
भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म में व्रत-त्योहारों का एक विशेष और गहरा वैज्ञानिक महत्व रहा है। इन्हीं महत्वपूर्ण अवसरों में से एक है ऋषि पंचमी (Rishi Panchami)। हर वर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को यह पावन व्रत मनाया जाता है। मुख्य रूप से यह त्योहार गणेश चतुर्थी के अगले दिन पड़ता है।
यह व्रत किसी देवी-देवता को समर्पित न होकर, हमारे समाज का मार्गदर्शन करने वाले पूजनीय सप्तऋषियों के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा प्रकट करने का पर्व है। इस दिन महिलाएं अनजाने में हुए भूल-चूक और पापों की क्षमा याचना के लिए पूर्ण श्रद्धाभाव से व्रत रखती हैं।
ऋषि पंचमी का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, जाने-अनजाने में हर मनुष्य से कई तरह की भूलें और गलतियाँ हो जाती हैं। शास्त्रों में महिलाओं के लिए मासिक धर्म (रजस्वला) के दौरान कुछ नियमों का पालन करना अनिवार्य बताया गया है। इस संवेदनशील अवधि के दौरान धार्मिक कार्यों, रसोई के कार्यों और देव-स्पर्श की मनाही होती है।
यदि अज्ञानतावश या किसी अन्य कारण से इन नियमों का उल्लंघन हो जाता है, तो उस दोष (रजस्वला दोष) के निवारण के लिए ऋषि पंचमी का व्रत अचूक माना गया है। इस दिन सप्तऋषियों (कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वसिष्ठ) की पूजा की जाती है। यह व्रत मन, वचन और कर्म की शुद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है।
ऋषि पंचमी की पौराणिक व्रत कथा
प्राचीन काल में विदर्भ देश में ‘उत्तंक’ नाम के एक अत्यंत सदाचारी और विद्वान ब्राह्मण रहा करते थे। उनकी पत्नी का नाम ‘सुशीला’ था, जो परम पतिव्रता और धार्मिक स्वभाव की महिला थीं। भगवान की कृपा से उनके घर में एक पुत्र और एक पुत्री ने जन्म लिया।
पुत्र के बड़े होने पर उन्होंने उसका विवाह कर दिया और अपनी पुत्री का विवाह भी एक संभ्रांत और सुशील ब्राह्मण युवक से कर दिया। लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। विवाह के कुछ ही समय बाद उनके दामाद की अकाल मृत्यु हो गई। इस भीषण वज्रपात से उनकी बेटी असमय ही विधवा हो गई।
इस असहनीय दुःख के बाद, ब्राह्मण उत्तंक अपनी पत्नी और विधवा पुत्री को लेकर गंगा तट पर एक छोटी सी कुटिया बनाकर रहने लगे। वे वहाँ शांत वातावरण में जप-तप और ईश्वर भक्ति में समय बिताने लगे।
रहस्यमयी घटना और पिता का दिव्य ज्ञान
एक रात जब पुत्री सो रही थी, तब सुशीला ने देखा कि उसकी बेटी के पूरे शरीर पर कीड़े रेंग रहे हैं। अपनी संतान की ऐसी दर्दनाक स्थिति देखकर माता सुशीला व्याकुल हो उठी। वह रोती हुई अपने पति उत्तंक के पास गई और बोली, “हे प्राणनाथ! मेरी निष्पाप बेटी की यह दशा क्यों हो रही है? उसने इस जन्म में कभी कोई पाप नहीं किया, फिर उसे यह कष्ट क्यों मिल रहा है?”
