
प्रस्तावना: मोक्ष की खोज
पंडित आलोकनाथ अपने गाँव के सबसे प्रतिष्ठित और कर्मकांडी ब्राह्मण थे। उनका पूरा जीवन शास्त्रों के अध्ययन, पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों में बीता था। अब जबकि उनका शरीर शिथिल होने लगा था और बुढ़ापा उन पर हावी हो रहा था, उनके मन में केवल एक ही अभिलाषा बची थी—’मोक्ष’। वे चाहते थे कि मृत्यु के बाद उनकी आत्मा सीधे बैकुंठ धाम जाए और उन्हें इस संसार के आवागमन के चक्र से मुक्ति मिल जाए।
पंडित आलोकनाथ और उनकी साधना
मोक्ष प्राप्त करने के लिए आलोकनाथ ने अत्यंत कठोर नियम बना रखे थे। वे भोर में तीन बजे उठकर गंगा स्नान करते, घंटों जप करते और केवल फलाहार पर जीवन व्यतीत करते थे। उन्होंने अपनी जिंदगी भर की गाढ़ी कमाई एक विशेष लाल पोटली में सहेज कर रखी थी, जिससे वे काशी जाकर अपने अंतिम दिनों में दान-पुण्य और गोदान कर सकें। उनका दृढ़ विश्वास था कि इन बाह्य कर्मकांडों और दान-दक्षिणा के बिना मोक्ष की प्राप्ति असंभव है। वे अक्सर गाँव के लोगों को उपदेश दिया करते थे कि संन्यास और वैराग्य ही स्वर्ग का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
परीक्षा की घड़ी: मंगरू का संकट
गाँव के छोर पर मंगरू नाम का एक गरीब और तथाकथित अछूत रहता था। वह अत्यंत निर्धन था और दिन भर मेहनत-मजदूरी करके अपने परिवार का पेट पालता था। कुछ दिनों से मंगरू गंभीर रूप से बीमार था। भूख और बीमारी ने उसके शरीर को जर्जर कर दिया था। उसकी झोपड़ी से अक्सर खांसने और कराहने की आवाजें आती थीं, लेकिन गाँव का कोई भी समृद्ध व्यक्ति उसकी मदद के लिए आगे नहीं आता था। लोग उसे उसकी नियति और कर्मों का फल मानकर अनदेखा कर देते थे।
एक रात, जब चारों ओर घना अंधेरा और सन्नाटा पसरा हुआ था, बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी। पंडित आलोकनाथ अपने गर्म और सुरक्षित कमरे में बैठकर मोक्षदायिनी कथाओं का पाठ कर रहे थे। अचानक उनके दरवाजे पर किसी ने तेजी से दस्तक दी। आलोकनाथ ने थोड़ा चिढ़ते हुए उठकर दरवाजा खोला, तो सामने मंगरू की छोटी बेटी खड़ी थी। वह ठंड और डर से कांप रही थी और उसकी आंखों से आंसुओं की धार बह रही थी।
उसने रोते हुए हाथ जोड़कर कहा, “पंडित जी! मेरे बाबा की सांसें उखड़ रही हैं। वे तड़प रहे हैं। वैद्य जी ने कहा है कि अगर आज रात उन्हें दवा और गर्म दूध न मिला, तो वे सुबह का सूरज नहीं देख पाएंगे। कृपया मेरी मदद कीजिए, मुझे थोड़े पैसे उधार दे दीजिए। भगवान आपका भला करेगा।”
पंडित जी असमंजस में पड़ गए। उनके मन में पहला विचार आया कि इस लड़की को छूने से उनका धर्म भ्रष्ट हो जाएगा और उनकी पवित्रता नष्ट हो जाएगी। दूसरा विचार उस पोटली का आया, जिसे उन्होंने अपने मोक्ष और काशी-यात्रा के लिए बचाकर रखा था। उन्होंने कठोर आवाज में कहा, “बेटी, इस समय मेरे पास फालतू पैसे नहीं हैं। और वैसे भी, मैं पूजा में बैठा हूँ। तुम कल सुबह आना।”
