
महाराज अकबर का दरबार अपनी भव्यता, न्यायप्रियता और ज्ञान चर्चाओं के लिए दुनिया भर में मशहूर था। उनके दरबार में एक से बढ़कर एक ज्ञानी, संगीतकार, कलाकार और रणनीतिकार मौजूद थे। लेकिन इन सब में जो सबसे विशेष और बादशाह के करीब थे, वे थे उनके प्रिय सलाहकार बीरबल। बीरबल अपनी तीक्ष्ण बुद्धि, हाजिरजवाबी और हर कठिन से कठिन समस्या का चुटकी में हल निकालने की अनूठी कला के लिए जाने जाते थे।
अकबर की अनोखी परीक्षा
एक ठंडी सुबह, महाराज अकबर अपने आलीशान सिंहासन पर विराजमान थे। दरबार की कार्यवाही शुरू होने ही वाली थी कि अकबर के चेहरे पर एक शरारती मुस्कान तैर गई। वे अक्सर अपने दरबारियों की बुद्धिमत्ता और मानसिक सतर्कता की परीक्षा लेते रहते थे। आज भी उनका कुछ ऐसा ही विचार था।
उन्होंने पूरे दरबार की तरफ देखा और ऊंचे स्वर में घोषणा की, “सभासदों! आज हम किसी राज्य की सीमा या राजस्व की समस्या पर चर्चा नहीं करेंगे। आज हम आपकी बुद्धि की थाह लेंगे। हम आपके सामने एक बेहद जटिल पहेली रख रहे हैं। जो भी इस पहेली का सबसे सटीक और तर्कसंगत उत्तर देगा, उसे शाही खजाने से एक सौ स्वर्ण मुद्राएं और विशेष राजकीय सम्मान दिया जाएगा।”
यह सुनते ही पूरे दरबार में सुगबुगाहट शुरू हो गई। सभी दरबारी अपनी बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन करने और पुरस्कार जीतने के लिए उत्सुक हो उठे।
बादशाह की पहेली
बादशाह अकबर ने मुस्कुराते हुए अपनी पहेली दरबार के सामने रखी:
“वह कौन सी शक्ति है जो बिना पैरों के पूरी दुनिया का चक्कर लगा लेती है, बिना हाथों के सब कुछ समेट लेती है, और बिना किसी आवाज़ के दिल के सबसे गहरे राज़ बयां कर देती है?”
पहेली सुनते ही पूरे दरबार में अचानक गहरा सन्नाटा छा गया। दरबारी एक-दूसरे का मुंह ताकने लगे। कुछ लोग अपनी दाढ़ी खुजलाने लगे, तो कुछ शून्य में ताकते हुए गहरी सोच में डूब गए। पहेली दिखने में जितनी सरल और काव्यात्मक लग रही थी, उसका उत्तर खोजना उतना ही कठिन साबित हो रहा था।
दरबारियों के विफल प्रयास
सबसे पहले सेनापति मानसिंह आगे आए और आत्मविश्वास से बोले, “जहाँपनाह! वह शक्ति ‘हवा’ है। हवा बिना पैरों के बहती है और पूरी दुनिया का चक्कर लगाती है।”
अकबर ने सिर हिलाया और कहा, “सेनापति जी, हवा पूरी दुनिया का चक्कर तो लगाती है, लेकिन वह बिना हाथों के यादों या भावनाओं को समेट नहीं सकती, और न ही वह दिल के छिपे राज़ बयां कर सकती है। आपका उत्तर सही नहीं है।”
इसके बाद राजगुरु ने अपनी राय दी, “महाराज, वह अद्भुत शक्ति ‘समय’ है। समय निरंतर चलता रहता है और सब कुछ अपने भीतर समेट लेता है।”
अकबर ने इसे भी खारिज करते हुए कहा, “समय मूल्यवान है, लेकिन समय किसी के दिल के राज़ बयां नहीं करता। वह केवल बीतता जाता है। हमें आपकी कल्पना से कुछ और गहरे उत्तर की उम्मीद है।”
एक-एक करके कई दरबारियों ने अपनी किस्मत आजमाई। किसी ने ‘सूरज की रोशनी’ कहा, तो किसी ने ‘मृत्यु’। लेकिन अकबर किसी भी उत्तर से संतुष्ट नहीं हुए। दरबार में मायूसी छाने लगी थी। तभी अकबर की नजर बीरबल पर पड़ी, जो कोने में चुपचाप खड़े मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे।
बीरबल का चतुर और सटीक उत्तर
अकबर ने बीरबल को पुकारा, “बीरबल! तुम इस तरह शांत क्यों खड़े हो? क्या तुम्हारे पास हमारी इस पहेली का कोई उत्तर नहीं है? या तुमने हार मान ली है?”
