
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हर इंसान किसी न किसी कुरुक्षेत्र में लड़ रहा है। दिल्ली की कड़कड़ाती धूप और ऑफिस के काम के भारी बोझ से दबा माधव पार्क के एक कोने में सिर झुकाए बैठा था। उसकी आँखों में निराशा थी और दिल में अनगिनत अनसुलझे सवाल। वह एक मल्टीनेशनल कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर था, जहाँ राजनीति, ईर्ष्या और काम का दबाव उसकी मानसिक शांति को पूरी तरह छीन चुके थे। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह इस कुरुक्षेत्र में कैसे जीवित रहे।
एक अनजानी और जादुई मुलाकात
माधव अपनी ही उलझनों में खोया हुआ था कि तभी एक साधारण सा दिखने वाला युवक उसके बगल वाले बेंच पर आकर बैठ गया। उस युवक के चेहरे पर एक अजीब सा तेज और होंठों पर एक शांत, मनमोहक मुस्कान थी। उसने पीले रंग की शर्ट पहनी हुई थी और उसके गले में एक साधारण सा धागा था।
उसने माधव की तरफ देखा और बेहद मधुर आवाज में पूछा, “क्या बात है पार्थ? बड़े परेशान दिखते हो?”
माधव ने चौंककर उसकी तरफ देखा। उसने सोचा कि शायद इस व्यक्ति ने उसे कोई और समझ लिया है। माधव ने कहा, “मेरा नाम माधव है, पार्थ नहीं। और परेशान क्यों न हूँ? आज की दुनिया में ईमानदारी से जीना और काम करना कंक्रीट के जंगल में नंगे पैर चलने जैसा है। हर कोई एक-दूसरे को पीछे धकेलने में लगा है।”
वह अजनबी मुस्कुराया और बोला, “नाम में क्या रखा है माधव। आज के युग में हर वह इंसान अर्जुन (पार्थ) है जो अपने ही जीवन के कुरुक्षेत्र में अपनों से, अपनी परिस्थितियों से और खुद से लड़ रहा है।”
आज के युग का कुरुक्षेत्र और कौरव
माधव को उस अजनबी की बातें थोड़ी अजीब लेकिन बेहद दिलचस्प लगीं। उसने पूछा, “तुम बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हो। द्वापर युग में तो अर्जुन के सामने साक्षात भगवान कृष्ण थे, जिन्होंने उनका मार्गदर्शन किया। आज हमारा मार्गदर्शन कौन करेगा? आज का कृष्ण कहाँ है? क्या वह इस कलयुग के भ्रष्टाचार, स्वार्थ और तनाव को दूर करने आएगा?”
अजनबी ने पार्क में उड़ती धूल की तरफ इशारा करते हुए कहा, “माधव, तुम कृष्ण को कहाँ ढूंढ रहे हो? क्या तुम्हें लगता है कि कृष्ण केवल द्वापर युग में रथ पर बैठकर उपदेश देने तक सीमित थे? कृष्ण कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि एक चेतना हैं। वह हर युग में, हर क्षण तुम्हारे पास होते हैं, बस तुम्हें उन्हें देखने और महसूस करने की जरूरत है।”
उसने आगे समझाया, “आज तुम्हारे ऑफिस की राजनीति, तुम्हारा अहंकार, ईर्ष्या, और खुद पर अविश्वास ही आज के ‘कौरव’ हैं। और तुम्हारी अंतरात्मा की वह आवाज, जो तुम्हें हमेशा सही रास्ता चुनने के लिए प्रेरित करती है, वही ‘आज का कृष्ण’ है।”
कर्म और परिणाम की उलझन
माधव ने ठंडी सांस लेते हुए कहा, “यह सब सुनने में अच्छा लगता है। लेकिन असल जिंदगी में जब आपको अपने काम का श्रेय नहीं मिलता, जब आपकी ईमानदारी का फायदा उठाया जाता है, तब गुस्सा और निराशा आना स्वाभाविक है। ऐसे में गीता का ज्ञान कैसे काम आएगा?”
अजनबी ने माधव के कंधे पर हाथ रखा। उसके स्पर्श में एक अद्भुत ऊर्जा थी, जिसने माधव के अशांत मन को पल भर में शांत कर दिया। अजनबी ने कहा, “गीता का सबसे बड़ा संदेश क्या है? ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’। आज के संदर्भ में इसका सीधा सा अर्थ है कि तुम केवल अपने काम पर ध्यान केंद्रित करो, न कि इस बात पर कि लोग तुम्हारे बारे में क्या सोच रहे हैं या तुम्हें क्या प्रमोशन मिलेगा। जब तुम परिणाम के डर या लालच के बिना काम करोगे, तो तुम्हारा काम एक कला बन जाएगा और तुम्हें कोई भी तनाव छू नहीं पाएगा।”
उसने माधव को समझाया कि जब हम दूसरों की बुराइयों को देखकर खुद भी बुरे बन जाते हैं, तो हम अपनी लड़ाई खुद ही हार जाते हैं। आज का कृष्ण तुमसे कहता है कि अपनी अच्छाई को दूसरों के व्यवहार के अधीन मत होने दो।
अंतरात्मा की जागृति
माधव गहरी सोच में डूब गया। उसे महसूस हुआ कि उसकी सारी समस्याओं की जड़ बाहर नहीं, बल्कि उसके अंदर के डर और उम्मीदों में थी। उसने जैसे ही उस अजनबी को धन्यवाद देने के लिए अपना सिर उठाया, वह दंग रह गया। बेंच खाली थी। वह अजनबी कहीं नहीं था।
माधव ने हैरान होकर चारों तरफ देखा, लेकिन दूर-दूर तक कोई नहीं था। तभी उसकी नजर उस बेंच पर पड़ी जहाँ वह अजनबी बैठा था। वहाँ एक बेहद खूबसूरत मयूर पंख (मोर पंख) रखा हुआ था।
माधव के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान तैर गई और उसकी आँखों से आंसू बह निकले। उसे समझ आ गया था कि उसे राह दिखाने वाला कोई साधारण इंसान नहीं था। आज का कृष्ण कोई और नहीं, बल्कि उसकी अपनी अंतरात्मा में छिपा हुआ वही मार्गदर्शक था, जिसने आज उसे सही राह दिखाई थी। माधव अब पूरी तरह से बदल चुका था। वह नए उत्साह और सकारात्मकता के साथ अपने जीवन के कुरुक्षेत्र में उतरने के लिए तैयार था।
Discover more from StoryDunia
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
