Shatranj Ke Khiladi: Do Doston Ki Rochak Kahani

Shatranj Ke Khiladi ki kahani mein jaanein do doston ki shatranj ke prati deewangi aur isse judi ek rochak ghatna. Puri Hindi kahani aur seekh padhein.

Shatranj Ke Khiladi

यह कहानी उस दौर की है जब अवध के नवाब वाजिद अली शाह का शासन था और पूरा लखनऊ विलासिता के रंग में डूबा हुआ था। छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, सभी किसी न किसी व्यसन में व्यस्त थे। कोई तीतर-बटेर लड़ा रहा था, तो कोई चौपड़ खेल रहा था। हर तरफ अकर्मण्यता, विलासिता और जिम्मेदारी से भागने का बोलबाला था। इसी माहौल में हमारे मुख्य किरदार, मिर्जा सज्जाद अली और मीर रोशन अली, शतरंज के दीवाने थे। उनके लिए संसार की सबसे बड़ी सच्चाई सिर्फ चौसठ खानों की वह बिसात थी, जिस पर वे घंटों बिना पलक झपकाए बैठे रहते थे।

शतरंज की लत और घर का माहौल

मिर्जा सज्जाद अली और मीर रोशन अली दोनों ही जागीरदार थे। उन्हें अपनी रोजी-रोटी की कोई चिंता नहीं थी, क्योंकि जागीर से लगान समय पर आ जाता था। सुबह आंख खुलते ही शतरंज की बिसात बिछ जाती और मोहरे सज जाते। फिर क्या दिन, क्या रात, उन्हें किसी बात की सुध नहीं रहती थी।

मिर्जा साहब की बेगम साहिबा इस लत से बेहद परेशान थीं। उन्हें लगता था कि शतरंज उनके सुहाग और घर की शांति को निगल रहा है। जब भी वह बीमार होतीं या उन्हें किसी काम के लिए मिर्जा की जरूरत होती, मिर्जा साहब खेल छोड़कर उठने का नाम नहीं लेते थे। एक दिन बेगम साहिबा का गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने शतरंज की बिसात ही उलट दी। इस अपमान से बचने के लिए दोनों नवाबों ने तय किया कि अब वे घर पर नहीं खेलेंगे।

गोमती किनारे का नया ठिकाना

दोनों मित्रों ने अब गोमती नदी के किनारे एक सुनसान, वीरान मस्जिद के खंडहर को अपना नया अड्डा बना लिया। वहां वे सुबह ही थोड़ा बहुत खाना साथ लेकर चले जाते और दिनभर बिना किसी पारिवारिक रोक-टोक के शतरंज के खेल में डूब जाते। देश और समाज में क्या उथल-पुथल मच रही है, इससे उन्हें रत्ती भर भी सरोकार नहीं था।

उन्हीं दिनों ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना धीरे-धीरे लखनऊ की तरफ बढ़ रही थी। पूरे अवध में खलबली मची हुई थी। लोग डरे हुए थे, लेकिन इन दोनों दोस्तों के लिए वजीर को बचाना और सामने वाले के बादशाह को शह-मात देना ही जीवन का एकमात्र और सर्वोच्च उद्देश्य बन चुका था।

अवध का पतन और नवाब की गिरफ्तारी

एक दिन, जब वे दोनों मस्जिद के खंडहर में शतरंज खेल रहे थे, उन्होंने देखा कि अंग्रेजी सेना के सिपाही बड़ी तादाद में लखनऊ की तरफ बढ़ रहे हैं। कुछ ही समय बाद खबर आई कि अंग्रेजों ने नवाब वाजिद अली शाह को बंदी बना लिया है और वे उन्हें अपने साथ ले जा रहे हैं।

पूरे लखनऊ की जनता हताश और मूकदर्शक बनी हुई थी, और इन दोनों जागीरदारों की संवेदना तो जैसे पूरी तरह मर चुकी थी। जब मीर साहब ने घबराकर कहा, “मिर्जा साहब! नवाब साहब को अंग्रेजों ने कैद कर लिया है, अब क्या होगा?”

तो मिर्जा ने बड़ी बेरुखी से जवाब दिया, “पकड़े जाने दीजिए, पहले आप अपनी चाल चलिए। उनके कैद होने से हमारी शतरंज तो नहीं रुक जाएगी! पहले वजीर को बचाइए।”

अपनी मातृभूमि, अपने मान-सम्मान और अपने राजा के इस अपमान पर भी उनका खून नहीं खौला। उनकी सारी वीरता, रणनीति और बुद्धि केवल लकड़ी के बेजान मोहरों तक ही सीमित थी।

एक मामूली विवाद और दुखद अंत

नवाब के पकड़े जाने के बाद भी खेल जारी रहा। दोपहर ढलने लगी थी। अचानक खेल के दौरान एक चाल को लेकर दोनों मित्रों के बीच तीखी बहस छिड़ गई। मिर्जा ने मीर साहब पर बेईमानी से चाल चलने का आरोप लगाया। मीर साहब का तथाकथित ‘स्वाभिमान’ अचानक जाग उठा। जो स्वाभिमान अपने देश, अपनी प्रजा और अपने राजा की रक्षा के लिए नहीं जागा था, वह शतरंज के एक वजीर को लेकर उग्र हो उठा।

दोनों ने एक-दूसरे को कायर कहा, पूर्वजों के खानदान पर कीचड़ उछाला और बात इतनी बढ़ गई कि दोनों ने अपनी तलवारें खींच लीं। दोनों ही पुराने समय के जागीरदार थे, हथियार चलाना जानते थे। कुछ ही पलों की खूनी जंग में दोनों ने एक-दूसरे पर प्राणघातक वार किए और वहीं तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया।

मुंशी प्रेमचंद इस कहानी के अंत में एक बहुत ही गहरा कटाक्ष करते हैं। वे लिखते हैं कि जो नवाब अपने देश के राजा के लिए खून की एक बूंद भी नहीं बहा सके, जो अपनी प्रजा की तबाही पर चुपचाप तमाशा देखते रहे, उन्होंने लकड़ी के बेजान मोहरों के लिए अपनी जान गंवा दी। यह कहानी तत्कालीन सामंतवादी व्यवस्था के खोखलेपन और भारतीय समाज की घोर उदासीनता का एक जीवंत दस्तावेज है।


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