
परिचय
मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ न केवल समाज का दर्पण होती हैं, बल्कि वे मानवीय स्वभाव की उन गहराइयों को भी छूती हैं जहाँ तक साधारण दृष्टि नहीं पहुँच पाती। उनकी प्रसिद्ध कहानी ‘बालक’ एक ऐसी ही रचना है, जो उदारता, प्रेम और सामाजिक पूर्वाग्रहों के अंत को बहुत ही खूबसूरती से चित्रित करती है। यह कहानी हमें सिखाती है कि महानता किसी पद या प्रतिष्ठा में नहीं, बल्कि हृदय की शुद्धता में होती है।
गंगू: एक अनोखा पात्र
कहानी का मुख्य पात्र ‘गंगू’ है, जो कथावाचक (लेखक) के घर में एक नौकर के रूप में काम करता है। गंगू अन्य नौकरों से काफी अलग है। वह ब्राह्मण है और स्वयं को उच्च कुल का मानता है, लेकिन उसमें रत्ती भर भी अहंकार नहीं है। वह न तो नशा करता है और न ही फालतू की बातें। उसका स्वभाव शांत और गंभीर है।
एक दिन गंगू लेखक के पास आकर झिझकते हुए अपनी नौकरी छोड़ने की बात कहता है। लेखक को आश्चर्य होता है और वे इसका कारण पूछते हैं। गंगू बताता है कि वह ‘गोमती’ नाम की एक स्त्री से विवाह करना चाहता है। गोमती एक ऐसी स्त्री है जिसे समाज ‘कुलटा’ और ‘चरित्रहीन’ मानता है। उसने दो बार पहले भी शादी की थी, लेकिन वह टिक नहीं पाई। लेखक उसे समझाने की कोशिश करते हैं कि वह एक मुसीबत मोल ले रहा है, लेकिन गंगू अपने निर्णय पर अडिग रहता है। वह कहता है, “लोग उसे गलत समझते हैं, लेकिन वह बहुत दुखी है। उसे सहारे की जरूरत है।”
त्याग और प्रेम का संगम
गंगू नौकरी छोड़ देता है और गोमती के साथ रहने लगता है। कुछ महीनों बाद, खबर आती है कि गोमती गंगू को छोड़कर कहीं भाग गई है। लेखक को लगता है कि उनकी बात सच साबित हुई और गंगू को अब पछतावा हो रहा होगा। लेकिन जब गंगू लेखक से मिलता है, तो उसकी आँखों में दुःख तो था, पर गोमती के प्रति कोई नफरत नहीं थी। वह कहता है, “वह मुझे छोड़कर नहीं गई है, वह तो शायद मुझ पर बोझ नहीं बनना चाहती थी।”
गंगू के इस अटूट विश्वास ने लेखक को सोच में डाल दिया। गंगू गोमती को ढूंढने निकल जाता है।
बालक का आगमन और हृदय परिवर्तन
कुछ हफ्तों बाद, गंगू फिर से लेखक के पास आता है। इस बार उसकी गोद में एक छोटा सा नवजात बालक था और उसके चेहरे पर एक दिव्य मुस्कान थी। वह बताता है कि गोमती अस्पताल में मिली और यह बालक उसी का है।
लेखक को गणित समझ आ गया कि शादी को अभी कुछ ही महीने हुए हैं और बच्चा पैदा हो गया। लेखक ने व्यंग्य करते हुए कहा, “यह तुम्हारा बच्चा तो नहीं हो सकता, फिर तुम इतने खुश क्यों हो?”
गंगू ने बहुत ही सरलता और प्रेम से उत्तर दिया, “हुजूर, यह खेत मेरा है तो इसमें उगी फसल भी मेरी ही हुई। बालक तो भगवान का रूप होता है। क्या हुआ अगर यह मेरा सगा नहीं है? यह मासूम तो मेरा ही सहारा है।”
गंगू की यह निस्वार्थ भावना देखकर लेखक का सिर शर्म से झुक गया। लेखक, जो खुद को बहुत समझदार और आधुनिक मानते थे, गंगू की उस उदारता के सामने खुद को बहुत छोटा महसूस करने लगे। उन्होंने महसूस किया कि सच्चा मनुष्य वही है जो दूसरे के दुख और उसके अतीत को भुलाकर उसे गले लगा सके। लेखक ने उस बालक को गोद में ले लिया और गंगू को बधाई दी।
निष्कर्ष
‘बालक’ कहानी मुंशी प्रेमचंद की उन चुनिंदा कहानियों में से है जो मनुष्य की आंतरिक पवित्रता को उजागर करती है। यह कहानी सामाजिक बंधनों और ‘नाम’ की झूठी मर्यादाओं को तोड़कर मानवता का संदेश देती है। गंगू जैसा अनपढ़ और गरीब व्यक्ति अपने व्यवहार से यह सिद्ध कर देता है कि प्रेम और करुणा ही संसार के सबसे बड़े सत्य हैं।
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