
काव्य का कमरा हमेशा धुंधला और उदास रहता था। वहाँ न तो सूरज की सुनहरी किरणें ठीक से पहुँचती थीं और न ही ताज़ी हवा का कोई झोंका। कमरे के कोने में रखी पुरानी लकड़ी की मेज पर बिखरे हुए कोरे पन्ने और एक सूख चुकी स्याही की दवात इस बात की गवाही देते थे कि यहाँ कोई अपने ही विचारों की कैद में घुट-घुट कर जी रहा है। काव्य, जो कभी अपनी खूबसूरत और रूहानी कविताओं से लोगों के दिलों को छू लेती थी, अब खुद एक ऐसी अनसुलझी पहेली बन चुकी थी जिसे पढ़ने की हिम्मत किसी में नहीं थी।
कहते हैं कि दुनिया में हर दर्द की एक उम्र होती है, एक साथी होता है जो वक्त के साथ उसे बांट लेता है। लेकिन काव्य का दर्द बिल्कुल अलग था। वह अक्सर अपनी डायरी के कोनों पर लिखती थी, “मेरा दर्द कुंआरा है। इसे न तो किसी की हमदर्दी का स्पर्श मिला है और न ही किसी के आंसुओं का सहारा। यह सिर्फ मेरा है और मेरे साथ ही खत्म होगा।” यह एक ऐसा स्याह अंधेरा था जिसे उसने खुद अपने अंदर पाला था, एक ऐसी डार्क स्टोरी जो उसके वजूद को धीरे-धीरे लील रही थी।
उस खामोश रात का भयानक राज़
सालों पहले, काव्य के जीवन में एक ऐसा मोड़ आया था जिसने उसकी हँसती-खेलती दुनिया को हमेशा के लिए उजाड़ दिया। वह एक ऐसे शख्स से बेपनाह मोहब्बत कर बैठी थी, जिसके इरादे उसकी सोच से भी ज़्यादा स्याह और खौफनाक थे। उसने काव्य के अटूट भरोसे को इस बेरहमी से तोड़ा कि उसका दिल हमेशा के लिए पत्थर का हो गया। लेकिन काव्य ने कभी रोकर या चिल्लाकर अपना दुख ज़ाहिर नहीं किया। उसने उस असहनीय धोखे को, उस गहरे जख्म को अपने अंदर ही कैद कर लिया।
वह अक्सर रात के सन्नाटे में अपनी डायरी में कुछ अजीबोगरीब आकृतियां और अधूरी कविताएं लिखती थी। उसकी लिखी हर पंक्ति में एक अजीब सा आकर्षण और एक अनजाना खौफ होता था। बाहर की दुनिया के लोग उसकी कविताओं को पढ़ते तो थे, लेकिन कोई भी उसकी रूह में छिपे उस डार्क सच को महसूस नहीं कर पाता था। वह दर्द जो कुंआरा था, अब धीरे-धीरे एक मानसिक दानव का रूप ले रहा था।
दर्द की घनी छांव और अकेलापन
एक रात, जब बाहर आसमान में काले बादल छाए हुए थे और तेज़ आंधी-तूफान के कारण खिड़कियाँ बार-बार खड़खड़ा रही थीं, काव्य अपनी मेज पर बैठी थी। कमरे में मोमबत्ती की पीली रोशनी कांप रही थी। उसने अचानक एक अजीब फैसला किया। उसने अपनी उंगली पर ब्लेड से एक छोटा सा चीरा लगाया और उससे बहते हुए लाल खून को स्याही बनाकर लिखना शुरू किया। यह कोई सामान्य कविता नहीं थी; यह उसकी तड़पती आत्मा की आखिरी और सबसे भयानक चीख थी।
उसने लिखा:
“जो छू न सका कोई, वो अहसास हो तुम,
जो बुझ न सकी कभी, वो प्यास हो तुम।
दफन हैं जितने राज़ इस टूटे हुए सीने में,
उस कुंआरे दर्द का आखिरी लिबास हो तुम।”
जैसे ही उसने आखिरी शब्द लिखा, कमरे का तापमान अचानक गिर गया। काव्य ने महसूस किया कि उस बंद कमरे में उसके अलावा भी कोई और वजूद मौजूद था। एक परछाई, जो दीवार से अलग होकर धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ रही थी। वह साया कोई भूत-प्रेत नहीं था, बल्कि उसका अपना ही भयानक अकेलापन था, जो सालों के सन्नाटे के बाद अब एक जीवित डार्क एंटिटी का रूप ले चुका था। वह दर्द जिसे उसने कभी किसी के साथ साझा नहीं किया था, अब उसे पूरी तरह अपने आगोश में ले रहा था।
अंत या एक नई शुरुआत?
अगली सुबह जब काफी देर तक काव्य के घर का दरवाजा नहीं खुला, तो पड़ोसियों ने अनहोनी की आशंका में पुलिस को बुलाया। जब दरवाज़ा तोड़ा गया, तो अंदर का नज़ारा देखकर सबकी रूह कांप गई। काव्य अपनी कुर्सी पर बेजान बैठी थी। उसके चेहरे पर कोई डर नहीं था, बल्कि एक अजीब और डरावना सुकून था, जैसे उसे आखिरकार उस तड़प से मुक्ति मिल गई हो।
मेज पर रखी उसकी डायरी खुली हुई थी, लेकिन अजीब बात यह थी कि उसके सारे पन्ने पूरी तरह कोरे थे। उस पर खून से लिखी हुई कविता का एक भी अक्षर मौजूद नहीं था। केवल आखिरी पन्ने पर एक खरोंच के साथ लिखा था— “दर्द जो कुंआरा था, अब हमेशा के लिए मेरा है।” काव्य की यह डरावनी और रहस्यमयी कहानी आज भी उस बंद कमरे की दीवारों में गूंजती है।
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