विमाता: मुंशी प्रेमचंद की मर्मस्पर्शी कहानी | Vimata

Vimata

हिंदी साहित्य के अमर कथाकार और उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं में मानव जीवन के उन पहलुओं को छुआ है, जो सीधे पाठकों के दिलों में उतर जाते हैं। उनकी कहानियों में सामाजिक कुरीतियों, पारिवारिक कलह और मानवीय संवेदनाओं का अत्यंत सजीव चित्रण मिलता है। ऐसी ही एक संवेदनशील और मर्मस्पर्शी कहानी है ‘विमाता’ (Vimata)। यह कहानी सौतेली माँ और बच्चे के बीच के जटिल संबंधों, सामाजिक पूर्वाग्रहों और अंततः निस्वार्थ प्रेम की विजय को दर्शाती है।

समाज का दृष्टिकोण और विमाता का प्रवेश

कहानी की शुरुआत देवनाथ के सुखी परिवार से होती है। देवनाथ का एक छोटा बेटा था—कुंदन। कुंदन की सगी माँ के देहांत के बाद घर सूना हो गया था। सात साल के मासूम कुंदन की देखरेख और घर की गृहस्थी को संभालने के लिए देवनाथ ने दूसरा विवाह करने का निर्णय लिया। समाज में सौतेली माँ यानी ‘विमाता’ को लेकर कई नकारात्मक धारणाएं व्याप्त थीं। जैसे ही नई दुल्हन यशोदा ने घर में कदम रखा, आस-पड़ोस के लोगों ने कानाफूसी शुरू कर दी।

पड़ोसियों और रिश्तेदारों ने कुंदन के कान भरने शुरू कर दिए, “बेटा, अब तुम्हारी नई माँ आ गई है। अब तुम्हें वह प्यार नहीं मिलेगा। वह तुम्हें सताएगी और अपने बच्चों को प्यार करेगी।” इन बातों ने मासूम कुंदन के कोमल मन पर गहरा आघात किया। वह यशोदा को देखते ही भय और संकोच से भर जाता था।

कुंदन के मन का द्वंद्व और यशोदा का मौन संघर्ष

यशोदा एक सुशील, समझदार और ममतामयी स्त्री थी। वह कुंदन को अपनी सगी संतान की तरह ही स्नेह देना चाहती थी। वह उसके लिए स्वादिष्ट भोजन बनाती, उसके कपड़े साफ रखती और उसे समय पर सुलाने की कोशिश करती। लेकिन कुंदन के मन में बैठी ‘सौतेली माँ’ की डरावनी छवि उसे यशोदा के करीब नहीं आने देती थी। जब भी यशोदा उसे प्यार से बुलाती, कुंदन डरकर दूर भाग जाता या रोने लगता।

यशोदा कुंदन के इस बर्ताव से अत्यंत दुखी होती थी। वह समझ नहीं पा रही थी कि बिना किसी गलती के भी वह कुंदन के दिल में जगह क्यों नहीं बना पा रही है। समाज की पैनी निगाहें हमेशा यशोदा के हर कदम पर संदेह करती थीं। यदि वह कुंदन को थोड़ा डांट देती, तो लोग कहते, “आखिर सौतेली माँ ही तो है, दिल कैसे पसीजेगा!” और यदि वह अत्यधिक लाड़-प्यार दिखाती, तो लोग इसे “दिखावा” करार देते थे। इस दोहरे मापदंड के बीच यशोदा का जीवन अत्यंत कठिन हो गया था।

परीक्षा की वह कठिन घड़ी

वक्त बीतता गया और कुछ समय बाद यशोदा ने एक पुत्र को जन्म दिया। अब कुंदन का डर और बढ़ गया। उसे लगा कि अब तो उसका इस घर में कोई अस्तित्व ही नहीं रहेगा। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।

एक बार गाँव में भयंकर हैजा और तेज बुखार फैला। इसकी चपेट में छोटा कुंदन भी आ गया। कुंदन की हालत दिन-प्रतिदिन बिगड़ती चली गई। वह तेज बुखार में तड़प रहा था और बेहोशी की हालत में अपनी मृत माँ को पुकारता था। देवनाथ पूरी तरह टूट चुके थे और उन्हें बेटे के बचने की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही थी।

ऐसे नाजुक समय में यशोदा ने अपनी ममता की असली परीक्षा दी। उसने अपने नवजात शिशु को अपनी जेठानी की देखरेख में छोड़ दिया और दिन-रात कुंदन की तीमारदारी में जुट गई। वह बिना सोए, बिना खाए-पिए चौबीसों घंटे कुंदन के सिरहाने बैठी रहती। वह ठंडे पानी की पट्टियां बदलती, दवाइयां समय पर देती और ईश्वर से कुंदन के प्राणों की भीख मांगती।

यशोदा का अपना सगा बेटा रोता रहता, लेकिन वह कुंदन को छोड़कर एक पल के लिए भी कहीं नहीं जाती थी। उसके मन में केवल एक ही धुन सवार थी कि किसी भी तरह कुंदन ठीक हो जाए। यदि कुंदन को कुछ हो गया, तो समाज कभी एक विमाता को माफ नहीं करेगा और न ही वह खुद को माफ कर पाएगी।

मातृत्व की शाश्वत विजय

यशोदा की निस्वार्थ सेवा और कठिन तपस्या रंग लाई। कई दिनों के बाद कुंदन का बुखार उतरा और जब उसने अपनी आँखें खोलीं, तो उसने देखा कि यशोदा का चेहरा अत्यंत पीला पड़ चुका था और उसकी आँखों के नीचे काले घेरे बन गए थे। वह पूरी तरह थक चुकी थी, लेकिन कुंदन को होश में देखकर उसकी आँखों से खुशी के आंसू बह निकले।

यशोदा ने व्याकुल होकर कुंदन को गले से लगा लिया। उस स्पर्श में कोई दिखावा नहीं था, केवल और केवल एक माँ का असीम और शुद्ध वात्सल्य था। कुंदन ने उस दिन अपनी ‘विमाता’ की आँखों में अपनी सगी माँ का अक्स देखा। उसके मन के सारे डर, संशय और नफरत बर्फ की तरह पिघल गए। उसने यशोदा का हाथ कसकर पकड़ लिया और बुदबुदाया, “माँ!”

प्रेमचंद की यह कहानी हमें सिखाती है कि रिश्ते केवल खून के नहीं होते, बल्कि भावना, समर्पण और निस्वार्थ प्रेम के होते हैं। ‘विमाता’ शब्द केवल एक सामाजिक ठप्पा है; यदि हृदय में सच्ची ममता हो, तो हर सौतेली माँ यशोदा बन सकती है।

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