Vishwas
मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘विश्वास’ (Vishwas) पढ़ें। यह कहानी पति-पत्नी के बीच विज्ञान, तर्क और अटूट श्रद्धा के सुंदर द्वंद्व को जीवंत करती है।

मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ समाज का दर्पण होती हैं, जो मानवीय संवेदनाओं, रिश्तों के ताने-बाने और मन के भीतर चलने वाले द्वंद्वों को बड़ी ही सादगी से उकेरती हैं। उनकी प्रसिद्ध कहानी ‘विश्वास’ भी एक ऐसा ही उत्कृष्ट उदाहरण है, जो पाठकों को यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि क्या जीवन केवल तर्क और विज्ञान से चलता है, या इसमें ‘विश्वास’ और ‘श्रद्धा’ की भी कोई अहम भूमिका है।

आधुनिकता और तर्क का अहंकार

कहानी के मुख्य पात्र हैं डॉ. रसिकलाल, जो एक कुशल चिकित्सक हैं। रसिकलाल आधुनिक शिक्षा और विज्ञान के प्रबल समर्थक हैं। उनके लिए जीवन की हर घटना के पीछे एक वैज्ञानिक तर्क होना अनिवार्य है। वह धर्म, पूजा-पाठ और ईश्वरीय सत्ता जैसी बातों को केवल मन का भ्रम और अंधविश्वास मानते हैं। उनके विपरीत उनकी पत्नी, माया, एक अत्यंत धार्मिक और सरल हृदय वाली महिला है। माया का मानना है कि दुनिया में ऐसी कई शक्तियाँ हैं जिन्हें विज्ञान नहीं समझा सकता, और उन शक्तियों का आधार केवल ‘विश्वास’ है।

डॉ. रसिकलाल अक्सर अपनी पत्नी की आस्था का मजाक उड़ाते थे। जब भी माया किसी मंदिर जाने या उपवास रखने की बात करती, रसिकलाल हँसते हुए कहते, “माया, ये सब मन को बहलाने के तरीके हैं। इंसान अपनी मेहनत और बुद्धि से अपना भाग्य खुद लिखता है, किसी अदृश्य शक्ति के भरोसे बैठना कमजोरी की निशानी है।”

जब विज्ञान की सीमाएँ समाप्त हुईं

जीवन हमेशा एक जैसा नहीं रहता। एक समय ऐसा आया जब डॉ. रसिकलाल का अपना इकलौता पुत्र गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। डॉक्टर होने के नाते, रसिकलाल ने अपनी सारी जमा-पूंजी और सारा ज्ञान अपने बेटे को बचाने में झोंक दिया। उन्होंने बड़े-बड़े विशेषज्ञों को बुलाया, महँगी दवाइयाँ दीं, लेकिन बच्चे की हालत बिगड़ती ही जा रही थी।

एक रात ऐसी आई जब डॉक्टरों ने भी हाथ खड़े कर दिए। रसिकलाल के पैरों तले जमीन खिसक गई। वह आदमी जो कल तक कहता था कि ‘हर मर्ज का इलाज दवा है’, आज खुद को लाचार महसूस कर रहा था। उनका वैज्ञानिक तर्क उन्हें कोई सांत्वना नहीं दे पा रहा था। कमरे में सन्नाटा पसरा था, केवल बच्चे की उखड़ती साँसों की आवाज़ आ रही थी।

श्रद्धा और चमत्कार की शक्ति

उसी समय, माया ने हार नहीं मानी। वह रात भर दीया जलाकर अपने आराध्य के सामने बैठी रही। उसकी आँखों में आंसू थे, लेकिन मन में एक अटूट ‘विश्वास’ था। उसने मन ही मन संकल्प लिया और बच्चे के सिरहाने बैठकर प्रार्थना करने लगी। सुबह होते-होते, अचानक बच्चे के शरीर में कुछ हलचल हुई। उसका बुखार जो किसी दवा से नहीं उतर रहा था, धीरे-धीरे कम होने लगा।

जब रसिकलाल ने सुबह आकर बच्चे की नब्ज जाँची, तो वह दंग रह गए। मेडिकल साइंस के हिसाब से जहाँ उम्मीद खत्म हो चुकी थी, वहाँ जीवन वापस लौट रहा था। रसिकलाल की बुद्धि चकरा गई। वह समझ नहीं पा रहे थे कि यह दवाओं का असर था या उस माँ की प्रार्थना का, जिसे वह अब तक अंधविश्वास कहते आए थे।

Vishwas की जीत

इस घटना ने डॉ. रसिकलाल का अहंकार तोड़ दिया। उन्होंने महसूस किया कि बुद्धि और तर्क की अपनी एक सीमा है, जिसके आगे एक अनजानी शक्ति का क्षेत्र शुरू होता है। वह शक्ति ‘विश्वास’ की है। विश्वास ही वह सेतु है जो मनुष्य को निराशा के अंधकार से आशा के प्रकाश की ओर ले जाता है। प्रेमचंद ने इस कहानी के माध्यम से यह संदेश दिया है कि विज्ञान शरीर का इलाज कर सकता है, लेकिन आत्मा को सांत्वना और जीवन को नई दिशा केवल विश्वास ही दे सकता है।

प्रेमचंद की यह कहानी आज के दौर में भी उतनी ही प्रासंगिक है, जहाँ हम तकनीक और तर्क की दौड़ में अपने भीतर की सहज आस्था को कहीं पीछे छोड़ते जा रहे हैं। ‘विश्वास’ हमें याद दिलाता है कि जीवन केवल दृश्यों का नाम नहीं, बल्कि उन अदृश्य भावनाओं का भी नाम है जो हमें इंसान बनाती हैं।

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