
बचपन की वह सुनहरी यादें
बचपन की यादें हमेशा दिल के करीब होती हैं, और जब बात मुंशी प्रेमचंद की कहानियों की हो, तो वे यादें जीवंत हो उठती हैं। ‘गुल्ली डंडा’ प्रेमचंद की उन चुनिंदा कहानियों में से एक है, जो न केवल हमारे बचपन के खेलों की याद दिलाती है, बल्कि समाज के गहरे सच से भी रूबरू कराती है। लेखक इस कहानी की शुरुआत गुल्ली डंडे को ‘सब खेलों का राजा’ बताकर करते हैं। उनके अनुसार, क्रिकेट, फुटबॉल या टेनिस जैसे महंगे खेलों की तुलना में गुल्ली डंडा कहीं अधिक सरल और सुलभ है। इसके लिए न किसी महंगे किट की जरूरत है, न किसी क्लब की सदस्यता की—बस एक पेड़ की टहनी काटो और खेल शुरू।
गया: वह बचपन का खिलाड़ी
कहानी का मुख्य पात्र ‘गया’ है, जो गुल्ली डंडे का बेताज बादशाह था। लेखक (कथावाचक) और गया बचपन में साथ खेला करते थे। गया एक गरीब परिवार से था, लेकिन खेल के मैदान में वह सबका उस्ताद था। लेखक याद करते हैं कि कैसे एक बार खेलते समय उन्होंने बेईमानी की थी और गया ने उन्हें सुधारने के लिए उनके पीछे दौड़ लगाई थी। उस समय ऊंच-नीच या जात-पात का कोई बंधन नहीं था। खेल के मैदान में केवल खिलाड़ी होते थे, उनकी सामाजिक स्थिति मायने नहीं रखती थी।
वक्त का पहिया और वापसी
समय बीतता गया और लेखक पढ़ाई करने शहर चले गए। कई सालों बाद, जब वे एक इंजीनियर बनकर अपने उसी पुराने गांव लौटे, तो उनके मन में बचपन की वही स्मृतियां ताज़ा हो गईं। उन्हें सबसे पहले गया की याद आई। वे यह जानना चाहते थे कि उनका वह पुराना दोस्त अब कैसा है। जब वे गया से मिले, तो उन्होंने देखा कि वक्त ने सब कुछ बदल दिया है। गया अब एक साधारण मजदूर की तरह जीवन व्यतीत कर रहा था। उसके चेहरे पर वह पुरानी चमक और आंखों में वह शरारत नहीं थी।
एक खेल, जो फिर कभी पहले जैसा न रहा
लेखक के मन में फिर से गुल्ली डंडा खेलने की इच्छा जागी। उन्होंने गया को खेलने के लिए आमंत्रित किया। गया पहले तो हिचकिचाया, लेकिन फिर मान गया। दोनों मैदान में गए। लेखक ने पुरानी यादों के साथ खेलना शुरू किया। उन्होंने फिर से वही बेईमानी की जो वे बचपन में करते थे, लेकिन इस बार गया ने उन्हें टोका नहीं। वह चुपचाप हारता रहा और लेखक को जीतने का मौका देता रहा।
लेखक को जल्द ही इस बात का अहसास हो गया कि गया अब उनके साथ एक दोस्त की तरह नहीं, बल्कि एक ‘अफसर’ के साथ खेल रहा है। गया का वह सम्मान, वह चुप्पी और जानबूझकर हार जाना लेखक को कचोटने लगा। उन्हें समझ आ गया कि बचपन की वह बराबरी अब खत्म हो चुकी है। अब उनके बीच ‘इंजीनियर साहब’ और एक ‘मजदूर’ की दीवार खड़ी हो गई थी।
सामाजिक ऊंच-नीच का कड़वा सच
प्रेमचंद ने इस कहानी के माध्यम से यह दिखाया है कि कैसे उम्र और पद के बढ़ने के साथ इंसान की सहजता खो जाती है। गया का वह हुनर, जो बचपन में लेखक को डरा देता था, अब लेखक के पद के सामने झुक गया था। लेखक को महसूस हुआ कि उन्होंने एक बेहतरीन दोस्त खो दिया है और उसकी जगह एक ऐसा व्यक्ति ले चुका है जो अब केवल शिष्टाचार निभा रहा है। गुल्ली डंडा अब सिर्फ एक खेल नहीं रह गया था, बल्कि सामाजिक असमानता का प्रतीक बन गया था।
यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची मित्रता केवल समानता के धरातल पर ही पनप सकती है। जहां पद, प्रतिष्ठा और धन आ जाता है, वहां बचपन की वह मासूमियत और बेबाकी दम तोड़ देती है।
Recommended Reads
- Munshi Premchand Stories – प्रेमचंद की अन्य प्रेरक कहानियाँ यहाँ पढ़ें।
- Moral Story – बच्चों के लिए शिक्षाप्रद कहानियों का संग्रह।
- Panchtantra Tales – विष्णु शर्मा द्वारा रचित पंचतंत्र की प्राचीन कथाएँ।
- Romantic Story – दिल को छू लेने वाली प्रेम कहानियाँ।
Discover more from StoryDunia
Subscribe to get the latest posts sent to your email.









