
सभ्यता क्या है? क्या यह अच्छे कपड़े पहनना, बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूमना और समाज में ऊंचा स्थान रखना है, या फिर इसका संबंध हमारे चरित्र और आंतरिक विचारों से है? महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद ने अपनी इस बेहतरीन कहानी में सभ्यता के इसी अनसुलझे रहस्य पर से पर्दा उठाया है। यह कहानी हमें समाज के उस दोहरे चरित्र से रूबरू कराती है, जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं।
सभ्यता की बाहरी चमक और आंतरिक खोखलापन
आमतौर पर हम जिसे ‘सभ्य’ कहते हैं, वह अक्सर केवल एक मुखौटा होता है। समाज में रहने वाले बड़े-बड़े अधिकारी, वकील और रईस लोग खुद को सभ्य घोषित करते हैं। उनके पास बैठने के लिए मखमली सोफे होते हैं, बात करने का एक सलीका होता है और वे कानून की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। लेकिन क्या वास्तव में वे सभ्य हैं?
कहानी के मुख्य पात्र राय साहब एक ऊंचे सरकारी पद पर आसीन हैं। वे समाज में बेहद सम्मानित हैं। उनका रहन-सहन, उनके विचार और उनका रहन-सहन सब कुछ ‘सभ्यता’ की परिभाषा में बिल्कुल फिट बैठता है। वे रोज सुबह उठकर देश-विदेश की समस्याओं पर चर्चा करते हैं, गरीबों के प्रति सहानुभूति जताते हैं और ईमानदारी पर लंबे-चौड़े भाषण देते हैं। लेकिन इस चमकदार सभ्यता के पीछे एक काला सच छिपा है, जिसे साधारण लोग नहीं देख पाते।
डमरी: एक गरीब और ‘असभ्य’ मजदूर
दूसरी तरफ डमरी नाम का एक सीधा-साधा, अनपढ़ मजदूर है। वह दिन-रात राय साहब के घर पर मेहनत करता है। उसे सभ्यता के नियमों का ज्ञान नहीं है। वह मैले-कुचैले कपड़े पहनता है, टूटी-फूटी भाषा बोलता है और दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करता है। समाज की नजर में वह ‘असभ्य’ और पिछड़ा हुआ है।
डमरी के पास दो बैल हैं, जो उसके जीवन का एकमात्र सहारा हैं। एक दिन काम से लौटते समय डमरी देखता है कि उसके बैलों के लिए चारा नहीं है। पैसे न होने के कारण वह लाचार महसूस करता है। अपने भूखे बैलों की तड़प उससे देखी नहीं जाती। अंततः, वह पास के एक खेत से चुपके से थोड़ा सा चारा काट लेता है। उसे लगता है कि इस छोटे से काम से किसी का भारी नुकसान नहीं होगा और उसके बेजुबान जानवरों का पेट भर जाएगा।
न्याय का दोहरा मापदंड
लेकिन डमरी की यह ‘चोरी’ पकड़ ली जाती है। समाज के ठेकेदार और कानून के रखवाले तुरंत सक्रिय हो जाते हैं। डमरी को एक अपराधी की तरह पेश किया जाता है। राय साहब, जो खुद को न्यायप्रिय और सभ्य मानते हैं, डमरी की इस हरकत पर बेहद क्रोधित होते हैं। वे उसे नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं और पुलिस के हवाले करने की धमकी देते हैं।
यहाँ प्रेमचंद जी सभ्यता के असली रहस्य को उजागर करते हैं। राय साहब खुद हर दिन हजारों रुपये की रिश्वत लेते हैं। वे सरकारी फाइलों में हेरफेर करते हैं, ठेकेदारों से गुप्त समझौते करते हैं और समाज की आंखों में धूल झोंककर धन इकट्ठा करते हैं। लेकिन उनकी इस बड़ी चोरी को ‘सभ्यता की चादर’ ढक लेती है। वे अपनी चतुर बातों और ऊंचे पद के दम पर कभी पकड़े नहीं जाते।
दूसरी ओर, डमरी जिसने केवल अपने जानवरों की जान बचाने के लिए चंद पैसों के चारे की चोरी की थी, उसे समाज का सबसे बड़ा पापी और असभ्य घोषित कर दिया जाता है। उसके पास अपनी रक्षा के लिए न तो पैसे हैं और न ही कोई रसूख।
सभ्यता का असली रहस्य
इस कहानी के माध्यम से प्रेमचंद यह स्पष्ट करते हैं कि आधुनिक समाज में ‘सभ्यता’ केवल अपने पापों को छिपाने की एक कला बन कर रह गई है। जो व्यक्ति जितनी चतुराई से अपनी बेईमानी और मक्कारी को छिपा सकता है, वह उतना ही अधिक ‘सभ्य’ माना जाता है। वहीं दूसरी ओर, एक गरीब इंसान जो अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए छोटी सी गलती भी करता है, उसे कानून और समाज का कठोरतम दंड भुगतना पड़ता है।
सभ्यता का असली रहस्य यही है कि यह अमीरों के लिए एक ढाल है और गरीबों के लिए एक तलवार। हमें जरूरत है एक ऐसी सभ्यता की जो बाहरी दिखावे से नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं, ईमानदारी और न्यायप्रियता से परिभाषित हो।
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