
रात के बारह बज रहे थे। एकचक्रा गाँव के सन्नाटे को चीरती हुई केवल जंगली हवाओं की साय-साय आवाज़ आ रही थी। अमित, जो कि एक खोजी पत्रकार और डरावनी जगहों की गुत्थी सुलझाने का शौकीन था, अपनी जीप में बैठा गाँव की इस अजीब खामोशी को महसूस कर रहा था। इस रहस्यमयी गाँव के बारे में उसने बचपन से कई डरावनी कहानियाँ सुनी थीं, जिनमें सबसे भयानक थी—बकासुर की कहानी।
बकासुर का नाम सुनते ही लोगों के दिमाग में महाभारत काल का वह नरभक्षी राक्षस आ जाता है जिसे भीम ने मार गिराया था। लेकिन अमित यहाँ किसी पौराणिक कथा की खोज में नहीं आया था, बल्कि वह उस खौफनाक हकीकत का सामना करने आया था जो आज भी इस गाँव के लोगों को थर-थर कांपने पर मजबूर कर देती थी।
बकासुर की पौराणिक कथा और वर्तमान का खौफ
गाँव के बुजुर्ग रामू काका ने अमित को गाँव की सीमा पर कदम रखने से पहले ही कड़ी चेतावनी दी थी। उन्होंने कांपती आवाज़ में कहा था, “बेटा, आज अमावस्या की रात है। आज के दिन उस गुफा की तरफ भूलकर भी मत जाना। भीम ने भले ही द्वापर युग में बकासुर के शरीर का अंत कर दिया था, लेकिन उसकी भूख और उसकी अतृप्त प्रेत-आत्मा आज भी इस घाटी में भटकती है। वह हर साल अमावस्या की रात को अपना शिकार ढूंढने निकलती है।”
अमित ने उस समय रामू काका की बात को केवल एक अंधविश्वास मानकर टाल दिया था। वह आधुनिक सोच का इंसान था, जिसे भूत-प्रेत और राक्षसों पर विश्वास नहीं था। लेकिन जैसे-जैसे रात गहरी हो रही थी, उसका वह आत्मविश्वास धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगा था।
अमावस्या की काली रात का रहस्य
अमित ने अपनी जीप को गाँव के बाहर बने प्राचीन मंदिर के पास रोका और अपना कैमरा तथा टॉर्च लेकर उस कुख्यात गुफा की ओर बढ़ने लगा, जिसे स्थानीय लोग ‘बकासुर की मांद’ कहते थे। गुफा की ओर जाने वाला रास्ता सूखा, कटीला और बेहद संकरा था। अजीब बात यह थी कि उस पूरे रास्ते पर न तो कोई परिंदा चहक रहा था और न ही किसी जानवर की आवाज़ आ रही थी। ऐसा लग रहा था मानो पूरी प्रकृति ने डर के मारे अपना दम साध लिया हो।
जैसे ही अमित गुफा के मुहाने पर पहुँचा, उसे एक बेहद तीखी और सड़ी हुई गंध का अहसास हुआ। वह गंध इतनी तीव्र थी कि अमित का जी मिचलाने लगा। उसने अपनी टॉर्च की रोशनी गुफा के भीतर डाली। गुफा के अंदर केवल घुप अंधेरा था, जो रोशनी को भी निगल रहा था। अमित ने अपने कैमरे का रिकॉर्डिंग बटन दबाया और धीरे-धीरे गुफा के अंदर कदम बढ़ाया।
साये से सामना: रोंगटे खड़े करने वाला मंज़र
गुफा के भीतर कदम रखते ही तापमान में अचानक भारी गिरावट महसूस हुई। अमित की सांसें जमने लगी थीं। अचानक, उसके कैमरे की स्क्रीन झिलमिलाने लगी और उसमें अजीब सी लाइनें आने लगीं। अमित ने कैमरे को ठीक करने की कोशिश की, तभी उसे गुफा के सबसे भीतरी कोने से एक भारी और घिसटती हुई आवाज़ सुनाई दी।
“हड़… हड़…”
यह किसी विशालकाय प्राणी के चलने की आवाज़ थी। अमित ने हिम्मत जुटाई और टॉर्च की बीम को उस दिशा में घुमाया। जो कुछ उसने देखा, उसने उसके पैरों तले से जमीन खिसका दी।
गुफा के अंधेरे कोने से एक विशालकाय, काली परछाई आकार ले रही थी। वह इंसानी ढांचा तो था, लेकिन उसकी ऊंचाई सामान्य इंसान से तीन गुना ज़्यादा थी। उसकी आँखें सुलगते हुए कोयले की तरह लाल-धधक रही थीं। उसके चेहरे पर केवल एक बड़ा, चौड़ा और डरावना मुंह था, जिससे लगातार लार टपक रही थी। उस साये के चारों ओर से एक असहनीय दुर्गंध आ रही थी, जैसे सदियों पुराने सड़े हुए मांस की हो।
अमित डर के मारे चीख भी नहीं सका। उसका गला सूख चुका था। वह विशालकाय साया धीरे-धीरे अमित की तरफ बढ़ा और गुफा की दीवारों को कंपाते हुए एक भारी, गूंजती हुई आवाज़ में बोला—
“भूख… मुझे भूख लगी है…!”
यह आवाज़ सीधे अमित के दिमाग में गूंजी थी। बकासुर की वह अतृप्त प्रेत-आत्मा अमित को जकड़ने के लिए अपनी काली, धुआं जैसी उंगलियां आगे बढ़ा रही थी। अमित को समझ आ गया कि यहाँ कोई कैमरे का खेल या अंधविश्वास नहीं था, बल्कि यह साक्षात् मौत थी।
खौफनाक रात से भागने की जद्दोजहद
अमित ने बिना एक पल गंवाए अपना कैमरा वहीं फेंका और पीछे की तरफ भागा। डर के मारे उसके पैर आपस में टकरा रहे थे। पीछे से उस भयानक राक्षस की डरावनी हंसी और फुसफुसाहट गूंज रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे वह अदृश्य राक्षस अमित के बिल्कुल पीछे खड़ा हो और उसकी सांसें अमित की गर्दन को छू रही हों।
वह गुफा से बाहर भागा और अपनी जीप की तरफ लपका। उसकी चाबी हाथ से छूटकर गिर गई, लेकिन उसने किसी तरह चाबी उठाई, इंजन स्टार्ट किया और जीप को पूरी ताकत से भगा दिया। रियर-व्यू मिरर में उसने देखा कि गुफा के मुहाने पर वह विशाल लाल आँखों वाला काला साया खड़ा होकर उसे घूर रहा था, मानो वह कह रहा हो—”आज बच गए, लेकिन मेरी भूख कभी खत्म नहीं होगी।”
अमित उस रात को कभी नहीं भूल पाया। आज भी जब अमावस्या की रात आती है, तो उसे अपने कमरे के कोने में वही लाल आँखें और घिसटती हुई आवाज़ सुनाई देती है। बकासुर का वह खौफनाक साया आज भी एकचक्रा गाँव की वादियों में अपनी भूख मिटाने के लिए भटक रहा है।
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