
एक समय की बात है, सुंदरगढ़ नाम के एक बेहद शांत और सुरम्य गाँव के बाहर एक बहुत बड़ा और सदियों पुराना बरगद का पेड़ था। उस पेड़ का फैलाव इतना विशाल था कि उसकी विशाल शाखाएं चारों दिशाओं में दूर-दूर तक फैली हुई थीं। गाँव के थके-हारे राहगीर, पशु-पक्षी और खेलते-कूदते बच्चे सभी दोपहर की तपन से बचने के लिए उसी पेड़ का सहारा लेते थे। गाँव के लोगों ने उस पेड़ के प्रति सम्मान और प्रेम प्रकट करने के लिए उसका नाम ‘छाया’ रखा था। ‘छाया’ केवल एक पेड़ नहीं था, बल्कि उस सूखे और तप्त मार्ग पर चलने वाले हर थके-हारे मुसाफिर के लिए एक ईश्वरीय वरदान था।
तपती दोपहर और सोमदत्त का आगमन
एक गर्मी की दोपहर, जब सूरज आसमान से आग के गोले बरसा रहा था और धरती तवे की तरह जल रही थी, सोमदत्त नाम का एक धनी लेकिन बेहद लालची व्यापारी उस रास्ते से गुजर रहा था। सोमदत्त स्वभाव से बहुत ही संकीर्ण सोच का व्यक्ति था। वह जीवन के हर मोड़ पर, हर रिश्ते में और हर वस्तु में केवल अपना आर्थिक लाभ ढूंढता था। चिलचिलाती धूप में मीलों चलने के कारण उसका शरीर थक चुका था और वह पसीने से तरबतर था।
तभी उसकी नजर उस विशाल बरगद के पेड़ ‘छाया’ पर पड़ी। घनी हरी पत्तियों के झुरमुट और ठंडी हवा के झोंकों को देखकर उसने राहत की सांस ली। वह तेजी से पेड़ की ओर बढ़ा और उसकी घनी, शीतल छांव में बैठ गया। पेड़ के नीचे कदम रखते ही उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने उस पर ठंडे पानी की बौछार कर दी हो। सोमदत्त ने अपने थैले से पानी निकाला, अपनी प्यास बुझाई और कुछ देर आराम करने के लिए वहाँ बिछे सूखे पत्तों पर लेट गया।
स्वार्थ की सीमा और कृतघ्नता
हवा के शीतल झोंके सोमदत्त की थकान को धीरे-धीरे दूर कर रहे थे। लेकिन, ऐसे सुकून के क्षणों में भी सोमदत्त का लालची दिमाग शांत नहीं था। लेटे-लेटे उसने ऊपर की ओर देखा। पेड़ की मोटी और मजबूत शाखाओं को देखकर उसके मन में कुटिल विचार आने लगे।
उसने मन ही मन सोचा, “यह बरगद का पेड़ आकार में तो इतना विशाल है, लेकिन यह कितना व्यर्थ है! इस पर न तो आम या सेब की तरह कोई मीठा और कीमती फल लगता है, और न ही इसके फूल किसी काम के हैं। यह बस इतनी बड़ी जमीन घेर कर खड़ा है। अगर मैं इसकी इन मजबूत शाखाओं को काट लूं, तो मुझे बहुत कीमती लकड़ी मिलेगी। इसे शहर के बाजार में बेचकर मैं भारी मुनाफा कमा सकता हूँ। यह पेड़ दूसरों को मुफ्त में छांव देने के अलावा भला किस काम का है?”
वह पेड़ के निस्वार्थ उपकार को भूलकर उसे नष्ट करने की योजना बनाने लगा। वह यह भूल गया कि कुछ ही मिनट पहले इसी पेड़ ने उसे झुलसती गर्मी से नया जीवन दिया था।
एक भयानक स्वप्न और बोध
इन्हीं स्वार्थी विचारों में डूबे-डूबे सोमदत्त की आँख लग गई। नींद आते ही उसने एक अत्यंत भयानक और सजीव सपना देखा। सपने में उसने खुद को एक विशाल मरुस्थल (रेगिस्तान) के बीचों-बीच पाया। वहाँ दूर-दूर तक न तो कोई पानी की बूंद थी और न ही कोई पेड़। सूरज की तपिश इतनी तीव्र थी कि उसकी त्वचा जलने लगी थी। सोमदत्त प्यास और गर्मी से तड़पते हुए मदद के लिए चिल्ला रहा था, लेकिन उसकी आवाज सुनने वाला वहाँ कोई नहीं था।
तड़पते-तड़पते जब उसके पैर जलने लगे और वह मौत के करीब पहुँच गया, तभी अचानक आसमान में एक विशाल, घना बादल छाया। उस बादल ने सोमदत्त को सूर्य की सीधी किरणों से बचा लिया और उस पर अपनी ठंडी छांव बिखेर दी। उस छांव के स्पर्श मात्र से सोमदत्त की सांसें वापस आ गईं।
उसने राहत की सांस लेते हुए आसमान की तरफ देखा और कहा, “हे दिव्य बादल! आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। अगर आज आप मुझे यह छांव न देते, तो मैं तड़प-तड़प कर मर जाता।”
तभी उस बादल से एक गहरी और गंभीर गूँज सुनाई दी, “सोमदत्त! जिस छांव (छाया) के महत्व को आज तुम अपनी जान बचने पर समझ रहे हो, उसी छाया को तुम कुछ देर पहले निरर्थक मानकर काटने की योजना बना रहे थे। क्या इस संसार में हर सुंदर और जीवनदायी वस्तु का मूल्यांकन केवल पैसों के तराजू में किया जाएगा? क्या निस्वार्थ भाव से दूसरों को सुख देना कोई मूल्य नहीं रखता?”
हृदय परिवर्तन और सच्ची सीख
वह गंभीर आवाज सुनते ही सोमदत्त डर के मारे हड़बड़ाकर उठ बैठा। वह थर-थर कांप रहा था और उसका पूरा शरीर पसीने से भीगा हुआ था। उसने तुरंत उठकर उस विशाल बरगद के पेड़ ‘छाया’ को देखा। हवा के झोंकों से उसकी पत्तियां सरसरा रही थीं, मानो वे कह रही हों, “हमने कभी किसी से अपनी छांव का मोल नहीं मांगा।”
सोमदत्त को अपनी अज्ञानता और स्वार्थी सोच पर बेहद पश्चाताप हुआ। उसकी आँखों से आंसू बहने लगे। उसने पेड़ के मोटे तने को गले लगाया और रोते हुए अपनी भूल की क्षमा मांगी। उसे समझ आ चुका था कि प्रकृति की निस्वार्थ सेवा ही इस सृष्टि का असली आधार है। यदि पेड़-पौधे और नदियाँ केवल अपने फायदे के बारे में सोचने लगें, तो यह संपूर्ण सृष्टि नष्ट हो जाएगी।
उस दिन के बाद सोमदत्त का जीवन पूरी तरह बदल गया। उसने स्वार्थ का मार्ग छोड़कर परोपकार का रास्ता अपनाया और गाँव में कई नए छायादार वृक्ष लगवाए।
सीख: इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि निस्वार्थ भाव से दूसरों की सेवा करना ही सबसे बड़ा धर्म है। हमारे अच्छे कर्म और दयालुता ही समाज में हमारी असली ‘छाया’ (पहचान) बनते हैं, जो हमारे जाने के बाद भी लोगों को सुकून देती है।
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