
बात उन दिनों की है जब शहंशाह अकबर मुगल सल्तनत पर राज करते थे। उनके दरबार में ज्ञान, कला और बुद्धि का अद्भुत संगम था, जिसमें बीरबल अपनी तीक्ष्ण बुद्धि और हाजिरजवाबी के लिए सबसे प्रसिद्ध थे। अकबर अक्सर बीरबल की परीक्षा लेने या साम्राज्य की समस्याओं को सुलझाने के लिए उनसे अजीबोगरीब सवाल पूछा करते थे।
अकबर की नई चिंता और अनोखा विचार
एक दिन, महाराज अकबर अपने महल के झरोखे से प्रजा को देख रहे थे। उनके मन में अचानक एक विचार आया। उन्होंने देखा कि कुछ लोग बहुत कड़ी मेहनत कर रहे हैं, जबकि कुछ लोग पेड़ की छांव में आराम से सो रहे हैं। अकबर को लगा कि जो लोग बहुत आलसी हैं, वे जीवन यापन करने के लिए धन नहीं कमा पाते होंगे और भूखे सोते होंगे।
अगले दिन दरबार में अकबर ने यह मुद्दा उठाया। उन्होंने बीरबल से कहा, “बीरबल, मुझे लगता है कि हमारे राज्य में बहुत से ऐसे लोग हैं जो इतने आलसी हैं कि वे अपने लिए भोजन का प्रबंध भी नहीं कर सकते। एक राजा होने के नाते, मेरा यह कर्तव्य है कि मैं उनकी मदद करूँ। मैं राज्य के सभी आलसियों के लिए मुफ्त भोजन और रहने की व्यवस्था करना चाहता हूँ।”
बीरबल ने मुस्कुराते हुए कहा, “जहाँपनाह! आपका विचार बहुत दयालुतापूर्ण है, लेकिन यदि आप ऐसा करेंगे, तो राज्य में आलसियों की संख्या अचानक बहुत बढ़ जाएगी। लोग बिना काम किए मुफ्त का भोजन पाने के लिए खुद को आलसी घोषित कर देंगे।”
अकबर ने बीरबल की बात से असहमति जताते हुए कहा, “नहीं बीरबल, कोई भी स्वाभिमानी व्यक्ति बिना कारण खुद को आलसी क्यों कहेगा? हम केवल वास्तविक आलसियों की ही मदद करेंगे।”
बीरबल की योजना और ‘आलसी घर’ का निर्माण
बीरबल जानते थे कि केवल बहस करने से महाराज नहीं मानेंगे, इसलिए उन्होंने अपनी योजना बनाई। बीरबल ने कहा, “ठीक है जहाँपनाह, हम राज्य के सभी आलसियों के लिए एक बहुत बड़ा ‘आलसी निवास’ (आलसियों के रहने का स्थान) बनवाते हैं। वहाँ उन्हें बिना किसी काम के स्वादिष्ट भोजन और आराम का बिस्तर मिलेगा। लेकिन हमें पहले उनकी संख्या का पता लगाना होगा।”
अकबर ने तुरंत आदेश देकर एक बड़ा सा आशियाना तैयार करवाया। पूरे राज्य में ढिंढोरा पिटवा दिया गया कि “जो कोई भी राज्य का सबसे बड़ा आलसी है, वह मुफ्त भोजन और आश्रय के लिए नए बने सरकारी निवास में आ सकता है।”
घोषणा होते ही, पूरे राज्य से लोग दौड़ पड़े। जो लोग दिन-रात खेतों में मेहनत करते थे, उन्होंने भी काम छोड़ दिया और आलसी बनकर वहाँ पहुँच गए। कुछ ही दिनों में वह विशाल भवन खचाखच भर गया। हजारों लोग वहाँ आराम से खा-पीकर सो रहे थे।
यह देखकर अकबर बहुत खुश हुए कि वे इतने सारे लोगों की मदद कर रहे हैं। उन्होंने बीरबल से कहा, “देखो बीरबल! मैंने कहा था ना कि हमारे राज्य में कितने गरीब और आलसी लोग हैं। अच्छा हुआ हमने यह कदम उठाया।”
बीरबल ने जवाब दिया, “जहाँपनाह, थोड़ा धैर्य रखें। इनमें से अधिकांश लोग केवल मुफ्त का खाना खाने के लिए आलसी होने का नाटक कर रहे हैं। असली आलसी तो इनमें बहुत कम हैं। मुझे कुछ समय दीजिए, मैं आपको असली आलसियों की संख्या बताऊंगा।”
असली आलसियों की परीक्षा: लगी भयानक आग!
अपनी योजना के अनुसार, एक दिन बीरबल ने सैनिकों को गुप्त रूप से आदेश दिया कि उस आलसी निवास में सूखी घास डलवाकर आग लगा दी जाए। सैनिकों ने ऐसा ही किया। देखते ही देखते उस भवन के एक हिस्से से भयंकर लपटें और धुआं उठने लगा।
जैसे ही “आलसी निवास” में रह रहे लोगों ने आग की लपटें देखीं और धुएं की गंध सूंघी, वहाँ भगदड़ मच गई। जो लोग खुद को बहुत बड़ा आलसी बता रहे थे, वे अपनी जान बचाने के लिए सबसे पहले बाहर भागे। कुछ ही मिनटों में पूरा मैदान खाली हो गया। हजारों की भीड़ गायब हो चुकी थी।
लेकिन, जब सैनिकों ने अंदर जाकर देखा, तो वे हैरान रह गए। उस जलते हुए घर के बीचों-बीच अभी भी तीन लोग लेटे हुए थे। वे अपनी जगह से हिले तक नहीं थे।
अकबर और बीरबल भी वहाँ पहुँच चुके थे। उन्होंने उन तीनों के पास जाकर उनकी बातें सुनीं।
पहला आलसी बोला, “यार, बड़ी गर्मी लग रही है। ऐसा लग रहा है कि कहीं आस-पास आग लगी है।”
दूसरा आलसी, बिना आँखें खोले बोला, “हाँ, मुझे भी तपन महसूस हो रही है। कोई जाकर देखो तो सही क्या बात है।”
तीसरा आलसी चिढ़कर बोला, “तुम दोनों कितना बोलते हो! चुपचाप सोए क्यों नहीं रहते? कोई न कोई पानी डाल ही देगा।”
तीनों की यह बातचीत सुनकर अकबर की आँखें फटी की फटी रह गईं। वे समझ गए कि वास्तव में केवल यही तीन लोग सच्चे आलसी हैं, जो मौत को सामने देखकर भी उठने का कष्ट नहीं करना चाहते थे। बाकी सब तो केवल मुफ्त की सुख-सुविधाओं का आनंद लेने आए पाखंडी थे।
बीरबल की बुद्धिमानी और सीख
अकबर ने तुरंत बीरबल की बुद्धिमानी की प्रशंसा की। बीरबल ने साबित कर दिया था कि मुफ्त की चीजें लोगों को कामचोर बना देती हैं और असली और नकली की पहचान केवल परीक्षा की घड़ी में ही होती है। अकबर ने उन तीन आलसियों को छोड़कर बाकी सभी को काम पर वापस लौटने का आदेश दिया और उन तीनों के लिए सीमित सहायता की व्यवस्था की।
इस कहानी से हमें सीख मिलती है कि मुफ्त की सुख-सुविधाएं व्यक्ति को पुरुषार्थहीन बना देती हैं। साथ ही, किसी भी व्यक्ति या परिस्थिति को बिना जांचे-परखे उस पर विश्वास नहीं करना चाहिए।
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