ब्राह्मण उत्तंक ने ध्यान लगाया और अपनी दिव्य दृष्टि से पुत्री के पूर्व जन्म के कर्मों को देखा। ध्यान से उठने के बाद उन्होंने गहरी सांस ली और अपनी पत्नी से बोले, “देवी! हमारी पुत्री इस जन्म में भले ही निष्पाप दिखती हो, परंतु अपने पूर्व जन्म में इसने एक बड़ी भूल की थी।”
उत्तंक ने विस्तार से बताते हुए कहा, “पिछले जन्म में यह एक ब्राह्मणी थी। एक बार मासिक धर्म के दौरान इसने मर्यादाओं का उल्लंघन किया। इसने अपवित्र अवस्था में भी घर के बर्तनों को छुआ, रसोई में प्रवेश किया और घर के काम किए। इतना ही नहीं, इसने इस दोष की मुक्ति के लिए कभी ‘ऋषि पंचमी’ का व्रत भी नहीं किया। इसी पाप के प्रभाव से इसे इस जन्म में यह शारीरिक कष्ट भुगतना पड़ रहा है और असमय वैधव्य का सामना करना पड़ा है।”
मुक्ति का उपाय और व्रत का अनुष्ठान
माता सुशीला ने अत्यंत व्याकुल होकर पूछा, “स्वामी! इस घोर कष्ट और पाप से मुक्ति का क्या उपाय है?”
ब्राह्मण उत्तंक ने कहा, “यदि हमारी पुत्री पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ भाद्रपद शुक्ल पंचमी के दिन ‘ऋषि पंचमी’ का व्रत रखे, सप्तऋषियों की विधि-विधान से पूजा करे और अपने अपराधों के लिए सच्चे मन से क्षमा मांगे, तो इसके पूर्व जन्म के सभी पाप नष्ट हो जाएंगे और इसे पुनः पवित्रता प्राप्त होगी।”
पिता की आज्ञा पाकर पुत्री ने पूर्ण श्रद्धा, भक्ति और कड़े नियमों के साथ ऋषि पंचमी का व्रत किया। उसने गंगा स्नान कर, शुद्ध मिट्टी से सप्तऋषियों की प्रतिमा बनाई और उनका पूजन कर कथा सुनी। व्रत के प्रभाव से वह पूरी तरह रोगमुक्त हो गई और उसका शरीर कांतिमान हो गया। मृत्यु के पश्चात उसे उत्तम लोक में स्थान प्राप्त हुआ।
ऋषि पंचमी व्रत की सरल पूजा विधि
ऋषि पंचमी के दिन व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को निम्नलिखित विधि से पूजा करनी चाहिए:
- स्नान और संकल्प: सुबह सूर्योदय से पहले उठकर किसी पवित्र नदी, तालाब या घर पर ही गंगाजल मिलाकर स्नान करें। साफ वस्त्र धारण कर व्रत का संकल्प लें।
- पूजा स्थल की तैयारी: घर के ईशान कोण या मंदिर में साफ-सफाई कर एक चौकी स्थापित करें। उस पर पीला या लाल कपड़ा बिछाएं।
- सप्तऋषियों की स्थापना: चौकी पर हल्दी और रोली से चौकोर अल्पना (चौक) बनाएं। उस पर कलश स्थापित करें और सप्तऋषियों के प्रतीक रूप में सात सुपारी या गोबर से सात पिंडी बनाकर रखें। उनके साथ देवी अरुंधति (ऋषि वशिष्ठ की पत्नी) की भी स्थापना करें।
- पूजन सामग्री: सप्तऋषियों को जल, पंचामृत, रोली, चंदन, अक्षत, यज्ञोपवीत (जनेऊ), धूप, दीप और पुष्प अर्पित करें।
- नैवेद्य: इस दिन कंद-मूल या विशेष रूप से ‘पसारी के चावल’ (तिन्नी का चावल) का भोग लगाया जाता है। व्रती महिलाएं भी इसी अनाज का फलाहार करती हैं।
- कथा श्रवण: पूजा के बाद ऋषि पंचमी की व्रत कथा श्रद्धापूर्वक सुनें या पढ़ें।
- आरती और क्षमा याचना: अंत में आरती करें और अनजाने में हुए सभी पापों के लिए सप्तऋषियों से हाथ जोड़कर क्षमा प्रार्थना करें।
निष्कर्ष
ऋषि पंचमी का व्रत हमें यह सिखाता है कि जाने-अनजाने में हुई गलतियों का प्रायश्चित करना ही मनुष्य को आंतरिक शांति और आत्मिक शुद्धि प्रदान करता है। यह पर्व हमारे प्राचीन ऋषियों-मुनियों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का जरिया है, जिन्होंने हमें जीवन जीने का सही मार्ग दिखाया।
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