
मनुष्य का मन भी बड़ा अजीब होता है। सालों के विश्वास की मजबूत दीवार को ढहने के लिए कभी-कभी किसी बड़े तूफान की जरूरत नहीं होती, बल्कि संदेह का एक छोटा सा कण ही काफी होता है। यह कहानी भी कुछ ऐसी ही है, जो हमें सिखाती है कि कैसे एक छोटी सी ‘किरकिरी’ पूरे जीवन के आनंद को नष्ट कर सकती है।
अटूट दोस्ती की शुरुआत
सुंदरगढ़ नाम के एक छोटे से कस्बे में रमन और माधव रहते थे। दोनों बचपन के दोस्त थे। उनकी दोस्ती की मिसाल पूरे कस्बे में दी जाती थी। रमन स्वभाव से थोड़ा भावुक और जल्दबाज़ था, जबकि माधव बेहद शांत, गंभीर और समझदार था। दोनों ने मिलकर मिट्टी के बर्तनों और कलाकृतियों का एक छोटा सा व्यवसाय शुरू किया था।
माधव अपनी जादुई उंगलियों से मिट्टी को सुंदर आकार देता था, और रमन अपने गजब के वाक-कौशल (marketing skills) से उन बर्तनों को शहर के बड़े बाजारों में अच्छे दामों पर बेचता था। दोनों की मेहनत रंग लाई और धीरे-धीरे उनका व्यवसाय चल पड़ा। उनके बीच पैसों का कोई हिसाब-किताब नहीं था। जो भी कमाई होती, दोनों आधा-आधा बांट लेते। दोनों के परिवारों में भी सगे भाइयों जैसा प्रेम था।
जब शंका की ‘किरकिरी’ मन में पड़ी
कहते हैं कि खुशियों को नजर लगते देर नहीं लगती। एक दिन कस्बे के ही एक चालाक व्यापारी, धनीराम की नजर उनके फलते-फूलते व्यापार पर पड़ी। वह रमन और माधव की एकता को तोड़ना चाहता था ताकि वह खुद उस बाजार पर कब्जा कर सके।
एक शाम जब रमन चाय की दुकान पर अकेला बैठा था, धनीराम उसके पास आया और बड़ी सहानुभूति जताते हुए बोला, “रमन भाई! तुम्हारी मेहनत का जवाब नहीं। रात-दिन तुम शहर की दौड़ लगाते हो, ग्राहकों को मनाते हो। लेकिन मुझे दुख इस बात का है कि असली मलाई तो कोई और खा रहा है।”
रमन ने हैरान होकर पूछा, “आप क्या कहना चाहते हैं, धनीराम जी?”
धनीराम ने कानाफूसी करते हुए कहा, “अरे भाई, सीधे मत बनो! मिट्टी तो मुफ्त की है। माधव बस दिन में दो-चार घंटे चाक चलाता है और तुम दिन-भर धूप में पसीना बहाते हो। फिर भी आधा मुनाफा माधव ले जाता है। क्या तुम्हें नहीं लगता कि तुम्हारी मेहनत का फायदा वह उठा रहा है?”
रमन ने उस समय तो धनीराम को झिड़क दिया, लेकिन धनीराम की बातें उसके दिमाग में एक बारीक धूल के कण की तरह बैठ गईं। जैसे आंख में पड़ी एक छोटी सी ‘किरकिरी’ पूरे शरीर को बेचैन कर देती है, वैसे ही रमन के मन में पड़े उस संदेह के कण ने उसकी शांति छीन ली।
संदेह का बढ़ता दायरा
अब रमन को हर बात में माधव पर संदेह होने लगा। जब माधव काम से थककर थोड़ी देर आराम करता, तो रमन को लगता कि वह कामचोरी कर रहा है। जब पैसों का बंटवारा होता, तो रमन के मन में कसक उठती कि मेहनत उसकी ज्यादा है और पैसे आधे मिल रहे हैं।
माधव ने रमन के व्यवहार में आए इस बदलाव को महसूस किया। वह कई बार रमन से पूछता, “रमन, कोई बात है क्या? तुम खिंचे-खिंचे से रहते हो?”
