
महानगरों की चकाचौंध में अक्सर इंसान खुद को खो देता है। वह जितना आगे बढ़ता है, पीछे बहुत कुछ ऐसा छोड़ जाता है जो उसकी आत्मा का हिस्सा होता है। राघव के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था। मुंबई की गगनचुंबी इमारतों, एसी केबिन और भागती हुई जिंदगी के बीच, वह यह भूल चुका था कि सुकून क्या होता है। लेकिन आज, जब उसके फ्लैट की खिड़की पर बारिश की बूंदें दस्तक दे रही थीं, तो राघव का मन अतीत की तंग लेकिन बेहद खूबसूरत गलियों में भटकने लगा। उसे याद आई अपनी ‘मीरा’ और वो छोटा सा शहर, जहां उसका दिल आज भी धड़कता था।
राघव और मीरा की प्रेम कहानी कोई साधारण कहानी नहीं थी। यह दो रूहों का मिलन था, जो वक्त के थपेड़ों और करियर की अंधी दौड़ के कारण अलग हो गए थे। पांच साल पहले, राघव अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने और अपने सपनों को पंख देने के लिए अपना वतन छोड़कर महानगर चला आया था। मीरा ने उसे रोका नहीं, क्योंकि वह जानती थी कि राघव के सपने बहुत बड़े हैं। लेकिन जाते-जाते राघव ने मीरा का हाथ थामकर वादा किया था कि वह जल्द ही वापस आएगा। वो ‘वापसी’ आज पांच साल बाद होने जा रही थी।
यादों का वो पुराना संदूक
इन पांच सालों में राघव ने सफलता के कई शिखर छुए। उसके पास बड़ी गाड़ी थी, आलीशान फ्लैट था और समाज में एक नाम था। लेकिन इस सब के बावजूद, उसके भीतर एक गहरा खालीपन था। जब भी वह रात को थका-हारा अपने बिस्तर पर लेटता, तो उसे मीरा की वो मासूम मुस्कान याद आती, जो उसकी सारी थकान को पल भर में दूर कर दिया करती थी।
आज राघव ने फैसला कर लिया था। उसने अपनी सूटकेस पैक की और ऑफिस से लंबी छुट्टी ले ली। इस बार वह किसी बिजनेस ट्रिप पर नहीं जा रहा था, बल्कि अपनी जिंदगी को वापस पाने के लिए जा रहा था। ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए, उसके दिमाग में पुरानी यादें किसी फिल्म की तरह चल रही थीं। वो पहली मुलाकात, कॉलेज की लाइब्रेरी, वो शाम की चाय और बारिश में एक ही छतरी के नीचे चलना—सब कुछ कितना जीवंत था, जैसे कल की ही बात हो।
फैसले और फासले
राघव को याद था कि कैसे उसने और मीरा ने भविष्य के सपने बुने थे। लेकिन जब हकीकत का सामना हुआ, तो दोनों के रास्ते अलग हो गए। राघव को लगता था कि पैसा और रुतबा ही सब कुछ है, जबकि मीरा का मानना था कि प्यार और अपनों का साथ ही जीवन की असली पूंजी है। इसी वैचारिक मतभेद ने उनके बीच फासले बढ़ा दिए थे। सालों तक दोनों के बीच बातचीत बंद रही, लेकिन दिल के किसी कोने में प्यार की लौ आज भी जल रही थी।
जैसे ही ट्रेन ने राघव के छोटे से रेलवे स्टेशन पर कदम रखा, मिट्टी की सोंधी खुशबू ने उसका स्वागत किया। हवा में एक अजीब सा अपनापन था, जो उसे मुंबई की हवाओं में कभी महसूस नहीं हुआ। राघव ने एक गहरी सांस ली। उसे महसूस हुआ कि उसकी असली ‘वापसी’ अब शुरू हुई है।
वो मुलाकात और अधूरी बातें
राघव सीधे मीरा के घर की तरफ बढ़ा। उसका दिल किसी ढोल की तरह बज रहा था। घबराहट और उत्साह के मिश्रित भाव उसके चेहरे पर साफ देखे जा सकते थे। क्या मीरा ने उसे माफ कर दिया होगा? क्या आज भी मीरा के दिल में उसके लिए वही जगह होगी? इन सवालों का जवाब सिर्फ मीरा के पास था।
जैसे ही राघव ने मीरा के पुराने लकड़ी के दरवाजे पर दस्तक दी, समय जैसे थम सा गया। कुछ सेकंड बाद दरवाजा खुला, और सामने मीरा खड़ी थी। नीली साड़ी में सादगी की मूरत बनी मीरा की आंखों में राघव को देखते ही हैरानी, दर्द, और फिर एक अजीब सी चमक तैर गई। दोनों के पास कहने को बहुत कुछ था, लेकिन शब्द जैसे कहीं खो गए थे। खामोशी ही उस वक्त सबसे बड़ी जुबान बन गई थी।
“तुम… यहाँ?” मीरा के होंठों से सिर्फ इतना ही निकला।
“हां मीरा, मैं अपनी वापसी पूरी करने आया हूं। मुझे माफ कर दो, मुझे समझने में बहुत देर लगी कि मेरी असली दुनिया सिर्फ तुम्हारे पास है,” राघव ने अपनी नम आंखों से मीरा की तरफ देखते हुए कहा।
मीरा ने मुस्कुराते हुए अपनी आंखों के आंसू पोंछे और राघव को घर के अंदर बुलाया। चाय की चुस्कियों के साथ, सालों के गिले-शिकवे और दूरियां पिघलने लगीं। राघव ने महसूस किया कि कामयाबी के शिखर पर पहुंचकर भी वह जो अधूरापन महसूस कर रहा था, वह आज मीरा के हाथ की बनी चाय पीकर और उसके साथ बैठकर खत्म हो गया था। यह सिर्फ एक प्रेमी की अपनी प्रेमिका के पास वापसी नहीं थी, बल्कि एक भटके हुए इंसान की अपने वजूद की तरफ वापसी थी।
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