
हिंदू धर्म में हरतालिका तीज (Hartalika Teej) का व्रत सबसे कठिन और महत्वपूर्ण व्रतों में से एक माना जाता है। यह पावन व्रत हर वर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, अच्छी सेहत और सुखी दांपत्य जीवन के लिए यह व्रत पूरी श्रद्धा के साथ निर्जला और निराहार रहकर करती हैं। वहीं, कुंवारी कन्याएं भी मनचाहा और सुयोग्य वर पाने के लिए इस दिन व्रत रखती हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस व्रत का नाम ‘हरतालिका’ कैसे पड़ा और इसकी मुख्य कथा क्या है? आइए जानते हैं भगवान शिव और माता पार्वती के अटूट प्रेम और भक्ति की इस पौराणिक कथा को।
‘हरतालिका’ शब्द का गहरा रहस्य और अर्थ
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, ‘हरतालिका’ शब्द दो शब्दों के मेल से बना है – ‘हरत’ और ‘आलिका’। यहाँ ‘हरत’ का अर्थ है ‘अपहरण करना’ और ‘आलिका’ का अर्थ है ‘सखी’ या ‘सहेली’। इस व्रत का नाम हरतालिका इसलिए पड़ा क्योंकि माता पार्वती की सहेली ने उनके कल्याण के लिए उनका अपहरण कर लिया था, ताकि वे अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध जाकर घने जंगल में भगवान शिव की आराधना कर सकें।
माता पार्वती की कठिन तपस्या और शिव से प्रेम
यह कथा स्वयं भगवान शिव ने माता पार्वती को उनके पिछले जन्म की याद दिलाने के लिए सुनाई थी। शिवजी कहते हैं- “हे देवी! पूर्व जन्म में तुमने मुझे पति के रूप में प्राप्त करने के लिए हिमालय राज के घर में जन्म लिया था। बाल्यावस्था से ही तुम्हारा मन मेरे प्रति समर्पित था। जब तुम बड़ी हुईं, तो तुमने गंगा नदी के तट पर बारह वर्षों तक अत्यंत कठिन तपस्या की।”
पार्वती जी ने कड़ाके की ठंड में जल के भीतर रहकर, मूसलाधार बारिश में खुले आसमान के नीचे और तपती गर्मी में पंचाग्नि तप किया। वे केवल सूखे पत्ते खाकर जीवित रहीं और अंत में उन्होंने पत्तों का सेवन भी छोड़ दिया और केवल हवा पीकर तपस्या की। अपनी पुत्री की यह अत्यंत कष्टदायी दशा देखकर पर्वतराज हिमालय अत्यंत दुखी और चिंतित रहने लगे।
देवर्षि नारद का आगमन और विवाह का प्रस्ताव
एक दिन देवर्षि नारद पर्वतराज हिमालय के पास पहुंचे और उनसे कहा, “हे राजन्! आपकी पुत्री की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु उनसे विवाह करना चाहते हैं। मैं स्वयं उनका यह पावन प्रस्ताव लेकर आपके पास आया हूँ।” पर्वतराज हिमालय अपनी पुत्री के लिए भगवान विष्णु जैसा योग्य वर पाकर अत्यंत हर्षित हुए और उन्होंने बिना विलंब किए इस विवाह प्रस्ताव को अपनी स्वीकृति दे दी।
जब माता पार्वती को इस बात का पता चला कि उनके पिता ने उनका विवाह भगवान विष्णु से तय कर दिया है, तो वे अत्यंत दुखी हो गईं। वे रोने लगीं और अपनी इस गहरी व्यथा को अपनी एक प्रिय सहेली के सामने प्रकट किया। पार्वती ने कहा, “सखी! मैं मन, वचन और कर्म से भगवान शिव को अपना पति स्वीकार कर चुकी हूँ। मेरे प्राण केवल शिव के लिए हैं। यदि मेरा विवाह भगवान विष्णु से करा दिया गया, तो मैं अपने प्राण त्याग दूंगी।”
