कहानी- अजी सुनती हो… (Short Story- Aji Sunti Ho…)

पढ़िए 'अजी सुनती हो...' - एक खूबसूरत और दिल को छू लेने वाली हिंदी रोमांटिक कहानी जो पति-पत्नी के अनकहे प्यार और नोक-झोंक को दर्शाती है।

Aji Sunti Ho

“अजी सुनती हो! मेरी नीली कमीज़ कहाँ रखी है? जरा ढूंढ देना!” रमन ने हमेशा की तरह अलमारी के सारे कपड़े बिखेरते हुए ज़ोर से आवाज़ लगाई।

रसोई से चाय की सोंधी महक के साथ शालिनी की खनकती हुई आवाज़ आई, “सामने ही तो टंगी है अलमारी के दाहिने कोने में, ज़रा अपनी आँखों का इस्तेमाल करिए, सिर्फ आवाज़ का नहीं!”

रमन ने वहाँ देखा, तो वाकई कमीज़ वहीं मुस्कुरा रही थी। वह झेंपते हुए मुस्कुराया और कमीज़ पहनने लगा। यह उनके घर का कोई अनोखा दृश्य नहीं था, बल्कि यह तो उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का एक खूबसूरत हिस्सा था। रमन और शालिनी की शादी को पूरे दस साल हो चुके थे। वक़्त बदला, बाल थोड़े सफेद हुए, ज़िम्मेदारियाँ बढ़ीं, लेकिन रमन की इस आदत में रत्ती भर भी बदलाव नहीं आया।

उनके दिन की शुरुआत और अंत इसी एक तकियाकलाम—”अजी सुनती हो…” से होती थी। चाहे दफ्तर की कोई ज़रूरी फाइल खो गई हो, गाड़ी की चाबी न मिल रही हो, या फिर बस यूँ ही शालिनी को अपने करीब बुलाना हो, रमन के पास अपनी पत्नी का ध्यान खींचने का यही एक जादुई और अचूक मंत्र था।

शालिनी अक्सर चिढ़ने का नाटक करती और कहती, “अगर किसी दिन मैं मायके चली गई या यहाँ नहीं रही, तो आपका क्या होगा? आप तो अपने मोज़े भी खुद नहीं ढूंढ पाएँगे!” लेकिन अंदर ही अंदर वह इस पुकार में छिपे अनकहे और बेइंतहा प्यार को बखूबी महसूस करती थी।

प्यार का एक नया रंग

एक सुहाने रविवार की सुबह, मौसम ने अचानक करवट ली। आसमान में घने काले बादल छा गए और रिमझिम बारिश शुरू हो गई। ठंडी हवा के झोंके खिड़की के पर्दों को उड़ा रहे थे। वातावरण में एक अजीब सी खामोशी और रूहानी मिठास घुल गई थी।

रमन आज खिड़की के पास खड़ा बाहर बरसते पानी को देख रहा था। उसने धीरे से, बिना किसी हड़बड़ी के पुकारा, “अजी सुनती हो…”

इस बार रमन की इस आवाज़ में कोई जल्दबाजी नहीं थी, कोई चीज़ गुम होने की व्याकुलता नहीं थी। इस पुकार में एक अजीब सा ठहराव, एक गहरा अहसास और सिर्फ और सिर्फ शालिनी के लिए प्यार की गुहार थी।

शालिनी मुस्कुराती हुई हाथों में दो कप गरमा-गरम अदरक वाली चाय लेकर कमरे में आई। उसने चाय की प्याली रमन की तरफ बढ़ाते हुए चंचलता से कहा, “कहिए जनाब, आज सुबह-सुबह आपकी कौन सी नायाब चीज़ गुम हो गई है?”

रमन ने चाय का कप मेज पर रखा, शालिनी का नाजुक हाथ अपने हाथों में लिया और उसे हौले से अपने करीब खींच लिया। उसने शालिनी की आँखों में झांकते हुए कहा, “आज कुछ खोया नहीं है शालिनी, बल्कि आज तो मुझे कुछ पाना है।”

शालिनी ने शर्माते हुए अपनी पलकें झुका लीं और पूछा, “क्या पाना है आपको?”