लेकिन रमन बात को टाल देता और कहता, “नहीं, बस थकान है।” मन की कड़वाहट धीरे-धीरे उनके काम पर भी दिखने लगी। रमन ने अब बर्तनों की बिक्री का सही हिसाब माधव को देना बंद कर दिया। उसके मन की किरकिरी अब नासूर बनती जा रही थी।
जब रिश्ता टूटा
एक दिन सब्र का बांध टूट गया। एक बड़े ऑर्डर के पैसों को लेकर दोनों के बीच बहस हो गई। रमन ने गुस्से में आकर कह ही दिया, “माधव, अब हम साथ काम नहीं कर सकते। मेहनत मेरी होती है और नाम तुम्हारा। मैं अब अपना रास्ता अलग कर रहा हूँ।”
माधव स्तब्ध रह गया। उसने रमन को समझाने की बहुत कोशिश की, “भाई, यह व्यापार हमारी दोस्ती की बुनियाद पर खड़ा है। पैसों की वजह से इसे मत तोड़ो।” लेकिन रमन के सिर पर तो संदेह का भूत सवार था। उसने दुकान का बंटवारा कर लिया।
बंटवारे के बाद रमन ने अलग काम शुरू किया और माधव ने अलग। रमन को लगता था कि वह सारा मुनाफा खुद रखकर बहुत अमीर बन जाएगा। लेकिन हकीकत कुछ और थी। माधव के बिना मिट्टी के बर्तनों में वह फिनिशिंग और खूबसूरती नहीं आ पाती थी, जिसके लिए उनके बर्तन मशहूर थे। धीरे-धीरे रमन के ग्राहक घटने लगे। दूसरी तरफ, माधव को भी मार्केटिंग का अनुभव न होने के कारण नुकसान उठाना पड़ रहा था। लेकिन माधव ने कभी रमन के खिलाफ जहर नहीं उगला।
सत्य का एहसास और पछतावा
कुछ महीने बीत गए। एक दिन रमन की बेटी बहुत गंभीर रूप से बीमार हो गई। अस्पताल में डॉक्टर ने इलाज के लिए मोटी रकम मांगी। रमन के पास सारा जमा-पूंजी खत्म हो चुकी थी क्योंकि व्यापार ठप था। उसने कई लोगों से मदद मांगी, यहाँ तक कि धनीराम के पास भी गया। लेकिन धनीराम ने साफ मना कर दिया।
हताश रमन अस्पताल के बाहर सिर पकड़ कर रो रहा था। तभी डॉक्टर बाहर आए और बोले, “रमन जी, घबराइए मत। आपके किसी शुभचिंतक ने अस्पताल का पूरा बिल चुका दिया है और आपकी बेटी के इलाज की दवाइयां भी मंगवा दी हैं।”
रमन ने चौंककर पूछा, “कौन है वह दयालु इंसान?”
डॉक्टर ने इशारा किया। सामने बेंच पर माधव बैठा हुआ था। उसने अपनी जमीन का एक हिस्सा बेचकर रमन की बेटी की जान बचाई थी।
यह देखकर रमन के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसकी आंखों से आंसुओं का सैलाब बह निकला। आज उसके मन से संदेह की वह ‘किरकिरी’ हमेशा-हमेशा के लिए निकल गई थी, जिसने उसकी आंखों पर अविश्वास की पट्टी बांध रखी थी।
वह दौड़कर माधव के गले लग गया और फूट-फूटकर रोने लगा, “मुझे माफ कर दो भाई! मैं कितना अंधा हो गया था। एक बाहरी इंसान की बातों में आकर मैंने अपनी जिंदगी के सबसे अनमोल रिश्ते का गला घोंट दिया।”
माधव ने मुस्कुराते हुए रमन के आंसू पोंछे और कहा, “पागल, आंख में किरकिरी पड़ जाए तो आंख को फोड़ा नहीं जाता, बस पानी के छींटे मारकर उस किरकिरी को बाहर निकाला जाता है। हमारे बीच जो हुआ, वह एक भूल थी। अब चलो, घर चलें।”
कहानी से सीख (Moral of the Story)
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि किसी तीसरे व्यक्ति की बातों में आकर कभी भी अपने अपनों पर संदेह नहीं करना चाहिए। विश्वास को कमाना बहुत मुश्किल है, लेकिन इसे खोना बेहद आसान है। मन में आई छोटी सी शंका या ‘किरकिरी’ को बातचीत के पानी से समय रहते साफ कर लेना चाहिए, वरना वह हँसते-खेलते रिश्तों को उजाड़ देती है।
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