
कॉलेज का वो पहला साल, नई उमंगें, नए चेहरे और इन सबके बीच एक ऐसा चेहरा जो भीड़ में भी सबसे अलग दिखाई देता था। राहुल के लिए स्नेहा सिर्फ एक सहपाठी नहीं थी, बल्कि उसकी पूरी दुनिया बन चुकी थी। इसे आप पहला अफेयर कह सकते हैं, लेकिन इस अफेयर की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि यह पूरी तरह से एकतरफा, खामोश और रूहानी था।
कॉलेज के वे हसीन दिन और अनकहा अहसास
राहुल रोज़ कॉलेज सिर्फ इसलिए जाता था ताकि वह स्नेहा को एक नज़र देख सके। उसकी वो हल्की सी मुस्कान, लाइब्रेरी में बैठकर किताबें पलटना, और कभी-कभी अचानक आँखें मिल जाने पर शर्माकर नज़रें झुका लेना—यह सब राहुल के दिल में मीठी हलचल पैदा करता था। स्नेहा स्वभाव से बेहद शांत और गंभीर थी, लेकिन जब वह हँसती थी, तो ऐसा लगता था जैसे पतझड़ में बहार आ गई हो।
धीरे-धीरे दोनों में बातचीत शुरू हुई और वे अच्छे दोस्त बन गए। वे साथ में असाइनमेंट बनाते, कॉलेज कैंटीन में समोसे खाते और घंटों तक बेमतलब की बातें करते। लेकिन जब भी दिल की बात जुबां पर लाने की बारी आती, राहुल के शब्द खो जाते। उसे हमेशा इस बात का डर सताता था कि कहीं इज़हार करने से उनकी यह खूबसूरत दोस्ती भी न टूट जाए।
धड़कनों की बेतरतीब आवाज़
स्नेहा भी राहुल की हर छोटी बात का बेहद ख्याल रखती थी। जब राहुल कभी कॉलेज नहीं आता, तो वह बेचैन हो उठती और अगले दिन उससे बीमारी की वजह पूछती थी। उसकी आँखों में भी राहुल के लिए एक खास चमक थी, जिसे शायद पूरा कॉलेज समझता था, सिवाय खुद राहुल के। राहुल सोचता था कि स्नेहा सिर्फ एक अच्छी दोस्त के नाते उसका ख्याल रखती है। वह अक्सर रात को डायरी लिखता और अपने प्यार का इज़हार पन्नों पर करता, लेकिन असली जिंदगी में वह खामोश ही रहा।
विदाई और खामोश विदा
कॉलेज के तीन साल देखते ही देखते बीत गए। आखिरी सेमेस्टर की परीक्षाएँ खत्म हो गईं और फेयरवेल का दिन आ गया। हर कोई उदास था, और राहुल का दिल बैठा जा रहा था। उसने तय किया कि आज वह अपने दिल की बात स्नेहा से कह देगा। उसने एक खूबसूरत सा पत्र लिखा, जिसमें उसने अपने दिल के सारे जज्बात उडेल दिए।
लेकिन आखिरी वक्त पर उसकी हिम्मत फिर से जवाब दे गई। वह पत्र उसकी जेब में ही रह गया। फेयरवेल पार्टी के दौरान स्नेहा बार-बार राहुल की तरफ देख रही थी, जैसे वह उसके मुँह से कुछ सुनने का इंतज़ार कर रही हो। पर राहुल खामोश खड़ा रहा। दोनों ने एक-दूसरे को अलविदा कहा और अपनी-अपनी राह चल दिए।
सालों बाद वो अचानक मुलाकात
पाँच साल बीत गए। राहुल अब एक मल्टीनेशनल कंपनी में बड़े पद पर काम कर रहा था, और स्नेहा दूसरे शहर में अपनी जिंदगी में व्यस्त थी। इन पाँच सालों में राहुल के दिल से स्नेहा की यादें कभी कम नहीं हुईं।
एक शाम, जब राहुल दिल्ली के एक शांत कैफ़े में बैठकर कॉफी पी रहा था, तभी दरवाजे पर लगी घंटी बजी। राहुल ने सर उठाकर देखा और उसकी धड़कनें रुक सी गईं। सामने स्नेहा खड़ी थी। वक्त बदल चुका था, लेकिन उसकी आँखों की वही मासूमियत और वही सादगी आज भी वैसी ही थी।
“इज़हार तो किया होता…”
दोनों की नज़रें मिलीं और पुरानी यादें ताज़ा हो गईं। वे एक ही टेबल पर बैठे। शुरुआती हिचकिचाहट के बाद बातों का सिलसिला शुरू हुआ। पुरानी यादें ताज़ा हुईं, कॉलेज के दिनों की हँसी-मज़ाक की बातें हुईं।
बातों-बातों में राहुल ने एक गहरी सांस ली और हिम्मत जुटाकर कहा, “स्नेहा, आज मैं तुमसे एक सच कहना चाहता हूँ। कॉलेज के दिनों में मैं तुमसे बेइंतहा प्यार करता था। आज भी वो पहला अफेयर मेरे दिल के सबसे करीब है। पर मैं खोने के डर से कभी तुमसे कह नहीं पाया।”
राहुल की बात सुनकर स्नेहा की आँखों में आंसू आ गए। उसने नम आँखों से राहुल की तरफ देखा और उसका हाथ पकड़कर रुंधे गले से कहा, “राहुल, तुम कितने नासमझ हो। मैं भी तो सिर्फ तुम्हारा ही इंतज़ार कर रही थी। मैं हर रोज़ सोचती थी कि आज तुम मुझसे अपने दिल की बात कहोगे। काश… तुमने एक बार… सिर्फ एक बार इज़हार तो किया होता…”
राहुल अवाक रह गया। उसके पास बोलने के लिए कोई शब्द नहीं थे। काश उसने उस दिन हिम्मत दिखाई होती। दोनों को अपनी गलती का एहसास हुआ, लेकिन अब समय बहुत आगे निकल चुका था। अगले महीने स्नेहा की शादी होने वाली थी।
एक अधूरी मगर खूबसूरत दास्तान
यह कहानी हमें सिखाती है कि प्यार में सही समय पर इज़हार करना कितना ज़रूरी है। कुछ जज्बात अगर दिल में ही रह जाएं, तो वे जिंदगी भर का मलाल बन जाते हैं। राहुल और स्नेहा की कहानी भले ही अधूरी रही, लेकिन उनका वो अहसास आज भी उतना ही पाक और खूबसूरत था।
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