सम्मान‌ (Samman): एक सीख देने वाली नैतिक कहानी

क्या पैसा और ताकत असली सम्मान दिला सकते हैं? पढ़िए दिल को छू लेने वाली हिंदी नैतिक कहानी 'सम्मान' और जानिए सम्मान की असली परिभाषा।

Samman

जीवन में हमें कई प्रकार के लोग मिलते हैं। कुछ लोग अपने धन और पद के बल पर दूसरों से आदर पाना चाहते हैं, तो कुछ अपने सरल और विनम्र व्यवहार से लोगों के दिलों पर राज करते हैं। आज की हमारी नैतिक कहानी “सम्मान” (Samman Moral Story in Hindi) इसी विषय पर आधारित है, जो हमें सिखाती है कि आदर कमाया जाता है, इसे बलपूर्वक या धन के दम पर छीना नहीं जा सकता।

रमाकांत का अटूट अहंकार

एक समय की बात है, सुंदरगढ़ नाम के एक समृद्ध नगर में रमाकांत नाम का एक बहुत बड़ा और धनी व्यापारी रहता था। उसके पास आलीशान महल, दर्जनों नौकर-चाकर, और अपार धन-संपत्ति थी। व्यापार में उसकी सफलता की गूंज दूर-दूर तक थी। लेकिन इस अपार धन ने रमाकांत के भीतर एक गहरा अहंकार पैदा कर दिया था।

वह अपने से छोटे वर्ग के लोगों, जैसे अपने नौकरों, मजदूरों और गरीब ग्रामीणों को बहुत तुच्छ समझता था। वह हमेशा उनसे ऊंचे स्वर में बात करता और उन्हें नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ता था। रमाकांत का मानना था कि दुनिया में सब कुछ पैसे से खरीदा जा सकता है, यहाँ तक कि लोगों का सम्मान भी। उसके डर और प्रभाव के कारण लोग उसके सामने तो हाथ जोड़कर खड़े रहते थे, लेकिन पीठ पीछे उसकी निंदा करते थे।

इसके विपरीत, उसी नगर के बाहरी इलाके में शंभू नाम का एक गरीब लकड़हारा रहता था। शंभू दिनभर जंगल से सूखी लकड़ियां इकट्ठा करता, उन्हें बाजार में बेचता और जो भी मामूली कमाई होती, उसी से अपने परिवार का भरण-पोषण करता था। शंभू के पास धन तो नहीं था, लेकिन उसका हृदय बहुत विशाल था। वह नगर के हर छोटे-बड़े व्यक्ति का आदर करता था और हर किसी की मदद के लिए सदैव तत्पर रहता था। पूरे नगर के लोग शंभू से प्रेम करते थे और उसे बहुत सम्मान देते थे।

महात्मा शिवानंद का नगर में आगमन

एक दिन, सुंदरगढ़ में स्वामी शिवानंद नाम के एक महान और सिद्ध संत का आगमन हुआ। उनके ज्ञान और सादगी के चर्चे सुनकर पूरा नगर उनके दर्शन के लिए उमड़ पड़ा। जब रमाकांत को उनके आगमन की सूचना मिली, तो उसने सोचा कि क्यों न महात्मा जी को अपने महल में आमंत्रित किया जाए। इससे नगर में उसकी प्रतिष्ठा और बढ़ जाएगी।

रमाकांत अपने कीमती रथ पर सवार होकर महात्मा जी के शिविर में पहुंचा। उसने बड़े घमंड के साथ महात्मा जी को प्रणाम किया और कहा, “हे स्वामी जी! मैं इस नगर का सबसे धनी व्यक्ति रमाकांत हूँ। मेरी इच्छा है कि आप मेरे महल में पधारें। मैंने आपके विश्राम के लिए सोने के पलंग और भोजन के लिए छप्पन भोग की व्यवस्था की है। कृपया मुझे सेवा का अवसर देकर कृतार्थ करें।”

महात्मा शिवानंद ने रमाकांत के चेहरे पर छिपे अहंकार को तुरंत भांप लिया। उन्होंने मुस्कुराते हुए अत्यंत विनम्रता से कहा, “सेठ जी, आपके आमंत्रण के लिए धन्यवाद। परंतु मैं एक सन्यासी हूँ, मुझे सोने के महल और छप्पन भोग की कोई आवश्यकता नहीं है। मैंने पहले ही आज रात के भोजन और विश्राम के लिए शंभू लकड़हारे का आमंत्रण स्वीकार कर लिया है।”

यह सुनकर रमाकांत के अहंकार को गहरी ठेस पहुंची। उसने गुस्से को दबाते हुए कहा, “स्वामी जी! आप उस तुच्छ और दरिद्र लकड़हारे की झोपड़ी में ठहरेंगे? उसके पास तो आपको खिलाने के लिए सूखी रोटी भी मुश्किल से होगी। मेरे महल के सामने उसकी क्या बिसात है?”

महात्मा जी शांत रहे और उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया।

धन और आदर के बीच का अंतर

शाम को महात्मा शिवानंद शंभू लकड़हारे की टूटी-फूटी झोपड़ी में पहुंचे। शंभू और उसके परिवार ने अत्यंत श्रद्धा और आदर के साथ महात्मा जी का स्वागत किया। शंभू की पत्नी ने बाजरे की सूखी रोटी और हरी मिर्च की चटनी बनाई थी। शंभू ने बड़े संकोच के साथ वह भोजन महात्मा जी के सामने परोसा। महात्मा जी ने उस भोजन को अमृत के समान ग्रहण किया, क्योंकि उसमें दिखावे का कोई स्थान नहीं था, केवल सच्चा प्रेम और सम्मान था।

रमाकांत से यह सब सहन नहीं हो रहा था। वह अगले दिन सुबह फिर महात्मा जी के पास पहुंचा और बोला, “स्वामी जी, मुझे कल रात नींद नहीं आई। मैं जानना चाहता हूँ कि आपने मेरे आलीशान महल को छोड़कर उस गरीब की झोपड़ी को क्यों चुना? क्या मेरे धन की कोई कीमत नहीं है? क्या मेरा समाज में कोई सम्मान नहीं है?”

सम्मान का असली पाठ

महात्मा शिवानंद ने रमाकांत की बात सुनी और एक खाली कुएं के पास जाकर खड़े हो गए। उन्होंने रमाकांत से कहा, “रमाकांत, इस कुएं के अंदर जोर से चिल्लाओ और कहो कि ‘मैं तुमसे नफरत करता हूँ।'”

रमाकांत ने वैसा ही किया। कुएं से तुरंत वापस आवाज आई— “मैं तुमसे नफरत करता हूँ… नफरत करता हूँ…”

अब महात्मा जी ने कहा, “अब इस कुएं में प्रेमपूर्वक कहो कि ‘मैं तुमसे प्रेम करता हूँ।'”

रमाकांत ने कुएं में चिल्लाकर कहा, “मैं तुमसे प्रेम करता हूँ!” कुएं से वही मधुर गूंज वापस आई— “मैं तुमसे प्रेम करता हूँ… प्रेम करता हूँ…”

महात्मा जी ने रमाकांत के कंधे पर हाथ रखा और अत्यंत सौम्यता से समझाया, “रमाकांत! हमारा जीवन और समाज भी इसी कुएं की तरह है। तुम दूसरों को जो दोगे, वही गूंजकर तुम्हारे पास वापस आएगा। तुम अपने धन के बल पर लोगों को डरा सकते हो, उनका समय खरीद सकते हो, लेकिन उनका आदर और सम्मान कभी नहीं खरीद सकते।”

उन्होंने आगे कहा, “लोग तुम्हारे धन के भय से तुम्हारे सामने सिर झुकाते हैं, वह तुम्हारा सम्मान नहीं, बल्कि तुम्हारी शक्ति का डर है। इसके विपरीत, शंभू हर किसी को निस्वार्थ भाव से सम्मान देता है, इसलिए लोग उसे दिल से आदर देते हैं। याद रखो, सम्मान एक ऐसा उपहार है जिसे पाने के लिए पहले उसे दूसरों को देना पड़ता है।”

बदलाव की शुरुआत

महात्मा जी की इस सरल लेकिन गहरी बात ने रमाकांत की आँखें खोल दीं। उसका अहंकार चूर-चूर हो गया। उसे समझ आ गया कि असली धन तिजोरी में बंद सोना नहीं, बल्कि दूसरों के दिलों में अर्जित किया गया सम्मान है।

रमाकांत ने महात्मा जी के चरणों में गिरकर अपने अशिष्ट व्यवहार के लिए क्षमा मांगी। उस दिन के बाद, रमाकांत का व्यवहार पूरी तरह बदल गया। उसने अपने नौकरों से प्यार से बात करना शुरू किया, गरीबों की मदद के लिए अपने धन का उपयोग परोपकार के कार्यों में लगाया। धीरे-धीरे, नगर के लोग भी उसे दिल से सम्मान देने लगे। अब उसे बिना किसी भय या लालच के सच्चा आदर मिल रहा था।

सीख (Moral): आदर और सम्मान केवल धन या शक्ति से प्राप्त नहीं किया जा सकता। यदि आप दूसरों से सम्मान पाना चाहते हैं, तो सबसे पहले आपको दूसरों का सम्मान करना सीखना होगा।


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