
गाँव की एक छोटी सी झोपड़ी में शांति देवी अपने बेटे राहुल के साथ रहती थीं। राहुल के पिता का देहांत तब हो गया था जब वह केवल पाँच वर्ष का था। शांति के पास न तो कोई बड़ी ज़मीन थी और न ही कोई धन-संपत्ति। उनके पास जीने का एकमात्र सहारा था—उनका बेटा राहुल, और सिलाई की एक पुरानी मशीन। शांति देवी ने उसी मशीन के सहारे दिन-रात मेहनत करके राहुल का पालन-पोषण किया।
संघर्ष और माँ का सपना
गाँव के लोग अक्सर शांति देवी से कहते थे, “शांति, तू अकेली औरत है, आखिर कब तक इस सिलाई मशीन पर अपनी आँखें फोड़ेगी? राहुल को किसी दुकान पर काम पर लगा दे, घर में दो पैसे आने लगेंगे।” लेकिन शांति का सपना कुछ और ही था। वह अपने बेटे को एक बड़ा और पढ़ा-लिखा इंसान बनाना चाहती थी। वह खुद भले ही सूखी रोटी खाकर सो जाती, लेकिन राहुल की पढ़ाई-लिखाई और उसकी ज़रूरत की चीज़ों में कभी कोई कमी नहीं आने देती थी। कड़ाके की ठंड हो या तपती गर्मी, शांति देवी लालटेन की मद्धम रोशनी में रात-रात भर कपड़े सिलती रहती थीं ताकि राहुल की स्कूल की फीस समय पर जमा हो सके।
राहुल भी अपनी माँ के इस कड़े संघर्ष को करीब से देखता था। वह पढ़ने में बहुत तेज़ था और अपनी माँ की मेहनत का मान रखना चाहता था। स्कूल के बाद वह कॉलेज की परीक्षा में भी अव्वल आया। उसकी कड़ी मेहनत का फल तब मिला जब शहर की एक बहुत बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में उसकी नौकरी लग गई।
शहर की चकाचौंध और बदलता व्यवहार
नौकरी मिलने के बाद राहुल शहर चला गया। शुरुआत में तो वह अपनी माँ को नियमित रूप से पैसे भेजता था और रोज़ फोन पर उनका हाल-चाल पूछता था। लेकिन धीरे-धीरे समय बीतने के साथ शहर की आधुनिक जीवनशैली और काम के दबाव में वह अपनी माँ को भूलने लगा। राहुल ने शहर में ही अपनी पसंद की लड़की से शादी कर ली। उसने अपनी माँ को शादी में आमंत्रित तो किया, लेकिन शादी के बाद उसने उन्हें अपने साथ रखने से मना कर दिया।
राहुल की पत्नी को शांति देवी का देहाती पहनावा और सीधा-साधा स्वभाव पसंद नहीं था। राहुल भी अपनी पत्नी की बातों में आकर अपनी उस माँ को एक बोझ समझने लगा, जिसने उसे इस काबिल बनाने के लिए अपनी जवानी कुर्बान कर दी थी। धीरे-धीरे राहुल ने गाँव में पैसे भेजना भी बंद कर दिया और फोन पर बात करना तो लगभग खत्म ही हो गया। शांति देवी गाँव में बिल्कुल अकेली रह गईं, लेकिन उन्होंने कभी भी गाँव वालों के सामने अपने बेटे की बुराई नहीं की। वह आज भी सिलाई करके अपना पेट पालती थीं और हर वक्त अपने बेटे की लंबी उम्र की दुआ माँगती थीं।
एक अनपेक्षित मुलाकात और कड़वा सच
एक दिन राहुल को शहर में अपना खुद का नया फ्लैट खरीदने के लिए एक बड़ी रकम की कमी पड़ी। उसने अपनी पत्नी की सलाह पर सोचा कि क्यों न गाँव वाला पुराना घर और ज़मीन बेच दी जाए, जिससे फ्लैट के लिए ज़रूरी पैसों का इंतज़ाम हो सके। इसी लालच और स्वार्थ के साथ राहुल सालों बाद अपने गाँव वापस लौटा।
