Asli Chitra Kaun Sa Hai? Akbar Birbal Ki Kahani

Asli Chitra कौन सा था? जानिए अकबर बीरबल की इस मजेदार कहानी में बीरबल ने अपनी चतुराई से असली और नकली चित्र की पहचान कैसे की।

Asli Chitra

बादशाह अकबर के दरबार में आए दिन अनोखे और पेचीदा मामले आते रहते थे। इन मामलों को सुलझाने में बीरबल की बुद्धिमत्ता की परीक्षा होती थी। बीरबल अपनी तीक्ष्ण बुद्धि और हाजिरजवाबी से हर बार न्याय की जीत सुनिश्चित करते थे। ऐसी ही एक बेहद दिलचस्प कहानी है “असली चित्र” की, जो हमें सिखाती है कि चालाकी करने वाले को उसकी ही भाषा में सबक कैसे सिखाया जाता है।

एक कंजूस सेठ और एक गरीब चित्रकार

बहुत समय पहले की बात है, एक नगर में एक बेहद अमीर लेकिन महाकंजूस सेठ रहता था। उसके पास धन-दौलत की कोई कमी नहीं थी, लेकिन जब बात किसी को पैसे देने की आती, तो उसकी जान पर बन आती थी। वह किसी को भी एक कौड़ी देने में आनाकानी करता था।

उसी नगर में एक बेहद प्रतिभाशाली लेकिन गरीब चित्रकार भी रहता था। वह अपनी अद्भुत चित्रकारी के लिए जाना जाता था। एक दिन कंजूस सेठ के मन में अपना एक भव्य चित्र (पोर्ट्रेट) बनवाने का विचार आया। वह चित्रकार के पास गया और कहा, “क्या तुम मेरा एक ऐसा चित्र बना सकते हो, जो बिल्कुल मेरे जैसा दिखे? यदि तुम ऐसा कर सके, तो मैं तुम्हें सौ स्वर्ण मुद्राएं दूंगा।”

चित्रकार बहुत खुश हुआ। उसने दिन-रात एक करके सेठ का एक अत्यंत सुंदर और सजीव चित्र तैयार किया। चित्र पूरा होने के बाद, वह उसे लेकर सेठ की हवेली पहुंचा।

सेठ की चालाकी और चित्रकार की लाचारी

सेठ ने चित्र देखा, तो वह दंग रह गया। चित्र वास्तव में हुबहू सेठ की तरह लग रहा था। लेकिन जैसा कि सेठ स्वभाव से महाकंजूस था, वह सौ स्वर्ण मुद्राएं नहीं देना चाहता था। उसने एक कुटिल चाल चली।

सेठ ने अपने चेहरे के हाव-भाव थोड़े बदल लिए और गुस्से में कहा, “यह कैसा चित्र बनाया है तुमने? यह तो मेरे चेहरे से बिल्कुल नहीं मिल रहा। इसे वापस ले जाओ और दोबारा बनाकर लाओ।”

बेचारा चित्रकार निराश होकर लौट गया। उसने फिर से कड़ी मेहनत की और एक नया चित्र बनाया। लेकिन जब वह नया चित्र लेकर आया, तो सेठ ने फिर से अपने चेहरे की बनावट थोड़ी बदल ली और कहा, “नहीं, यह भी मुझसे नहीं मिलता।”

ऐसा एक बार नहीं, बल्कि तीन-चार बार हुआ। हर बार चित्रकार नया चित्र बनाकर लाता और हर बार सेठ कोई न कोई बहाना बनाकर उसे खारिज कर देता। चित्रकार की मेहनत, रंग और समय सब बर्बाद हो रहे थे। वह समझ गया कि सेठ पैसे न देने के लिए यह सब ढोंग कर रहा है। वह अत्यंत निराश और उदास हो गया।

बीरबल की शरण में चित्रकार

अपनी इस समस्या के समाधान के लिए चित्रकार ने बीरबल से मिलने का फैसला किया। वह रोते-रोते बीरबल के पास पहुंचा और अपनी पूरी आपबीती सुनाई।

बीरबल ने पूरी बात ध्यान से सुनी। उन्होंने चित्रकार को सांत्वना दी और कहा, “तुम घबराओ मत। उस कंजूस सेठ को उसकी चालाकी का सबक सिखाने का समय आ गया है। तुम कल सुबह सेठ की हवेली में जाओ, लेकिन इस बार अपने साथ कोई चित्र मत ले जाना।”

चित्रकार ने हैरान होकर पूछा, “फिर मैं क्या लेकर जाऊं, हुजूर?”

बीरबल ने चित्रकार के कान में एक गुप्त योजना बताई। बीरबल की योजना सुनकर चित्रकार के चेहरे पर मुस्कान आ गई। उसने बीरबल को धन्यवाद दिया और अपने घर लौट आया।

असली चित्र का अनावरण

अगले दिन, बीरबल के कहे अनुसार, चित्रकार एक बड़ा सा दर्पण (शीशा) लेकर सेठ की हवेली पहुंचा। दर्पण को एक मखमली कपड़े से ढका गया था।

सेठ ने जब चित्रकार को खाली हाथ देखा, तो उसने तंज कसते हुए कहा, “क्या आज भी कोई नया चित्र नहीं लाए? या फिर आज भी खाली हाथ ही आ गए?”

चित्रकार ने बड़े विनम्र भाव से कहा, “सेठ जी, आज मैं आपका बिल्कुल असली और सटीक चित्र लेकर आया हूँ। इसमें एक प्रतिशत की भी कमी नहीं है। आप इसे देखकर दंग रह जाएंगे।”

यह कहकर चित्रकार ने दर्पण के ऊपर से कपड़ा हटा दिया। दर्पण में सेठ को अपना ही चेहरा दिखाई दिया।

सेठ चौंक गया और गुस्से में बोला, “यह तुम क्या मज़ाक कर रहे हो? यह तो एक साधारण दर्पण है, चित्र कहाँ है?”

तभी हवेली के बाहर खड़े बीरबल अंदर आए और बोले, “सेठ जी, यही तो आपका असली चित्र है। दर्पण कभी झूठ नहीं बोलता। आप जैसा चेहरा बनाएंगे, यह आपको बिल्कुल वैसा ही दिखाएगा। इसलिए, अब चित्रकार को इसकी कीमत चुका दीजिए।”

न्याय और सीख

बीरबल को सामने देखकर सेठ समझ गया कि उसकी चोरी पकड़ी गई है। उसे अहसास हो गया कि बीरबल की बुद्धिमानी के सामने उसकी चालाकी काम नहीं आने वाली। शर्मिंदा होकर सेठ ने तुरंत अपनी तिजोरी खोली और चित्रकार को वादे के अनुसार सौ स्वर्ण मुद्राएं दे दीं।

चित्रकार ने बीरबल का आभार व्यक्त किया। इस तरह बीरबल की सूझबूझ से एक गरीब और सच्चे कलाकार को उसका हक मिला और कंजूस सेठ को ईमानदारी का पाठ सीखने को मिला।


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