कहानी: पेन्टर (The Painter)

एक महान चित्रकार की यह प्रेरक कहानी हमें सिखाती है कि दूसरों में कमियाँ निकालना बेहद आसान है, लेकिन उन्हें सुधारना उतना ही कठिन। पढ़ें पूरी कहानी।

The Painter

कला केवल रंगों का मेल नहीं है, बल्कि यह कलाकार की आत्मा की अभिव्यक्ति है। एक सच्चा कलाकार अपनी कला में अपने प्राण फूंक देता है। यह कहानी भी एक ऐसे ही प्रतिभावान युवा पेन्टर की है, जिसका नाम रोहित था। रोहित को बचपन से ही चित्रकारी का बेहद शौक था। समय के साथ उसने अपनी इस कला को निखारा और वह शहर का सबसे लोकप्रिय चित्रकार बन गया। उसकी बनाई हर पेंटिंग में जीवंतता झलकती थी। लोग उसके काम की सराहना करते नहीं थकते थे।

सर्वश्रेष्ठ कृति की रचना

एक दिन रोहित ने सोचा कि वह एक ऐसी पेंटिंग बनाएगा जो उसकी जिंदगी की सबसे बेहतरीन कृति (Masterpiece) होगी। उसने दिन-रात एक कर दिए। वह अपनी सुध-बुध खोकर केवल कैनवास और रंगों की दुनिया में खो गया। करीब एक महीने की कड़ी मेहनत के बाद, उसने एक अद्भुत पेंटिंग तैयार की। उस चित्र में एक सुंदर जलाशय, उगता हुआ सूरज और उड़ते हुए पक्षी थे। वह पेंटिंग इतनी सजीव लग रही थी कि जो भी उसे देखता, बस देखता ही रह जाता।

रोहित को अपनी इस रचना पर बहुत गर्व हुआ। उसने सोचा कि क्यों न इस पेंटिंग को शहर के बीचों-बीच मुख्य चौराहे पर प्रदर्शित किया जाए, ताकि हर कोई उसकी इस अनूठी कला का दीदार कर सके।

एक अप्रत्याशित परीक्षा

रोहित ने अपनी पेंटिंग को शहर के सबसे व्यस्त चौराहे पर टांग दिया। लेकिन उसके मन में एक विचार आया। वह अपनी कला को और बेहतर बनाना चाहता था। इसलिए उसने पेंटिंग के नीचे एक बोर्ड लगा दिया, जिस पर लिखा था:

“मैंने अपनी जिंदगी की यह सबसे बेहतरीन पेंटिंग बनाई है। यदि किसी को भी इस पेंटिंग में कोई कमी या गलती नजर आए, तो कृपया उस स्थान पर लाल रंग से एक निशान (cross) लगा दें ताकि मैं उसे सुधार सकूं।”

यह लिखकर रोहित अपने घर वापस आ गया और उत्सुकता से अगले दिन का इंतजार करने लगा।

जब बिखर गया चित्रकार का हौसला

अगली सुबह, रोहित बड़ी उम्मीदों और उत्साह के साथ चौराहे पर पहुंचा। लेकिन जैसे ही उसने अपनी पेंटिंग को देखा, उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। उसकी आँखों में आंसू आ गए। पूरी की पूरी पेंटिंग लाल रंग के निशानों से भरी पड़ी थी। किसी ने सूरज पर निशान लगाया था, तो किसी ने पानी के रंगों पर। किसी ने पेड़ों की बनावट को गलत बताया था, तो किसी ने पक्षियों के पंखों को।

उस सुंदर पेंटिंग का अब कोई अस्तित्व ही नहीं बचा था। वह पूरी तरह से बर्बाद हो चुकी थी। रोहित का दिल टूट गया। उसे लगा कि वह एक अच्छा पेन्टर नहीं है और उसकी मेहनत पूरी तरह से बेकार चली गई। वह गहरे अवसाद में चला गया और उसने दोबारा कभी ब्रश न उठाने का फैसला कर लिया।

गुरु का मार्गदर्शन और जादुई सलाह

रोहित की इस हालत के बारे में जब उसके गुरु, जो कि स्वयं एक महान और अनुभवी चित्रकार थे, को पता चला, तो वे तुरंत रोहित से मिलने उसके घर पहुंचे। रोहित को इस तरह हताश देखकर उन्होंने इसका कारण पूछा।