बीरबल ने आगे आकर राजा को आदरपूर्वक प्रणाम किया और विनम्रतापूर्वक बोले, “जहाँपनाह, आपकी यह पहेली बेहद खूबसूरत और दार्शनिक है। इसका उत्तर अत्यंत सरल है, जो हम सभी के भीतर ही मौजूद है।”
दरबार में उत्सुकता चरम पर पहुँच गई। सभी की निगाहें बीरबल के चेहरे पर टिक गईं।
बीरबल ने मुस्कुराते हुए कहा, “जहाँपनाह, वह अद्भुत शक्ति और कुछ नहीं, बल्कि मनुष्य का ‘मन’ (या विचार) है।”
अकबर ने कौतूहल से पूछा, “मन? वह कैसे बीरबल? इसे विस्तार से सिद्ध करो।”
बीरबल ने बेहद तार्किक ढंग से समझाते हुए कहा, “महाराज, ध्यान से सोचिए:
- बिना पैरों के दुनिया का चक्कर: हमारा मन ही है जो एक क्षण में इस दरबार में बैठा है और अगले ही क्षण बिना एक कदम चले सात समंदर पार या सुदूर तारों पर पहुँच जाता है। इसके यात्रा करने के लिए किसी पैर की आवश्यकता नहीं होती।
- बिना हाथों के सब कुछ समेटना: हमारा मन बिना किसी भौतिक सहारे के हमारी जिंदगी भर की यादों, अनुभवों, ज्ञान, खुशियों और आंसुओं को अपने भीतर समेट कर सुरक्षित रखता है। इसके लिए इसे हाथों की जरूरत नहीं होती।
- बिना आवाज़ के दिल के राज़ बयां करना: जब हमारे मन में किसी के प्रति गहरा प्रेम, आदर या क्रोध उत्पन्न होता है, तो वह बिना एक शब्द बोले भी हमारी आँखों और चेहरे के हाव-भाव से प्रकट हो जाता है। मन की भाषा को समझने के लिए शब्दों या आवाज़ की जरूरत नहीं होती।”
राजा की प्रशंसा और पुरस्कार
बीरबल का यह तार्किक, गहरा और शत-प्रतिशत सटीक उत्तर सुनकर पूरा दरबार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। बादशाह अकबर का चेहरा गर्व और खुशी से खिल उठा। वे बीरबल की इस विलक्षण सोच और बुद्धिमत्ता से हमेशा की तरह बेहद प्रभावित हुए।
अकबर ने अपने सिंहासन से उठकर कहा, “अद्भुत बीरबल! लाजवाब! सचमुच, मनुष्य का मन ही वह असीम शक्ति है जो ब्रह्मांड की सभी सीमाओं को लांघ सकती है। तुमने एक बार फिर अपनी कुशाग्र बुद्धि का लोहा मनवा दिया है।”
घोषणा के अनुसार, महाराज अकबर ने बीरबल को १०० स्वर्ण मुद्राएं और अपने गले से मोतियों का बेशकीमती हार उतारकर पुरस्कार स्वरूप भेंट किया। बीरबल से ईर्ष्या करने वाले अन्य दरबारी एक बार फिर अपना सा मुंह लेकर रह गए।
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