
मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि वे भारतीय समाज का एक जीवंत और यथार्थवादी दर्पण हैं। उनकी लेखनी ने हमेशा समाज के शोषित, वंचित और साधारण वर्ग की आवाज को बुलंद किया है। ऐसी ही एक बेहद संवेदनशील और मर्मस्पर्शी कहानी है ‘बेटी का धन’। यह कहानी हमारे समाज में फैले लालच, दहेज प्रथा और एक पिता के स्वाभिमान की अनूठी मिसाल पेश करती है। आइए, इस कालजयी रचना के गहरे भावों को महसूस करें।
गाँव का परिवेश और स्वाभिमानी अलगू भगत
गंगा किनारे बसे एक छोटे से गाँव में अलगू भगत रहते थे। अलगू बेहद गरीब थे, लेकिन उनका स्वाभिमान आसमान से भी ऊँचा था। उनके पास खेती के लिए नाममात्र की सूखी जमीन थी, जिससे बमुश्किल दो वक्त की रोटी का जुगाड़ हो पाता था। उनके जीवन का सबसे बड़ा सहारा और उनकी सबसे बड़ी पूंजी थी उनकी इकलौती बेटी—मंगला।
मंगला न केवल रूपवती थी, बल्कि वह अत्यंत संस्कारी, शीलवान और समझदार लड़की थी। गाँव का हर व्यक्ति मंगला के व्यवहार की प्रशंसा करता थ। समय बीतने के साथ मंगला विवाह योग्य हो गई। अब अलगू भगत के माथे पर चिंता की लकीरें गहरी होने लगी थीं। एक गरीब पिता के लिए उस दौर के समाज में बिना दहेज के बेटी की शादी करना किसी पहाड़ को तोड़ने जैसा कठिन काम था।
मर्यादा और लालच का भीषण द्वंद्व
अलगू भगत ने मंगला के लिए कई जगह रिश्ते की बात चलाई, लेकिन हर जगह से दहेज की भारी मांग सामने आती थी। अलगू अपनी गरीबी के कारण लाचार थे, लेकिन वे अपनी मर्यादा को किसी भी कीमत पर छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे।
तभी गाँव के एक धनी और बेहद लालची साहूकार, लाला रामदीन, की नजर मंगला पर पड़ी। रामदीन का बेटा एक नंबर का आवारा और व्यसनी था, जिससे कोई अपनी बेटी का ब्याह नहीं करना चाहता था। रामदीन ने अलगू के पास जाकर एक प्रस्ताव रखा, “अलगू भगत, तुम अपनी बेटी मंगला का हाथ मेरे बेटे के हाथ में दे दो। मैं तुमसे एक पैसा भी दहेज नहीं लूँगा। उल्टा, मैं तुम्हें मंगला के कन्यादान के बदले पाँच सौ रुपये नकद दूँगा।”
पाँच सौ रुपये उस जमाने में एक बहुत बड़ी रकम थी, जिससे अलगू की गरीबी हमेशा के लिए दूर हो सकती थी। लेकिन अलगू भगत ने जैसे ही यह प्रस्ताव सुना, उनका खून खौल उठा। वे जानते थे कि शास्त्रों और मर्यादा के अनुसार, अपनी बेटी के बदले धन लेना अपनी संतान को बेचने जैसा महापाप है।
बेटी का धन और पिता का संकल्प
अलगू भगत ने कड़े और स्वाभिमानी स्वर में लाला रामदीन से कहा, “लाला जी, मैं भले ही भूखा सो जाऊँगा, मेरी छाती फट जाएगी, पर मैं अपनी बेटी का सौदा कभी नहीं करूँगा। बेटी का धन खाना नरक के द्वार खोलने के समान है। मैं अपनी मर्यादा और अपनी बेटी की पवित्रता को रुपयों की तराजू में नहीं तौल सकता।”
लाला रामदीन तिलमिला गया और उसने अलगू को धमकी दी कि वह पूरे गाँव में मंगला की शादी कहीं नहीं होने देगा। लेकिन अलगू अपने फैसले पर चट्टान की तरह अडिग रहे। मंगला ने भी अपने पिता के इस फैसले का पूरे दिल से समर्थन किया। उसने अपने पिता के आँसू पोंछते हुए कहा, “पिताजी, आप तनिक भी चिंता न करें। हमारा स्वाभिमान ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है।”
स्वाभिमान की जीत और सुखद अंत
अलगू भगत की इस ईमानदारी और स्वाभिमान की चर्चा धीरे-धीरे आसपास के गाँवों में फैल गई। एक दिन पास के गाँव से एक सज्जन और कुलीन किसान, शिवराम, अलगू के घर पहुँचे। शिवराम का बेटा सुशिक्षित और सभ्य था। शिवराम ने अलगू भगत से कहा, “भगत जी, आज के इस कलयुग में आप जैसे स्वाभिमानी इंसान मिलना दुर्लभ है। मुझे दहेज का कोई लोभ नहीं है। मुझे तो आपके संस्कार और आपकी गुणी बेटी मंगला चाहिए।”
शिवराम की बातें सुनकर अलगू भगत की आँखों से खुशी के आँसू छलक पड़े। उन्होंने बिना किसी आडंबर और बिना किसी लेन-देन के अपनी बेटी मंगला का विवाह शिवराम के सुपुत्र के साथ अत्यंत सादगी से संपन्न कराया। इस प्रकार, अलगू भगत ने साबित कर दिया कि असली धन भौतिक वस्तुएं नहीं, बल्कि चरित्र, संस्कार और मान-मर्यादा हैं।
यह कहानी हमें आज भी यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम वाकई सामाजिक कुरीतियों से ऊपर उठ पाए हैं? मुंशी प्रेमचंद की यह कहानी हर दौर के समाज के लिए एक महान सीख है।
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