
मुंशी प्रेमचंद की कहानियों में भारतीय ग्रामीण जीवन, पारिवारिक संघर्ष और मानवीय संवेदनाओं का जो जीवंत चित्रण मिलता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। ‘अलग्योझा’ (Alagyojha) भी एक ऐसी ही उत्कृष्ट और मर्मस्पर्शी कहानी है, जो संयुक्त परिवार के बिखराव, सौतेले रिश्तों की कड़वाहट और अंततः प्रेम व कर्तव्य की विजय को दर्शाती है। यह कहानी हमें सिखाती है कि खून के रिश्तों से बढ़कर इंसानियत, सहिष्णुता और कर्तव्य का रिश्ता होता है।
अलग्योझा का अर्थ और पृष्ठभूमि
ग्रामीण अंचल में ‘अलग्योझा’ का अर्थ होता है—परिवार का आपसी बंटवारा या चूल्हा अलग होना। जब एक संयुक्त परिवार के सदस्य वैचारिक मतभेद या आपसी कलह के कारण अलग-अलग रहने और खाने लगते हैं, तो उसे अलग्योझा कहा जाता है। प्रेमचंद जी ने इस कहानी के माध्यम से ग्रामीण समाज की इस कड़वी सच्चाई को बेहद संजीदगी से उकेरा है।
भोला का परिवार और रघु का समर्पण
कहानी की शुरुआत होती है भोला नामक एक सीधे-साधे किसान के परिवार से। भोला की पहली पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी। पहली पत्नी से उसका एक बेटा था—रघु। भोला ने पन्ना नाम की स्त्री से दूसरा विवाह किया, जिससे उसके दो और बेटे हुए—केदार और कन्हैया।
रघु स्वभाव से अत्यंत सीधा, मेहनती और आज्ञाकारी था। अपनी सौतेली माँ पन्ना और सौतेले भाइयों के प्रति उसके मन में कोई द्वेष नहीं था। वह दिन-रात खेतों में पसीना बहाता ताकि उसका परिवार सुखी रह सके। वह स्वयं फटेहाल रहता, लेकिन भाइयों की हर जरूरत को पूरा करना अपना पहला कर्तव्य समझता था। रघु के इस निस्वार्थ समर्पण के कारण ही पूरा घर सुचारू रूप से चल रहा था।
सौतेली माँ पन्ना की असुरक्षा और कलह की शुरुआत
जैसे-जैसे समय बीता, रघु का विवाह मूला नाम की युवती से हो गया। मूला भी अपने पति की तरह ही स्वाभिमानी थी। अब पन्ना के मन में धीरे-धीरे असुरक्षा की भावना पनपने लगी। उसे लगा कि रघु पूरे घर और संपत्ति पर अपना अधिकार जमा रहा है और उसके अपने बेटों (केदार और कन्हैया) का भविष्य खतरे में है। पन्ना की यह ईर्ष्या धीरे-धीरे कलह का रूप लेने लगी।
पन्ना अक्सर मूला को ताने मारती और घर के कामों को लेकर विवाद खड़ा करती। रघु हर विवाद को चुपचाप सह लेता और अपनी पत्नी को भी शांत रहने की सलाह देता। लेकिन पन्ना का द्वेष कम होने का नाम नहीं ले रहा था। अंततः पन्ना ने जिद पकड़ ली कि अब वह रघु के साथ मिलकर नहीं रह सकती और उसने बंटवारे की मांग कर दी।
अलग्योझा: जब बिखर गया हंसता-खेलता परिवार
भोला अपनी पत्नी पन्ना के आगे लाचार था। भारी मन से उसने बंटवारे का निर्णय लिया। अलग्योझा के समय रघु ने अपनी महानता का परिचय दिया। उसने पन्ना और उसके बेटों को अच्छे और उपजाऊ खेत दे दिए और खुद के हिस्से में बंजर जमीन तथा टूटा-फूटा मकान रख लिया।
अलग्योझा केवल संपत्ति का विभाजन नहीं था, बल्कि यह दिलों का टूटना था। रघु को अलग देखकर पूरा गांव पन्ना की आलोचना कर रहा था, लेकिन पन्ना को लग रहा था कि अब वे स्वतंत्र और सुखी रहेंगे। परंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था।
विपत्ति का पहाड़ और रघु का बड़प्पन
बंटवारे के कुछ समय बाद ही भोला गंभीर रूप से बीमार पड़ गया और उसकी मृत्यु हो गई। भोला की मृत्यु के बाद पन्ना के परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। केदार और कन्हैया कामचोर और गैर-जिम्मेदार थे। उन्हें खेती का कोई अनुभव नहीं था। धीरे-धीरे उनकी आर्थिक स्थिति खराब होने लगी। कर्ज का बोझ बढ़ता गया और उनके बैल भी मर गए।
इस कठिन घड़ी में भी रघु मूकदर्शक बनकर नहीं रह सका। सौतेली माँ और भाइयों द्वारा किए गए दुर्व्यवहार को भुलाकर रघु उनकी मदद के लिए आगे आया। उसने न केवल अपने बैलों से उनके खेतों की जुताई की, बल्कि अपनी जमा-पूंजी से उनके लिए अनाज और चारे की व्यवस्था भी की। रघु ने केदार और कन्हैया को बड़े भाई की तरह डांटकर सही राह पर लाया और उन्हें जिम्मेदार बनाया।
प्रायश्चित और पुनर्मिलन
रघु की इस निस्वार्थ सेवा, उदारता और बड़प्पन ने पन्ना के भीतर की ईर्ष्या और नफरत को पूरी तरह पिघला दिया। उसे अपनी भूल का गहरा अहसास हुआ। वह समझ गई कि जिस रघु को वह पराया समझकर दूर कर रही थी, वही वास्तव में संकट के समय उनका सच्चा सहारा बना। पन्ना की आँखें भर आईं और उसने रघु से रोते हुए अपने किए की माफी मांगी।
निष्कर्ष: प्रेमचंद जी का संदेश
‘अलग्योझा’ कहानी के माध्यम से मुंशी प्रेमचंद जी ने यह संदेश दिया है कि भौतिक वस्तुओं और जमीन-जायदाद का बंटवारा तो किया जा सकता है, लेकिन यदि मन में स्नेह, आत्मीयता और कर्तव्य की भावना जीवित है, तो रिश्तों को बिखरने से बचाया जा सकता है। रघु का चरित्र हमें सहनशीलता, त्याग और बड़प्पन की सीख देता है।
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