Baba Ji Ka Bhog – मुंशी प्रेमचंद

Baba Ji Ka Bhog

मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ भारतीय ग्रामीण समाज, उसकी सादगी, और उसमें व्याप्त कुप्रथाओं का एक जीवंत आईना हैं। उनकी कहानियों में न केवल तत्कालीन समाज का यथार्थ दिखता है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और अंधविश्वासों पर भी गहरा प्रहार होता है। ‘बाबा जी का भोग’ (Baba Ji Ka Bhog) भी एक ऐसी ही मर्मस्पर्शी और व्यंग्यात्मक कहानी है, जो धार्मिक पाखंड, अंधश्रद्धा और एक गरीब किसान के सीधेपन की कहानी बयां करती है।

आइए इस कालजयी कहानी के माध्यम से समझें कि कैसे धर्म के नाम पर सीधे-साधे ग्रामीणों का शोषण किया जाता रहा है।

बाबा जी का आगमन और उनकी भारी मांग

कहानी की शुरुआत होती है एक छोटे से गांव से, जहाँ रामधन नाम का एक अत्यंत सीधा-साधा और गरीब किसान अपनी पत्नी श्यामा के साथ रहता था। वे दोनों दिन-रात मेहनत करके जैसे-तैसे अपना पेट पालते थे। उनके पास न तो बहुत जमीन थी और न ही धन-दौलत, लेकिन उनके मन में संतों और अतिथियों के प्रति अपार श्रद्धा थी।

एक दोपहर जब धूप बहुत तेज थी, रामधन के दरवाजे पर एक हट्टे-कट्टे, गेरुआ वस्त्र पहने बाबा जी आकर रुके। बाबा जी के चेहरे पर तेज तो कम, लेकिन अहंकार और भूख का प्रभाव अधिक दिख रहा था। उन्होंने आते ही ऊंचे स्वर में शंख बजाया और चिल्लाए, “अलख निरंजन! माई, बाबा को भूख लगी है, सुंदर सा भोग तैयार करो।”

रामधन और श्यामा हाथ जोड़कर बाहर आए। उन्होंने बाबा जी को सादर प्रणाम किया। रामधन ने अत्यंत संकोच के साथ कहा, “महाराज, हम बहुत गरीब हैं। हमारे घर में अभी केवल बाजरे की सूखी रोटियां और थोड़ा सा मट्ठा ही उपलब्ध है। यदि आप स्वीकार करें, तो हम वही परोस दें।”

यह सुनते ही बाबा जी की भौहें तन गईं। वे क्रोधित स्वर में बोले, “अरे मूर्ख! तुम साधुओं को बाजरे की सूखी रोटी खिलाकर नरक के भागी बनना चाहते हो? हमें तो शुद्ध गेहूं के आटे की पूरियां, कड़ाही का हलवा और गाय का शुद्ध घी चाहिए। यदि तुम अपनी भलाई चाहते हो, तो तुरंत हमारे लिए उत्तम भोग की व्यवस्था करो, अन्यथा हमारा श्राप तुम्हारे पूरे कुल को नष्ट कर देगा!”

लाचारी और अंधविश्वास का द्वंद्व

बाबा जी के श्राप की बात सुनकर रामधन और श्यामा बुरी तरह डर गए। ग्रामीण समाज में यह डर बहुत गहरा होता था कि किसी साधु का श्राप उनके जीवन को बर्बाद कर सकता है। श्यामा ने घबराकर रामधन से कहा, “जी, चाहे जो हो जाए, बाबा जी को नाराज मत करो। गाँव के बनिए से जाकर थोड़ा आटा, घी और चीनी उधार मांग लाओ। हम भूखे सो जाएंगे, लेकिन बाबा को भूखा नहीं भेजेंगे।”

रामधन तुरंत लाठी उठाकर गांव के महाजन लाला हुकुमचंद की दुकान की ओर दौड़ा। लाला पहले से ही रामधन के पुराने कर्ज को लेकर नाराज था। उसने सीधे-सीधे उधार देने से मना कर दिया। रामधन ने उसके पैर पकड़ लिए और गिड़गिड़ाते हुए कहा, “लाला जी, द्वार पर महात्मा आए हैं। अगर वे भूखे लौट गए तो मेरा अनिष्ट हो जाएगा। मेरी फसल आते ही मैं पाई-पाई चुका दूंगा।”

लाला ने इस लाचारी का फायदा उठाया और बहुत ऊंचे ब्याज पर तथा रामधन के बचे हुए पीतल के बर्तनों को गिरवी रखकर थोड़ा सा गेहूं का आटा, घी और शक्कर दे दी। रामधन भारी मन से, लेकिन राहत की सांस लेते हुए घर लौटा।

भोग की तैयारी और बाबा की तृप्ति

घर पहुँचते ही श्यामा ने जल्दी-जल्दी चूल्हा सुलगाया। उसने अपनी पूरी कुशलता से गरम-गरम पूरियाँ छानीं और सूजी का हलवा तैयार किया। शुद्ध घी की खुशबू से पूरा घर महक उठा। रामधन और श्यामा ने खुद सुबह से कुछ नहीं खाया था, लेकिन वे खुश थे कि बाबा जी प्रसन्न हो जाएंगे।

थाली सजकर बाबा जी के सामने आई। बाबा जी ने घी से तर-बतर पूरियों और हलवे को देखा तो उनकी आँखों में चमक आ गई। उन्होंने बिना समय गंवाए भोजन करना शुरू कर दिया। वे एक के बाद एक पूरियाँ निगलते गए। रामधन और श्यामा हाथ जोड़कर खड़े रहे, इस उम्मीद में कि बाबा अब तृप्त होंगे।

बाबा जी ने भरपेट भोजन किया, यहाँ तक कि डकारें लेने लगे। भोजन समाप्त करने के बाद उन्होंने बचा हुआ भोजन भी अपने झोले में बांध लिया ताकि शाम को भी उन्हें मेहनत न करनी पड़े। उन्होंने रामधन और श्यामा को आशीर्वाद दिया, “कल्याण हो बच्चा! तुम्हारा भंडार हमेशा भरा रहे।” और वे वहां से चल दिए।

कहानी का कटु सत्य और सीख

बाबा जी के जाने के बाद, रामधन और श्यामा रसोई में गए। वहाँ केवल खाली बर्तन और राख बची थी। जो आटा और घी रामधन भारी कर्ज लेकर आया था, वह सब समाप्त हो चुका था। उनके खुद के खाने के लिए एक दाना भी नहीं बचा था। उन्हें रात में भूखे पेट ही सोना पड़ा, और ऊपर से सिर पर कर्ज का भारी बोझ अलग से आ गया।

मुंशी प्रेमचंद ने इस कहानी के माध्यम से धर्म के नाम पर होने वाले पाखंड पर करारा प्रहार किया है। जहाँ एक तरफ बाबा जी जैसे ढोंगी साधु धर्म का भय दिखाकर गरीबों का शोषण करते हैं, वहीं दूसरी तरफ रामधन जैसे भोले-भाले ग्रामीण अपनी अज्ञानता और अंधविश्वास के कारण खुद को कर्ज के दलदल में धकेल देते हैं। यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची मानवता और विवेक ही सबसे बड़ा धर्म है, और किसी भी प्रकार के अंधविश्वास में आकर अपनी बुनियादी जरूरतों को दांव पर लगाना बुद्धिमानी नहीं है।

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