
हिंदू धर्म में व्रत और त्योहारों का विशेष महत्व है। इन्हीं में से एक अत्यंत फलदायी और श्रद्धा का प्रतीक व्रत है – चौथ माता का व्रत। विशेष रूप से महिलाओं के लिए यह व्रत अखंड सौभाग्य, संतान सुख और घर में सुख-समृद्धि लाने वाला माना जाता है। कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी (करवा चौथ) और हर माह आने वाली संकष्टी चतुर्थी पर चौथ माता की पूजा-अर्चना बड़े ही हर्षोल्लास के साथ की जाती है। राजस्थान के सवाई माधोपुर में स्थित ‘चौथ का बरवाड़ा’ मंदिर माता का सबसे प्रसिद्ध धाम है, जहाँ लाखों श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं लेकर आते हैं।
आइए जानते हैं चौथ माता की पौराणिक कहानी, जो सदियों से भारतीय परिवारों में बड़े चाव से सुनी और सुनाई जाती है।
चौथ माता कौन हैं?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, चौथ माता को स्वयं आदि शक्ति देवी पार्वती का ही एक कल्याणकारी रूप माना जाता है। इन्हें संकटों को हरने वाली और अखंड सौभाग्य प्रदान करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। मुख्य रूप से सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुखी दांपत्य जीवन के लिए चौथ माता का व्रत रखती हैं। इसके साथ ही, निःसंतान दंपतियों को संतान सुख की प्राप्ति के लिए भी माता का आशीर्वाद अत्यंत चमत्कारी और फलदायी माना गया है।
चौथ माता की पौराणिक कहानी (अंधी बुढ़िया की कथा)
प्राचीन काल की बात है, एक गाँव में एक अत्यंत निर्धन और अंधी बुढ़िया रहती थी। वह अंधी बुढ़िया चौथ माता की अनन्य भक्त थी। वह प्रतिदिन नियम से चौथ माता की पूजा-अर्चना करती थी और जब भी संकट चतुर्थी आती, वह पूरे दिन निर्जला रहकर व्रत रखती थी। बुढ़िया का एक बेटा और बहू थे। वे दोनों बेहद गरीब थे और बुढ़िया की अंधी आंखों और लाचारी के कारण उसे अपने ऊपर एक बोझ समझते थे।
बुढ़िया की सच्ची भक्ति और निष्ठा को देखकर एक दिन स्वयं चौथ माता साक्षात प्रकट हुईं। माता ने बुढ़िया से कहा, “हे माई! मैं तेरी सच्ची भक्ति और तपस्या से अत्यंत प्रसन्न हूँ। तू मुझसे जो चाहे वरदान मांग ले।”
अंधी बुढ़िया असमंजस में पड़ गई। उसने संकोच करते हुए कहा, “हे माता! मैं तो अनपढ़ और अज्ञानी हूँ, मुझे तो मांगना भी नहीं आता। मैं कल अपने बेटे और बहू से पूछकर मांग लूंगी।” चौथ माता ने मुस्कुराकर कहा, “ठीक है माई, तुम कल सोच-समझकर मांग लेना।”
बुढ़िया ने घर जाकर अपने बेटे से पूछा, “बेटा, आज चौथ माता मुझ पर प्रसन्न होकर प्रकट हुई थीं और वरदान मांगने को कह रही थीं। मुझे माता से क्या मांगना चाहिए?”
