ समाज के उस कठोर चेहरे को उजागर करती है, जहाँ धर्म और कर्मकांड की आड़ में गरीबों का खून चूसा जाता है। शंकर की ईमानदारी उसे बचा नहीं सकी, बल्कि उसे और अधिक प्रताड़ित करने का जरिया बन गई। मुंशी प्रेमचंद ने इस कहानी के माध्यम से न्याय व्यवस्था और मानवता पर गहरे सवाल खड़े किए हैं।
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