
गाँव की ऊँची चौपाल पर बैठे पंडित चेतराम जब अपनी मूँछों पर ताव देते, तो पूरे इलाके के लोग सम्मान से सिर झुका लेते थे। चेतराम का मानना था कि समाज में व्यक्ति का ‘आधार’ उसकी जाति, पुरखों की विरासत और धन-दौलत होती है। उनके अनुसार, जिस व्यक्ति के पास ये तीनों चीजें नहीं, उसका जीवन निराधार है। उनके पास अपनी पुश्तैनी ज़मीन थी और पूर्वजों का नाम, जिसे वे बड़े गर्व से अपनी छाती से लगाए फिरते थे।
उसी गाँव के दूसरे छोर पर एक छोटा सा झोपड़ा था, जहाँ मंगरू नाम का एक मजदूर रहता था। मंगरू के पास न तो बड़ी ज़मीन थी और न ही किसी ऊँचे कुल का नाम। वह दिन भर दूसरों के खेतों में पसीना बहाता और रात को दो सूखी रोटियाँ खाकर संतोष की नींद सो जाता। पंडित चेतराम अक्सर मंगरू को देखकर मुँह बिगाड़ लेते और कहते, “अरे भाई मंगरू, तुम जैसे लोगों का जीवन भी क्या जीवन है? न कोई मान, न मर्यादा, न समाज में कोई आधार।”
मंगरू बस मुस्कुरा देता और कहता, “महाराज, मेरा आधार तो मेरी मेहनत और ये हाथ हैं। ईश्वर ने जब तक शरीर में प्राण दिए हैं, तब तक इसी को आधार मानकर जी लूँगा।”
संकट की वो काली रात
समय का पहिया घूमा और एक साल गाँव पर भारी विपत्ति आ पड़ी। सावन का महीना था, लेकिन उस साल इंद्रदेव जैसे रूठ गए थे। लगातार सात दिनों तक ऐसी मूसलाधार बारिश हुई कि गाँव के पास बहने वाली नदी उफान पर आ गई। गाँव की सुरक्षा के लिए बना पुराना बांध कमज़ोर पड़ने लगा था। अगर बांध टूटा, तो पूरे गाँव का अस्तित्व ही मिट जाता।
रात के तीसरे पहर अचानक शोर मचा कि बांध में दरार आ गई है। पूरे गाँव में अफरा-तफरी मच गई। पंडित चेतराम अपने कीमती सामान और पुश्तैनी गहनों की पोटली बांधकर सबसे पहले ऊँचे टीले की ओर भागने की कोशिश करने लगे। उन्हें डर था कि कहीं उनकी ‘प्रतिष्ठा’ का यह धन पानी में न बह जाए।
दूसरी ओर, मंगरू और उसके जैसे कुछ मेहनतकश लोग अपनी जान की परवाह किए बिना बांध की ओर दौड़े। नदी का वेग प्रचंड था। लोग पत्थर और मिट्टी की बोरियां डाल रहे थे, लेकिन पानी का बहाव सब कुछ बहा ले जा रहा था।
असली आधार की पहचान
तभी एक भयानक आवाज़ हुई और बांध का एक बड़ा हिस्सा ढहने लगा। गाँव वाले डर के मारे पीछे हटने लगे। उस समय मंगरू चिल्लाया, “भागो मत! अगर आज यह बांध गया, तो कोई ऊँचा-नीचा नहीं बचेगा, सब मिट्टी में मिल जाएँगे।”
मंगरू खुद पानी के बीचों-बीच कूद गया और एक बड़े लट्ठे को पकड़कर दरार के बीच में खड़ा हो गया। उसे देखकर गाँव के अन्य युवाओं में भी साहस जागा। सबने मिलकर एक मानव-श्रृंखला बनाई। घंटों की कड़ी मशक्कत के बाद, पत्थरों और लकड़ियों के सहारे दरार को भर दिया गया। सुबह होते-होते पानी का स्तर भी कम होने लगा और गाँव डूबने से बच गया।
सुबह जब सूरज की पहली किरण पड़ी, तो पंडित चेतराम टीले से नीचे उतरे। उन्होंने देखा कि मंगरू थककर चूर, कीचड़ में लथपथ ज़मीन पर लेटा हुआ था। उसके हाथ छिल गए थे और शरीर से खून बह रहा था। पूरा गाँव मंगरू के चारों ओर खड़ा होकर उसे दुआएं दे रहा था।
चेतराम का हृदय परिवर्तन
पंडित चेतराम को पहली बार अपनी पोटली का बोझ बहुत भारी लगने लगा। उन्हें समझ आया कि जिस धन और कुल को वे अपना ‘आधार’ मान रहे थे, वह संकट के समय किसी के काम न आया। गाँव का असली आधार तो मंगरू जैसे लोग थे, जिनके पास साहस, श्रम और दूसरों के लिए मर-मिटने का जज्बा था।
वे धीरे से मंगरू के पास गए और उसके कंधे पर हाथ रखकर बोले, “मंगरू भाई, आज तुमने मेरी आँखें खोल दीं। अब तक मैं समझता था कि नाम और पैसा ही जीवन का आधार है, पर आज समझ आया कि मनुष्य का कर्म और उसकी मानवता ही उसका असली आधार होती है। कल तक मैं आधारहीन था, आज तुम्हारी बदौलत मुझे सत्य का आधार मिला है।”
मुंशी प्रेमचंद की यह कहानी हमें सिखाती है कि दिखावे और अहंकार की नींव पर बना जीवन कभी भी ढह सकता है, लेकिन सेवा और परिश्रम की नींव पर खड़ा व्यक्तित्व सदैव अटल रहता है।
Recommended Reads:
Discover more from StoryDunia
Subscribe to get the latest posts sent to your email.