जब वह अपने पुराने घर के दरवाज़े पर पहुँचा, तो वहाँ का नज़ारा देखकर दंग रह गया। घर की दीवारें जर्जर हो चुकी थीं और छत से मिट्टी गिर रही थी। उसकी बूढ़ी और कमज़ोर माँ आँगन में बैठकर कांपते हाथों से आज भी उसी पुरानी सिलाई मशीन पर कपड़े सिल रही थीं। राहुल को अचानक सामने देखकर शांति देवी की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। वह अपनी कमज़ोर काया के साथ उठीं और राहुल को गले से लगा लिया।
राहुल ने बिना कोई औपचारिकता निभाए सीधे अपने आने का मकसद बताया, “माँ, मुझे शहर में एक बड़ा फ्लैट लेना है। पैसों की तंगी है, इसलिए मैं इस पुराने घर को और पीछे वाली ज़मीन को बेचने आया हूँ। मुझे कुछ कागज़ात पर तुम्हारे दस्तखत चाहिए।”
माँ का असली खजाना और पश्चाताप
शांति देवी ने कुछ पल के लिए अपने बेटे के चेहरे को देखा। उनकी आँखों में गहरा दर्द था, लेकिन चेहरे पर एक ममतामयी मुस्कान आ गई। उन्होंने कहा, “बेटा, यह घर और जो कुछ भी मेरा है, वह सब तेरा ही तो है। तुझे इसके लिए मुझसे पूछने की भी ज़रूरत नहीं थी।”
इतना कहकर शांति देवी झोपड़ी के अंदर गईं और अपनी पुरानी संदूक से एक मखमली लाल रंग की पोटली निकाल लाईं। उन्होंने वह पोटली राहुल के हाथों में रख दी।
राहुल ने उत्सुकता से जब उस पोटली को खोला, तो वह हैरान रह गया। उसमें सोने के कुछ पुराने गहने और बहुत सारे पैसे सलीके से रखे हुए थे। शांति देवी ने बेहद शांत स्वर में कहा, “बेटा, जब तेरी नई-नई नौकरी लगी थी, तब तू मुझे जो पैसे भेजता था, मैंने उनमें से एक भी पैसा अपने ऊपर खर्च नहीं किया। मुझे पता था कि एक दिन तुझे अपनी जिंदगी में बड़ा काम करने के लिए बहुत सारे पैसों की ज़रूरत पड़ेगी। मैंने तेरे भेजे पैसे और अपनी सिलाई की कमाई से जोड़कर यह सब केवल तेरे लिए बचाकर रखा था।”
राहुल ने जब उन पैसों को देखा और फिर अपनी माँ के पैरों की तरफ नज़र डाली, जहाँ फटी हुई चप्पलें थीं और उनकी साड़ी पर कई पैबंद लगे हुए थे, तो उसका दिल कांप उठा। उसे अपनी माँ का वह निस्वार्थ रूप दिखाई दिया जो केवल देना जानता था, लेना नहीं। राहुल को अपनी गलती का अहसास हुआ और वह फूट-फूटकर रोने लगा। उसने अपनी माँ के पैर पकड़ लिए और रोते हुए कहा, “माँ, मुझे माफ कर दो! मैं कितना अंधा और स्वार्थी हो गया था। मुझे कोई घर नहीं बेचना है, तुम अभी मेरे साथ शहर चलोगी।”
शांति देवी ने अपने कांपते हाथों से राहुल के आँसू पोंछे और उसे अपने आंचल में समेट लिया। माँ का प्यार तो सागर से भी गहरा होता है, जिसमें बच्चों की हर खता आसानी से समा जाती है।
कहानी से सीख (Moral of the Story)
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि इस पूरी दुनिया में माँ-बाप के प्यार और उनके त्याग से बढ़कर कुछ भी नहीं है। हम जिंदगी में चाहे कितने भी बड़े मुकाम पर क्यों न पहुँच जाएँ, हमें कभी भी अपने माता-पिता के संघर्षों और उनके निस्वार्थ प्रेम को नहीं भूलना चाहिए। माता-पिता का आदर करना और बुढ़ापे में उनका सहारा बनना ही मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है।
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