
बादशाह अकबर के दरबार में आए दिन कोई न कोई ऐसी उलझन सामने आती थी, जिसका हल ढूंढना किसी आम इंसान के बस की बात नहीं होती थी। लेकिन जहाँ समस्या होती थी, वहाँ बीरबल अपनी तीक्ष्ण बुद्धि के साथ हाजिर रहते थे। एक दिन सम्राट अकबर के मन में बीरबल की परीक्षा लेने का एक अनोखा विचार आया। उन्होंने दरबार में एक ऐसी शर्त रखी, जिसने सभी दरबारियों को सोच में डाल दिया।
अकबर की अनोखी चुनौती
एक सुबह दरबार की कार्यवाही शुरू होते ही बादशाह अकबर ने अपने सैनिकों को एक स्वस्थ और तंदुरुस्त बकरी लाने का आदेश दिया। कुछ ही देर में एक सुंदर और हट्टी-कट्टी बकरी दरबार में हाजिर की गई।
अकबर ने बीरबल को अपने पास बुलाया और कहा, “बीरबल, यह हमारे राज्य की सबसे प्रिय बकरी है। हम तुम्हें एक विशेष कार्य सौंप रहे हैं। तुम्हें इस बकरी को अपने घर ले जाना है और पूरे एक महीने तक इसकी बहुत अच्छी देखभाल करनी है। इसे हरी घास, चने, ताजे फल और हर वह स्वादिष्ट चीज खिलानी है जो इसे पसंद हो। इसमें किसी भी तरह की कंजूसी नहीं होनी चाहिए।”
बीरबल ने विनम्रतापूर्वक सिर झुकाकर कहा, “जी जहाँपनाह, मैं इसकी पूरी देखभाल करूँगा। लेकिन महाराज, इसमें चुनौती क्या है? यह तो बेहद आसान काम है।”
अकबर रहस्यमयी ढंग से मुस्कुराए और बोले, “शर्त अभी पूरी नहीं हुई है, बीरबल। चुनौती यह है कि एक महीने के बाद जब तुम इस बकरी को वापस दरबार में लाओगे, तो इसका वजन न तो एक रत्ती बढ़ना चाहिए और न ही घटना चाहिए। इसका वजन आज जितना है, ठीक एक महीने बाद भी उतना ही होना चाहिए। यदि वजन में थोड़ा भी बदलाव हुआ, तो तुम्हें कड़ी सजा दी जाएगी।”
दरबारियों की खुशी और बीरबल की उलझन
यह शर्त सुनकर दरबार में मौजूद अन्य दरबारी मन ही मन बेहद खुश हुए। वे सोचने लगे कि इस बार बीरबल निश्चित रूप से फँस जाएगा। यदि बकरी को भरपेट खाना खिलाया गया, तो उसका वजन बढ़ना तय था। और यदि उसे भूखा रखा गया, तो वह कमजोर हो जाएगी और उसका वजन घट जाएगा। दोनों ही परिस्थितियों में बीरबल की हार निश्चित थी।
लेकिन बीरबल शांत रहे। उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के राजा की चुनौती को स्वीकार कर लिया और बकरी की रस्सी पकड़कर अपने घर की ओर चल दिए।
बीरबल की जादुई युक्ति
घर पहुँचकर बीरबल ने बकरी के रहने का बहुत ही आरामदायक प्रबंध किया। उन्होंने अपनी देखरेख में उसे रोज सुबह-शाम ताजी हरी घास, चने और स्वादिष्ट भोजन देना शुरू किया। बकरी भरपेट खाती थी और बहुत मजे में रहती थी।
लेकिन बीरबल जानते थे कि केवल खिलाने से बकरी मोटी हो जाएगी और उसका वजन बढ़ जाएगा। इस समस्या का समाधान निकालने के लिए उन्होंने एक अनोखी और अचूक योजना बनाई। उन्होंने अपने घर के पिछले हिस्से में एक खूंखार शेर को पिंजरे में बंद करवा कर रखवा दिया।
हर दिन, जब बकरी भरपेट स्वादिष्ट भोजन खा लेती, तो बीरबल उसे उस शेर के पिंजरे के ठीक सामने ले जाकर बाँध देते थे। भूखा शेर सामने खड़ी बकरी को देखकर जोर से दहाड़ता और पिंजरे पर झपटता था। शेर की भयानक दहाड़ और उसकी खूंखार आँखों को देखकर बकरी बुरी तरह डर जाती थी। वह अपनी जान बचाने के लिए थर-थर कांपने लगती थी।
भय और अत्यधिक तनाव के कारण बकरी का खाया-पिया सब सूख जाता था। डर के मारे उसके शरीर की अतिरिक्त चर्बी और कैलोरी बर्न हो जाती थी। यह सिलसिला पूरे एक महीने तक लगातार दिन-रात चलता रहा। बकरी रोज अच्छा खाना खाती, लेकिन रोज ही मौत के डर से उसका वजन संतुलित रहता था।
फैसले का दिन
आखिरकार, एक महीने का समय समाप्त हो गया। बीरबल वादे के मुताबिक बकरी को लेकर दरबार में पहुँचे। बादशाह अकबर और सभी दरबारी उत्सुकता से उनका इंतजार कर रहे थे। सभी दरबारी यह देखने के लिए उत्सुक थे कि आज बीरबल को क्या सजा मिलती है।
अकबर ने मुस्कुराते हुए पूछा, “बीरबल, क्या तुमने हमारी प्रिय बकरी को अच्छे से खिलाया-पिलाया?”
बीरबल ने उत्तर दिया, “हाँ जहाँपनाह, मैंने इसकी बहुत सेवा की। इसे रोज उत्तम दर्जे का भोजन खिलाया गया है।”
अकबर ने तुरंत राजसी तराजू मँगवाया। पहले दिन का वजन बही-खाते में दर्ज था। जब बकरी को तराजू पर चढ़ाया गया, तो चमत्कार देखकर सभी की आँखें फटी की फटी रह गईं। बकरी का वजन बिल्कुल उतना ही था, जितना एक महीने पहले था—न एक ग्राम कम, न एक ग्राम ज्यादा!
चतुराई का खुलासा
बादशाह अकबर आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने बीरबल से पूछा, “बीरबल, यह कैसे संभव हुआ? तुमने इसे खिलाया भी और इसका वजन भी नहीं बढ़ा? क्या तुमने इसे कोई जादुई दवा दी थी?”
बीरबल ने हाथ जोड़कर मुस्कुराते हुए कहा, “जहाँपनाह, कोई जादू नहीं था। मैंने इसे रोज हरी घास और चने खिलाए। लेकिन भोजन कराने के बाद, मैं इसे रोज कुछ समय के लिए एक पिंजरे में बंद शेर के सामने खड़ा कर देता था। मौत को अपने सामने देखकर यह इतनी डर जाती थी कि इसका खाया-पिया सब हजम हो जाता था। इसी मानसिक तनाव और भय के कारण इसका वजन स्थिर रहा।”
बीरबल की इस गजब की बुद्धिमानी को देखकर बादशाह अकबर बेहद प्रसन्न हुए। उन्होंने एक बार फिर बीरबल के लोहे को माना और उन्हें सोने की मोहरों और कीमती उपहारों से पुरस्कृत किया।
कहानी की सीख
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि मानसिक तनाव और भय अच्छे से अच्छे शारीरिक पोषण को भी नष्ट कर देते हैं। स्वस्थ शरीर के लिए केवल अच्छा भोजन ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि भयमुक्त और शांत मन का होना भी उतना ही आवश्यक है।
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