
सनातन धर्म में मां अन्नपूर्णा को भोजन, पोषण और समृद्धि की देवी माना गया है। वे साक्षात माता पार्वती का ही एक रूप हैं। हिंदू संस्कृति में मान्यता है कि जिस घर पर मां अन्नपूर्णा की कृपा होती है, वहां कभी भी धन-धान्य और भोजन की कमी नहीं होती। लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक बार स्वयं देवाधिदेव महादेव को भी मां अन्नपूर्णा के सामने हाथ फैलाकर भिक्षा मांगनी पड़ी थी? आइए जानते हैं इस पावन और शिक्षाप्रद पौराणिक कथा को।
शिव और पार्वती का अनोखा संवाद
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार कैलाश पर्वत पर भगवान शिव और माता पार्वती के बीच सृष्टि के नियमों को लेकर एक गंभीर चर्चा चल रही थी। चर्चा के दौरान भगवान शिव ने कहा कि यह संपूर्ण संसार, भौतिक वस्तुएं और यहां तक कि जो भोजन हम ग्रहण करते हैं, वह सब ‘माया’ (एक भ्रम) है। शिव का मानना था कि केवल आत्मा ही अंतिम सत्य है, बाकी सब कुछ नश्वर और झूठा है।
माता पार्वती भगवान शिव के इस विचार से सहमत नहीं थीं। उनका मानना था कि केवल आध्यात्मिक सत्य से जीवन नहीं चल सकता। भौतिक जगत का अपना महत्व है और शरीर को जीवित रखने के लिए अन्न-जल अत्यंत आवश्यक है। बिना भोजन के कोई भी जीव अपनी साधना या तपस्या पूरी नहीं कर सकता। पार्वती जी ने शिव को समझाने का प्रयास किया कि अन्न केवल भ्रम नहीं, बल्कि जीवन का आधार है, लेकिन शिव अपनी बात पर अड़े रहे।
सृष्टि में हाहाकार और भयानक अकाल
अपने तर्क को सिद्ध करने और महादेव को अन्न का महत्व समझाने के लिए माता पार्वती ने स्वयं को सृष्टि से अदृश्य कर लिया। जैसे ही प्रकृति की शक्ति (पार्वती) लुप्त हुईं, पूरी सृष्टि का संतुलन बिगड़ गया। देखते ही देखते धरती पर सूखा पड़ गया। नदियां और तालाब सूख गए, पेड़-पौधों ने दम तोड़ दिया और चारों तरफ अकाल जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई।
मनुष्यों से लेकर पशु-पक्षी और देवता तक भूख और प्यास से तड़पने लगे। कैलाश पर भी अन्न का एक दाना नहीं बचा। भूख की तड़प ने देवताओं और ऋषियों-मुनियों को व्याकुल कर दिया। तब भगवान शिव को भी यह अहसास हुआ कि जिसे वे केवल ‘माया’ कह रहे थे, उसके बिना तो जीवन का अस्तित्व ही संकट में पड़ गया है। वे समझ गए कि आत्मा के विकास के लिए भी इस भौतिक शरीर को ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जो केवल अन्न से ही प्राप्त हो सकती है।
काशी में मां अन्नपूर्णा का प्राकट्य
सृष्टि को इस भयानक संकट से बचाने और अपनी भूल का प्रायश्चित करने के लिए भगवान शिव व्याकुल हो उठे। इसी बीच उन्हें पता चला कि माता पार्वती ने धरती के कल्याण के लिए काशी (वाराणसी) नगरी में ‘मां अन्नपूर्णा’ के रूप में अवतार लिया है। वे वहां एक दिव्य रसोई चला रही हैं, जहां से भूखे और जरूरतमंदों को भोजन वितरित किया जा रहा है।
जैसे ही यह समाचार फैला, त्रिलोक के प्राणी काशी की ओर दौड़ पड़े। मां अन्नपूर्णा अपने स्वर्ण पात्र और कड़छी से अत्यंत ममता के साथ सभी भूखे जीवों को भोजन करा रही थीं। उनके भंडार से भोजन कभी समाप्त नहीं हो रहा था।
जब महादेव ने फैलाया भिक्षा का झोली
सृष्टि के कल्याण के लिए और स्वयं की भूख शांत करने के लिए भगवान शिव भी काशी पहुंचे। महादेव ने अपने हाथ में भिक्षा का पात्र (कपला) लिया और मां अन्नपूर्णा के द्वार पर जाकर खड़े हो गए।
एक साधारण भिक्षुक के वेश में आए महादेव ने मां अन्नपूर्णा से प्रार्थना की— “हे देवी! मुझे भोजन दान करें। मुझे समझ आ गया है कि अन्न केवल भ्रम नहीं, बल्कि साक्षात ब्रह्म का रूप है। इसके बिना जीवन की कल्पना असंभव है।”
माता पार्वती (मां अन्नपूर्णा) ने मुस्कुराते हुए अपने प्रिय शिव की झोली में भोजन डाल दिया। महादेव ने तृप्त होकर माता को धन्यवाद दिया और घोषणा की कि अब से अन्न को ‘अन्न ब्रह्म’ कहा जाएगा और जो भी मनुष्य अन्न का सम्मान करेगा, उसे जीवन में कभी दरिद्रता का सामना नहीं करना पड़ेगा।
मां अन्नपूर्णा कथा का आध्यात्मिक महत्व
मां अन्नपूर्णा की यह कथा हमें सिखाती है कि संसार में आध्यात्मिक ज्ञान जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्व भौतिक संसाधनों और विशेषकर अन्न का भी है। भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन की ऊर्जा है। इसलिए, हमें कभी भी थाली में भोजन नहीं छोड़ना चाहिए और न ही कभी अन्न का निरादर करना चाहिए। घरों में महिलाओं को मां अन्नपूर्णा का स्वरूप माना जाता है, क्योंकि वे परिवार के हर सदस्य के पोषण का ध्यान रखती हैं।
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