“तुम्हारा वह वक्त, जो हम इस भागदौड़ भरी जिंदगी, ऑफिस की फाइलों और घर के कामों के बीच कहीं पीछे छोड़ आए हैं। देखो न, कितनी खूबसूरत बारिश हो रही है। बिल्कुल वैसी ही, जैसी हमारे कॉलेज के दिनों में हुआ करती थी जब हम पहली बार मिले थे।” रमन ने भावुक होते हुए कहा।

यादों का सफर

दोनों बालकनी में रखी कुर्सियों पर बैठ गए। चाय की चुस्कियों के बीच बारिश की बूंदें ज़मीन पर गिरकर सोंधी खुशबू बिखेर रही थीं। रमन ने अपना हाथ आगे बढ़ाकर शालिनी के कंधे पर रख दिया और शालिनी ने भी बिना किसी संकोच के अपना सिर रमन के मजबूत कंधे पर टिका दिया।

“तुम्हें याद है शालिनी,” रमन ने अतीत की गलियों में कदम रखते हुए कहा, “जब हम पहली बार कॉलेज की कैंटीन में मिले थे? तब भी बारिश हो रही थी और तुम्हारी छतरी हवा में उड़ गई थी।”

शालिनी हंस पड़ी, “हाँ, मुझे सब याद है। और आप बड़े हीरो बनकर अपनी टूटी हुई छतरी लेकर मुझे बचाने आए थे, जिससे हम दोनों ही भीग गए थे। आप तब भी बहुत भुलक्कड़ और नादान थे, और आज भी वैसे ही हैं।”

रमन मुस्कुराया और बोला, “मैं भुलक्कड़ नहीं हूँ शालिनी। मैं तो बस जानबूझकर अपनी चीजें यहाँ-वहाँ रख देता हूँ ताकि मुझे तुम्हें ‘अजी सुनती हो’ कहकर पुकारने का बहाना मिल सके। मेरे लिए यह सिर्फ एक साधारण वाक्य नहीं है। यह मेरे दिल की धड़कन है, जो हर पल तुम्हारा नाम लेती है। यह मेरा तरीका है तुम्हें यह बताने का कि मेरी ज़िंदगी का हर छोटा-बड़ा काम तुम्हारे बिना अधूरा है।”

रमन की इन बातों ने शालिनी के दिल की गहराइयों को छू लिया। उसकी आँखों के कोने ख़ुशी के आँसूओं से नम हो गए। उसने रमन के हाथ को और कसकर थाम लिया।

एक मौन इकरार

शाम ढल चुकी थी, लेकिन बारिश का सिलसिला अभी थमा नहीं था। अचानक बिजली गुल हो गई और चारों तरफ अंधेरा छा गया। रमन ने तुरंत अपने फोन की फ्लैशलाइट जलाई और अलमारी से एक मोमबत्ती निकालकर मेज पर सजा दी।

मोमबत्ती की पीली, चंचल रोशनी में शालिनी का चेहरा किसी अप्सरा जैसा दमक रहा था। रमन मंत्रमुग्ध होकर उसे देखता रहा। उसने घुटनों के बल बैठकर शालिनी के दोनों हाथ अपने हाथों में लिए।

“शालिनी, शायद मैं रोज-रोज तुमसे यह नहीं कह पाता कि तुम मेरे लिए कितनी मायने रखती हो। लेकिन सच यह है कि तुम्हारे बिना मेरा वजूद कुछ भी नहीं है। क्या तुम उम्र के हर पड़ाव पर, जब मेरे बाल पूरी तरह सफेद हो जाएंगे और मेरी आवाज़ कांपने लगेगी, तब भी मेरी इस ‘अजी सुनती हो…’ वाली पुकार का ऐसे ही मुस्कुराकर जवाब देती रहोगी?”

शालिनी ने रोते और मुस्कुराते हुए रमन को गले लगा लिया। उसने उसके कानों में फुसफुसाया, “जब तक इस जिस्म में आख़िरी सांस चलेगी, मैं आपकी हर पुकार पर दौड़ी चली आऊँगी। अजी सुनिए, मैं सिर्फ आपकी हूँ और हमेशा आपकी ही रहूँगी।”

उस रात, मोमबत्ती की मद्धम रोशनी और बारिश के संगीत के बीच, दो रूहों ने एक बार फिर अपने प्यार का नया सवेरा देखा था।


Discover more from StoryDunia

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Scroll to Top

Discover more from StoryDunia

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading