पाप का अग्निकुंड

Paap Ka Agnikund

परिचय: धर्म का मुखौटा और लोभ की भूख

बनारस के समीप बसे शिवपुर गाँव में पंडित रामशरण का बड़ा मान-सम्मान था। माथे पर त्रिपुंड चंदन, गले में रुद्राक्ष की माला और जुबान पर हमेशा राम-नाम का वास। गाँव का कोई भी व्यक्ति उनके बिना किसी धार्मिक अनुष्ठान की कल्पना नहीं कर सकता था। लोग उन्हें निष्पाप और साक्षात् धर्मराज मानते थे। लेकिन सत्य तो यह था कि रामशरण के भीतर लोभ और कपट का एक ऐसा अंधकार पनप रहा था, जिसे उनकी चमकीली धार्मिक आभा ने बड़ी चतुराई से ढक रखा था।

उसी गाँव में फूलमती नाम की एक गरीब विधवा रहती थी। उसके पति की अकाल मृत्यु के बाद, उसके पास जीने का एकमात्र सहारा उसकी डेढ़ बीघा उपजाऊ ज़मीन और उसका आठ साल का बेटा माधव था। फूलमती दिन-रात हाड़-तोड़ मेहनत करके अपने बेटे का पेट पालती थी। लेकिन रामशरण की कुटिल नज़रें काफी समय से फूलमती की उस उपजाऊ ज़मीन पर टिकी थीं।

षड्यंत्र का ताना-बाना और विश्वासघात

एक वर्ष गाँव में भयंकर सूखा पड़ा। फसलें बर्बाद हो गईं और फूलमती के घर में दाने-दाने की किल्लत हो गई। उसका बेटा माधव भूख से तड़पने लगा और बीमार पड़ गया। बेबस फूलमती मदद की गुहार लेकर पंडित रामशरण के पास पहुँची। रामशरण को अपनी चाल चलने का यह सबसे सही अवसर लगा।

उन्होंने अत्यंत सहानुभूति दिखाते हुए कहा, “फूलमती, तू घबरा मत। विपत्ति के समय एक ब्राह्मण ही दूसरे के काम आता है। मैं तुझे माधव के इलाज और अनाज के लिए पैसे दूँगा। बस, तू सुरक्षा के तौर पर अपनी ज़मीन के कागज़ात मेरे पास रख दे। जब तेरे पास पैसे आ जाएँ, तो अपनी ज़मीन वापस ले लेना।”

सरल स्वभाव की फूलमती पंडित जी के इस जाल को समझ नहीं पाई। उसने अश्रुपूरित नेत्रों से रामशरण के पैर छुए और कोरे कागज़ पर अपने अँगूठे का निशान लगा दिया। उसे क्या पता था कि वह अपनी ज़मीन नहीं, बल्कि अपनी और अपने बच्चे की किस्मत उस कागज़ पर गिरवी रख रही थी।

पाप की नींव पर खड़ा आलीशान साम्राज्य

कुछ ही महीनों में सूखे का प्रकोप कम हुआ। जब फूलमती कर्ज चुकाने और अपनी ज़मीन वापस लेने पंडित जी के द्वार पर पहुँची, तो रामशरण के तेवर बदले हुए थे। उन्होंने कड़ककर कहा, “कैसी ज़मीन? वह ज़मीन तो तूने मुझे बेच दी है। यह देख, तेरे अँगूठे का निशान! अब यहाँ से चली जा, वरना गाँव वालों के सामने मुँह दिखाने लायक नहीं बचेगी।”

फूलमती के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह रोई, गिड़गिड़ाई, लेकिन रामशरण का दिल नहीं पसीजा। उसने पंचायत बुलाई, परंतु पंडित जी के रसूख और जाली दस्तावेज़ों के सामने एक लाचार विधवा की आवाज़ दबकर रह गई। थक-हारकर फूलमती अपने बेटे को लेकर गाँव छोड़कर चली गई, लेकिन जाते-जाते उसकी आँखों से निकले आँसू और उसकी मूक आहें रामशरण के घर की चौखट पर अपना साया छोड़ गईं।