अंतरात्मा की आवाज और सत्य का बोध
लड़की रोती-बिलखती वापस लौट गई। पंडित जी ने दरवाजा बंद कर लिया और दोबारा भगवान की मूर्ति के सामने बैठ गए। लेकिन इस बार उनका मन पूजा में बिल्कुल नहीं लगा। उनके कानों में उस अबोध बच्ची की सिसकियाँ और मंगरू के कराहने की हृदयविदारक आवाज गूंज रही थी। उन्होंने जैसे ही ध्यान लगाने के लिए आंखें बंद कीं, उन्हें भगवान की भव्य मूर्ति के स्थान पर भूखा-प्यासा, तड़पता हुआ मंगरू दिखाई देने लगा।
अचानक आलोकनाथ के भीतर एक तीव्र वैचारिक द्वंद्व छिड़ गया। हमारे वेद और शास्त्र तो कहते हैं कि हर जीव में ईश्वर का वास होता है। यदि वे अपने द्वार पर आए एक तड़पते हुए इंसान की मदद नहीं कर सकते, तो गंगा स्नान और शुष्क दान-पुण्य से उन्हें मोक्ष कैसे मिल सकता है? क्या केवल कर्मकांड ही मोक्ष का मार्ग हैं, या संकट में पड़े जीव की सेवा ही वास्तविक धर्म है? उन्हें आभास हुआ कि उनकी मोक्ष की इच्छा वास्तव में एक आध्यात्मिक स्वार्थ थी।
उनकी अंतरात्मा ने उन्हें धिक्कारा। उन्हें समझ आ गया कि जिस मोक्ष को वे काशी की गलियों और स्वर्ण मुद्राओं में ढूंढ रहे थे, वह तो उनके पड़ोस में तड़पते हुए एक असहाय व्यक्ति की सेवा में छिपा था।
बिना एक पल गंवाए, पंडित आलोकनाथ ने अपनी वह लाल पोटली उठाई जिसे उन्होंने जीवन भर संजोकर रखा था। वे छाता तानकर तेज बारिश में मंगरू की झोपड़ी की तरफ दौड़ पड़े। वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा कि मंगरू बेसुध पड़ा था और उसकी बेटी सिरहाने बैठी सिसक रही थी। पंडित जी ने अपनी जाति, प्रतिष्ठा और छुआछूत के सारे सामाजिक पाखंड को पीछे छोड़ दिया। उन्होंने मंगरू को अपने हाथों से उठाया, उसके मुंह में पानी डाला और अपनी जमा-पूंजी से तुरंत गाँव के बड़े वैद्य को बुलाने का प्रबंध किया।
सच्चा मोक्ष क्या है?
पूरी रात पंडित आलोकनाथ उस गरीब बीमार के सिरहाने बैठे रहे, उसे समय पर दवाइयाँ देते रहे और अपने हाथों से पंखा झलते रहे। सुबह होते-होते मंगरू की हालत में उल्लेखनीय सुधार होने लगा। उसने जब आँखें खोलीं, तो गाँव के सबसे बड़े पंडित जी को अपने सामने पाकर उसकी आँखों में कृतज्ञता के आँसू आ गए। उसने लड़खड़ाती आवाज़ में कहा, “पंडित जी, आप तो साक्षात भगवान बनकर आ गए।”
उस क्षण पंडित आलोकनाथ के हृदय में जो असीम शांति, आनंद और संतोष का संचार हुआ, वैसा उन्हें जीवन भर के जप-तप, व्रत और अनुष्ठानों से भी कभी महसूस नहीं हुआ था। उनकी आँखों से भी अश्रुधारा बह निकली। उन्हें वास्तविक ‘मोक्ष’ का अनुभव हो चुका था—वह मोक्ष जो किसी कर्मकांड या परलोक की कल्पना में नहीं, बल्कि इसी धरती पर एक तड़पते हुए जीवन को बचाने और निस्वार्थ भाव से की गई सेवा में निहित है।
पंडित जी समझ गए कि सच्ची मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है, और परोपकार ही मोक्ष का एकमात्र सच्चा द्वार है।
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