
समय की धूल जब खूबसूरत से खूबसूरत रिश्तों पर जमने लगती है, तो अक्सर प्यार का असली अहसास कहीं खो जाता है। राहुल और प्रिया के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा था। कॉलेज के दिनों का वह ‘पहला अफेयर’ जो कभी हवा के ताजा झोंके की तरह महसूस होता था, अब शादी के पांच साल बाद जिम्मेदारियों, उम्मीदों और रोजमर्रा के छोटे-मोटे झगड़ों के नीचे दब चुका था।
दोनों एक ही छत के नीचे रहते थे, लेकिन उनके बीच की दूरियां मीलों लंबी हो चुकी थीं। सुबह की चाय से लेकर रात के डिनर तक, बातचीत सिर्फ घर के कामों और खर्चों तक ही सीमित रह गई थी।
रिश्तों पर जमी वक्त की धूल
एक ढलती हुई शाम, दोनों के बीच किसी छोटी सी बात पर बड़ी बहस हो गई। बहस इतनी बढ़ गई कि दोनों ने एक-दूसरे के अतीत की गलतियां और कमियां गिनाना शुरू कर दिया। प्रिया की आंखों में आंसू आ गए। उसने तंग आकर कहा, “राहुल, हम कहाँ खो गए? क्या हम वही लोग हैं जो कभी एक-दूसरे की आवाज़ सुनने के लिए पूरी रात जागते थे? आज हम एक-दूसरे को बर्दाश्त भी नहीं कर पा रहे हैं।”
राहुल ने एक गहरी सांस ली और खिड़की के बाहर देखने लगा। उसने बेहद ठंडे लहजे में कहा, “शायद वक्त के साथ सब बदल जाता है, प्रिया। अब हमारे बीच वह बात नहीं रही। हम एक-दूसरे को बहुत अच्छी तरह जान चुके हैं, और शायद यही हमारी सबसे बड़ी समस्या बन गई है।”
एक अनोखा फैसला: ‘चलो अजनबी बनते हैं’
प्रिया ने अपनी आंखों के आंसू पोंछे। उसके दिमाग में एक विचार आया। उसने राहुल की तरफ देखा और कहा, “राहुल, क्या हम एक आखिरी कोशिश कर सकते हैं? चलो, फिर से अजनबी बन जाते हैं। कोई शिकायत नहीं, कोई अतीत नहीं, कोई अधिकार नहीं।”
राहुल ने हैरान होकर पूछा, “क्या मतलब? अजनबी कैसे बन सकते हैं?”
प्रिया ने मुस्कुराते हुए कहा, “कल शाम हम शहर के उसी विंटेज कैफे में मिलेंगे, जहाँ हमारी पहली मुलाकात हुई थी। लेकिन इस बार, हम पति-पत्नी की तरह नहीं, बल्कि दो अजनबी बनकर मिलेंगे जो पहली बार एक-दूसरे का सामना कर रहे हैं। हम नए सिरे से शुरुआत करेंगे।”
राहुल को यह विचार थोड़ा अजीब और बचकाना लगा, लेकिन अपनी दम तोड़ती शादी को एक और मौका देने के लिए उसने हामी भर दी।
कैफे की वह शाम और धड़कता दिल
अगले दिन शाम के सात बजे राहुल विंटेज कैफे पहुँचा। उसने अपनी वही पसंदीदा नीली शर्ट पहनी थी, जो वह कॉलेज के दिनों में अक्सर पहना करता था। उसका दिल अजीब सी घबराहट से धड़क रहा था।
तभी कैफे का दरवाजा खुला और प्रिया अंदर आई। उसने पीले रंग का अनारकली सूट पहना हुआ था, बाल खुले थे और होंठों पर हल्की सी लाली थी। वह इतनी खूबसूरत लग रही थी कि राहुल उसे देखता ही रह गया। बरसों बाद राहुल के दिल में वही हलचल हुई जो कॉलेज के दिनों में प्रिया को पहली बार देखकर हुई थी।
प्रिया ने कैफे में चारों तरफ देखा, जैसे वह किसी को ढूंढ रही हो। फिर उसकी नजर राहुल पर पड़ी। वह धीमी कदमों से राहुल की टेबल की तरफ बढ़ी।
अजनबीपन में छुपा पुराना प्यार
“क्या यह सीट खाली है?” प्रिया ने अजनबी लहजे में पूछा।
राहुल ने अपनी घबराहट छुपाते हुए कहा, “हाँ, बिल्कुल। कृपया बैठिए।”
दोनों के बीच थोड़ी देर की खामोश बातचीत के बाद राहुल ने शुरुआत की, “हेलो, मैं राहुल। एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर और खाली वक्त में थोड़ी-बहुत पेंटिंग का शौक रखता हूँ।”
प्रिया ने मुस्कुराते हुए अपना हाथ आगे बढ़ाया, “हेलो, मैं प्रिया। मुझे किताबें पढ़ना और कॉफी पीना पसंद है।”
इस बनावटी अजनबीपन के खेल ने दोनों के बीच की जमी बर्फ को पिघला दिया। वे दोनों उन चीजों के बारे में बात करने लगे जो वे रोजमर्रा की भागदौड़ में भूल चुके थे। राहुल ने अपने उन सपनों के बारे में बताया जो काम के दबाव में कहीं दब गए थे, और प्रिया ने अपने उन शौकों का जिक्र किया जिन्हें वह घर संभालते-संभालते छोड़ चुकी थी।
बिना किसी अधिकार या उम्मीद के, वे दोनों एक-दूसरे को फिर से सुन रहे थे। कैफे की हल्की रोशनी और बैकग्राउंड में बज रहे धीमे संगीत के बीच, उन्हें एहसास हुआ कि वे आज भी एक-दूसरे के विचारों और बातों से उतने ही प्रभावित हैं जितने पहले अफेयर के दौरान थे।
एक नई शुरुआत
जब कैफे बंद होने का समय हुआ, तो राहुल ने प्रिया का हाथ धीरे से अपने हाथ में लिया। इस बार उस स्पर्श में कोई हिचकिचाहट नहीं थी, बल्कि एक पुराना अपनापन और नया रोमांच था।
राहुल ने प्रिया की आंखों में देखते हुए कहा, “प्रिया, मुझे खुशी है कि मैं आज इस खूबसूरत अजनबी से मिला। क्या मुझे इस अजनबी से दोबारा मिलने का मौका मिलेगा?”
प्रिया की आंखों में खुशी के आंसू छलक आए। उसने राहुल के कंधे पर अपना सिर रख दिया और कहा, “हमेशा…”
कभी-कभी, रिश्तों को जिंदा रखने के लिए उन्हें पूरी तरह से नए नजरिए से देखना पड़ता है। अजनबी बनने के इस छोटे से खेल ने राहुल और प्रिया के पहले अफेयर की मासूमियत को दोबारा जिंदा कर दिया था।
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