रोहित ने रोते हुए कहा, “गुरुदेव, मैंने अपनी जिंदगी की सबसे बेहतरीन पेंटिंग बनाई थी, लेकिन लोगों ने उसमें इतनी कमियां निकाल दीं कि वह कबाड़ बन गई। अब मुझे लगता है कि मुझे चित्रकारी छोड़ देनी चाहिए। मुझमें कोई प्रतिभा नहीं है।”

गुरुजी मुस्कुराए और बोले, “बेटा, निराश मत हो। कल तुम ठीक वैसी ही एक और पेंटिंग बनाओ और मेरे पास लेकर आओ।”

रोहित को अपने गुरु पर पूरा भरोसा था। उसने एक बार फिर अपनी पूरी ताकत और लगन से वैसी ही एक और खूबसूरत पेंटिंग तैयार की और गुरुजी के सामने ले जाकर रख दी।

गुरुजी ने पेंटिंग देखी और कहा, “अब इसे उसी चौराहे पर ले जाओ, लेकिन इस बार इसके नीचे जो बोर्ड लगाओगे, उस पर कुछ अलग लिखना।”

रोहित ने पूछा, “क्या लिखना है गुरुदेव?”

गुरुजी ने कहा, इस बार लिखना:

“मैंने यह पेंटिंग बनाई है। यदि किसी को इस पेंटिंग में कोई भी कमी या गलती दिखाई दे, तो कृपया पास में रखे रंग और ब्रश का उपयोग करके उस गलती को सुधार दें।”

रोहित थोड़ा संशकित था, लेकिन उसने गुरुजी की बात मान ली। उसने पेंटिंग के बगल में रंग और ब्रश की एक कटोरी रख दी और घर लौट आया।

सत्य का रहस्योद्घाटन

अगले दिन, रोहित बहुत डरते हुए चौराहे पर पहुंचा। उसे लग रहा था कि आज भी उसकी पेंटिंग खराब हो चुकी होगी। लेकिन जब उसने पेंटिंग देखी, तो वह हैरान रह गया। पेंटिंग बिल्कुल वैसी की वैसी ही थी, जैसी वह छोड़ कर गया था। उस पर एक भी निशान नहीं था और न ही किसी ने उसे छूने की हिम्मत की थी।

रोहित को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। उसने एक दिन और इंतजार किया। दूसरा दिन भी बीत गया, तीसरा दिन भी बीत गया, लेकिन पेंटिंग को किसी ने हाथ तक नहीं लगाया। रंग और ब्रश वैसे ही रखे रहे।

रोहित भागा-भागा अपने गुरुजी के पास गया और सारा माजरा सुनाया।

गुरुजी हँसे और बोले, “देखा रोहित! यही जीवन का सबसे बड़ा सच है। दुनिया में दूसरों की कमियां निकालना, उन पर उंगली उठाना बहुत आसान काम है। इसलिए जब तुमने लोगों से सिर्फ कमियां बताने को कहा, तो हर किसी ने अपनी बुद्धि के अनुसार उसमें गलतियां ढूंढ निकालीं और उसे खराब कर दिया।”

गुरुजी ने आगे समझाते हुए कहा, “लेकिन जब तुमने उन्हीं लोगों से उन कमियों को ‘सुधारने’ के लिए कहा, तो कोई आगे नहीं आया। क्योंकि सुधारने के लिए योग्यता, ज्ञान और मेहनत की आवश्यकता होती है, जो बहुत कम लोगों के पास होती है। केवल आलोचना करने वालों की बातों से डरकर अपनी कला और अपने सपनों को कभी मत छोड़ना।”

रोहित को अपनी गलती का अहसास हो चुका था। उसकी आँखों से निराशा के बादल छंट गए थे। उसने अपने गुरु के पैर छुए और एक बार फिर पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने ब्रश को थाम लिया।

कहानी से सीख (Moral of the Story)

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि दुनिया में बिना वजह आलोचना करने वाले लोगों की कोई कमी नहीं है। दूसरों के काम में नुक्स निकालना सबसे आसान काम है। हमें ऐसे आलोचकों की बातों से प्रभावित होकर अपने आत्मविश्वास को कभी डगमगाने नहीं देना चाहिए। यदि कोई आपकी आलोचना करता है, तो उससे यह भी पूछें कि इसे सुधारा कैसे जाए। आपको खुद ही पता चल जाएगा कि सचमुच मदद करने वाले कितने कम लोग हैं। अपनी कला और मेहनत पर हमेशा विश्वास रखें।


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