बेटे ने तपाक से कहा, “माँ! तू माता से बहुत सारा धन, सोना-चांदी और आलीशान महल मांग ले, ताकि हमारी गरीबी हमेशा के लिए दूर हो जाए।”
फिर बुढ़िया अपनी बहू के पास गई और उससे पूछा। बहू ने कहा, “सासू जी! धन-दौलत तो आज है कल नहीं, आप माता से एक सुंदर पोता (संतान) मांग लीजिए, जिससे हमारे सूने आंगन में किलकारियां गूंजें और हमारे वंश का नाम आगे बढ़े।”
बुढ़िया को दोनों की बातें ठीक तो लगीं, लेकिन उसका मन पूरी तरह संतुष्ट नहीं हुआ। वह पास के पड़ोसियों के पास गई और उनसे सलाह ली। पड़ोसियों ने हंसकर कहा, “अरे बुढ़िया! तू तो अंधी है। बिना आंखों के तू धन और पोते का सुख कैसे देख पाएगी? पूरी जिंदगी दूसरों के सहारे जीती रहेगी क्या? सबसे पहले अपने लिए आंखें मांग, ताकि तू इस खूबसूरत दुनिया को देख सके।”
रातभर बुढ़िया सोचती रही कि बेटा धन मांग रहा है, बहू पोता मांग रही है और पड़ोसी आंखें मांग रहे हैं। मैं ऐसा क्या मांगूं जिससे सबका भला हो और माता भी नाराज न हों।
अगले दिन चौथ माता पुनः प्रकट हुईं और बोलीं, “बोलो माई! क्या वरदान मांगती हो?”
बुढ़िया ने हाथ जोड़कर अत्यंत चतुराई और विनम्रता से कहा, “हे चौथ माता! यदि आप मुझ पर वास्तव में प्रसन्न हैं, तो मुझे नौ करोड़ की माया (धन) दीजिए, निरोगी काया (स्वास्थ्य) दीजिए, मेरी आँखों की रोशनी वापस दे दीजिए, पोते को मेरी गोदी में खिलाइए और अंत समय में मुझे मोक्ष प्रदान कीजिए।”
बुढ़िया की चतुरता और गहरी भक्ति देखकर चौथ माता हंस पड़ीं और बोलीं, “बुढ़िया माई! तूने तो मुझे अपने शब्दों में बांध ही लिया। तूने एक ही बार में संसार का सारा सुख मांग लिया। लेकिन जा, जैसा तूने मांगा है, वैसा ही होगा।” इतना कहकर चौथ माता अंतर्ध्यान हो गईं।
कुछ ही समय में बुढ़िया की आँखों की रोशनी वापस आ गई। उसका पूरा घर धन-धान्य और सोने-चांदी से भर गया और बहू को एक सुंदर पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। पूरा परिवार सुख, शांति और वैभव के साथ रहने लगा। बुढ़िया की अनन्य भक्ति के कारण उनका पूरा जीवन संवर गया।
चौथ माता व्रत की सरल पूजा विधि
चौथ माता के व्रत का पालन अत्यंत नियम और निष्ठा के साथ किया जाता है। इसकी सरल पूजा विधि इस प्रकार है:
- व्रत का संकल्प: सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और चौथ माता का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें।
- पूजा स्थल की तैयारी: घर के मंदिर या साफ स्थान पर माता की तस्वीर स्थापित करें। माता के पास भगवान गणेश की मूर्ति भी रखें, क्योंकि गणेश जी को चतुर्थी का अधिष्ठाता देव माना जाता है।
- कलश स्थापना: एक मिट्टी या तांबे के कलश में स्वच्छ जल भरकर रखें। कलश के मुख पर मौली बांधें और रोली से स्वास्तिक बनाएं।
- भोग और आरती: माता को कुमकुम, अक्षत, फूल, दूर्वा और नैवेद्य अर्पित करें। विशेष रूप से तिल के लड्डू या आटे के चूरमे का भोग लगाएं।
- कथा श्रवण: दोपहर या शाम को हाथ में गेहूं या बाजरे के कुछ दाने लेकर चौथ माता की व्रत कथा ध्यानपूर्वक सुनें या पढ़ें।
- चंद्र दर्शन: रात्रि को चंद्रमा के उदय होने पर उन्हें जल से अर्घ्य दें, धूप-दीप दिखाएं और अपने पति के हाथों से जल ग्रहण कर व्रत संपन्न करें।
चौथ माता की पूजा का महत्व
धार्मिक पुराणों के अनुसार, जो भी श्रद्धालु संकट चतुर्थी या करवा चौथ के दिन सच्चे मन से चौथ माता की आराधना करता है, उसके जीवन के सभी बड़े से बड़े संकट चुटकियों में दूर हो जाते हैं। यह व्रत न केवल वैवाहिक जीवन में मधुरता और अटूट प्रेम लाता है, बल्कि पूरे परिवार को आर्थिक तंगी और मानसिक तनाव से भी बचाता है।
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