सहेली द्वारा हरण और घोर जंगल में तप
पार्वती की अत्यंत दयनीय दशा देखकर उनकी सहेली ने उन्हें ढांढस बंधाया और कहा कि रोने की कोई आवश्यकता नहीं है। सहेली ने पार्वती को एक उपाय सुझाया। वह रात के अंधेरे में माता पार्वती को उनके महल से चुपचाप लेकर एक घने और निर्जन जंगल में चली गई, ताकि उनके पिता उन्हें ढूंढ न सकें। सहेली द्वारा इस प्रकार हरण किए जाने के कारण ही इस व्रत का नाम ‘हरतालिका’ पड़ा।
उस घने जंगल की एक गुफा में पहुंचकर माता पार्वती ने रेत और मिट्टी से एक शिवलिंग का निर्माण किया। उस दिन भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि थी। माता पार्वती ने उस दिन अन्न और जल का पूरी तरह से त्याग कर दिया और रातभर भगवान शिव की स्तुति में लीन रहकर जागरण किया।
भगवान शिव का वरदान और विवाह
माता पार्वती के इस अत्यंत कठिन तप, त्याग और निष्काम भक्ति को देखकर कैलाशपति भगवान शिव का आसन डोल उठा। वे तृतीया तिथि की रात्रि को माता पार्वती के सामने साक्षात प्रकट हुए। शिवजी ने पार्वती से कहा, “हे देवी! मैं तुम्हारी कठिन साधना और अनन्य भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हूँ। मांगो, तुम्हें क्या वरदान चाहिए?”
माता पार्वती ने अत्यंत आदर और श्रद्धापूर्वक सिर झुकाकर कहा, “हे महादेव! यदि आप सचमुच मेरी भक्ति से प्रसन्न हैं, तो मुझे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लीजिए।”
भगवान शिव ने प्रसन्नतापूर्वक ‘तथास्तु’ कहा और अंतर्ध्यान हो गए। अगले दिन सुबह पर्वतराज हिमालय अपनी पुत्री को ढूंढते हुए उस गुफा तक पहुंचे। उन्होंने देखा कि उनकी पुत्री अत्यंत दुर्बल अवस्था में मिट्टी के शिवलिंग के पास बैठी है। हिमालयराज ने रोते हुए पार्वती से घर लौटने की प्रार्थना की।
तब पार्वती ने अपने पिता से कहा, “पिताजी, मैंने भगवान शिव को अपना पति मान लिया है। यदि आप मेरा विवाह शिवजी से कराने का वचन देते हैं, तभी मैं आपके साथ घर चलूंगी, अन्यथा मैं इसी जंगल में अपने प्राण त्याग दूंगी।” अपनी प्रिय पुत्री के इस दृढ़ संकल्प और अटूट विश्वास को देखकर हिमालयराज का हृदय पिघल गया। उन्होंने शिव-पार्वती के विवाह की स्वीकृति दे दी। इसके बाद पूरे विधि-विधान के साथ शिव और पार्वती का पावन विवाह संपन्न हुआ।
हरतालिका तीज व्रत के नियम और पूजा विधि
भगवान शिव ने माता पार्वती को बताया कि जो भी स्त्री इस पावन तिथि को निराहार और निर्जला रहकर हमारा पूजन करेगी, उसे अखंड सौभाग्यवती होने का वरदान प्राप्त होगा। इस व्रत में भगवान शिव, माता पार्वती और श्री गणेश जी की मिट्टी की मूर्तियां बनाई जाती हैं। सुहागिन महिलाएं सोलह श्रृंगार करके सुहाग की सामग्री माता पार्वती को अर्पित करती हैं और रातभर भजन-कीर्तन कर जागरण करती हैं। अगले दिन सुबह पारण के बाद ही व्रत का समापन किया जाता है।
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