रामशरण ने उस ज़मीन पर एक विशाल अनाज का गोदाम बनवाया। व्यापार दिन दूना रात चौगुना बढ़ने लगा। वह ज़मीन सोने की खान साबित हो रही थी। लेकिन बाहरी समृद्धि के पीछे एक अदृश्य आग सुलगने लगी थी, जो धीरे-धीरे रामशरण के जीवन को भस्म करने के लिए तैयार हो रही थी।

अंतरात्मा का अग्निकुंड और पश्चाताप की तड़प

कहते हैं कि ईश्वर के यहाँ देर है, अंधेर नहीं। रामशरण का इकलौता पुत्र, देवव्रत, जिसे वह अपने प्राणों से भी बढ़कर प्यार करता था, अचानक एक अज्ञात और गंभीर बीमारी की चपेट में आ गया। बड़े से बड़े वैद्यों और डॉक्टरों को बुलाया गया, पानी की तरह पैसा बहाया गया, लेकिन देवव्रत की हालत बिगड़ती ही गई।

रात के सन्नाटे में, जब पूरा गाँव सो जाता, रामशरण को अपने ही घर में अजीब सी बेचैनी महसूस होती। हवा की सरसराहट में उसे फूलमती के रोने की आवाज़ सुनाई देती। जब वह अपनी आँखें बंद करता, तो उसे दिखाई देता कि उसका बेटा देवव्रत जलते हुए कोयलों के एक बड़े कुंड में खड़ा है और मदद के लिए पुकार रहा है। वह कुंड किसी और चीज़ का नहीं, बल्कि उसके द्वारा किए गए पापों का ‘अग्निकुंड’ था।

एक रात देवव्रत की हालत बहुत नाजुक हो गई। वह तेज़ बुखार में बड़बड़ा रहा था, “पिताजी, मुझे बचाइए! यह आग मुझे जला रही है। फूलमती चाची खड़ी हैं, वे मुझे अपनी ओर खींच रही हैं!”

यह सुनते ही रामशरण के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई। उनका सारा अहंकार, उनकी धन-दौलत और समाज में उनका झूठा सम्मान एक पल में मिट्टी में मिल गया। उन्हें समझ आ गया कि उनके बेटे की इस हालत का कारण और कोई नहीं, बल्कि उनका अपना ही लोभ और पाप था। वे समझ गए कि जब तक वे उस पाप की आग को शांत नहीं करेंगे, तब तक उनका कुल सुखी नहीं हो सकता।

प्रायश्चित की राह और मुक्ति

सुबह होते ही पंडित रामशरण बदहवास हालत में फूलमती को खोजने निकल पड़े। कई दिनों की तलाश के बाद, उन्हें पता चला कि वह पास के एक शहर में मजदूरी करके अपना और अपने बेटे का जीवनयापन कर रही है। रामशरण जब वहाँ पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि फूलमती भूख से बेहाल, मिट्टी में काम कर रही थी।

रामशरण बिना देर किए उसके पैरों में गिर पड़े। उनकी आँखों से अविरल अश्रुधारा बह रही थी। उन्होंने रोते हुए कहा, “फूलमती, मुझे क्षमा कर दो! मैं पापी हूँ, मैंने तुम्हारे साथ छल किया। यह लो तुम्हारी ज़मीन के कागज़ात और यह तुम्हारे नुकसान का हर्जाना। बस ईश्वर से प्रार्थना करो कि वह मेरे बेटे के प्राण बख्श दे।”

फूलमती का कोमल हृदय पिघल गया। उसने रामशरण को उठाया और कहा, “पंडित जी, मैंने तो आपको उसी दिन माफ कर दिया था, क्योंकि न्याय करने वाला तो ऊपर बैठा है।”

घर लौटकर जब रामशरण ने देखा, तो देवव्रत का बुखार उतर चुका था और वह मुस्कुरा रहा था। रामशरण को महसूस हुआ जैसे उनके भीतर सुलग रहा पाप का वह भयानक अग्निकुंड हमेशा के लिए शांत हो गया हो। उन्होंने समझ लिया था कि असली धर्म कर्मकांडों में नहीं, बल्कि मन की पवित्रता और परोपकार में है।

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