
मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ केवल मनोरंजन का साधन नहीं होतीं, बल्कि वे समाज का आईना और मानवीय संवेदनाओं का गहरा विश्लेषण होती हैं। उनकी ऐसी ही एक कालजयी रचना है— ‘Pariksha’। यह कहानी बताती है कि किसी व्यक्ति की असली योग्यता उसके डिग्री या ज्ञान से नहीं, बल्कि उसके चरित्र और दयालु हृदय से मापी जाती है।
देवगढ़ रियासत और दीवान की खोज
देवगढ़ रियासत के दीवान सरदार सुजान सिंह अब वृद्ध हो चले थे। उन्होंने अपनी पूरी उम्र राज्य की सेवा में समर्पित कर दी थी, लेकिन अब उनका शरीर थकने लगा था। उन्होंने महाराज से विनती की कि उन्हें पदमुक्त कर दिया जाए। महाराज उन्हें छोड़ना नहीं चाहते थे, लेकिन सुजान सिंह की जिद के आगे उन्हें झुकना पड़ा। महाराज ने एक शर्त रखी कि सुजान सिंह को ही राज्य के लिए एक नया और योग्य दीवान ढूंढना होगा।
अगले ही दिन समाचार पत्रों में विज्ञापन निकला कि देवगढ़ के लिए एक नए दीवान की आवश्यकता है। शर्त यह थी कि उम्मीदवार ग्रेजुएट हो या न हो, लेकिन उसका चरित्र उज्ज्वल होना चाहिए और वह कर्तव्यनिष्ठ होना चाहिए। जो भी व्यक्ति इस पद के लिए चुना जाएगा, उसे एक महीने तक रियासत में रहकर अपनी योग्यता सिद्ध करनी होगी।
उम्मीदवारों का जमावड़ा और दिखावा
विज्ञापन का असर यह हुआ कि देश के कोने-कोने से लोग देवगढ़ पहुंचने लगे। कोई अपनी डिग्री दिखा रहा था, तो कोई अपने ऊंचे खानदान का गुणगान कर रहा था। वहां आए हुए उम्मीदवार जानते थे कि दीवान सुजान सिंह की पैनी नज़रें उन पर हैं। इसलिए हर कोई खुद को सबसे नेक और शरीफ दिखाने की कोशिश कर रहा था।
कोई सुबह जल्दी उठकर बनावटी इबादत करता, तो कोई दिन भर किताबों में डूबा रहता ताकि वह विद्वान दिखे। जो लोग घर पर नौकरों को झिड़कते थे, वे वहां विनम्रता की प्रतिमूर्ति बने हुए थे। लेकिन सरदार सुजान सिंह अनुभवी व्यक्ति थे, वे जानते थे कि बाहरी चमक-धमक के पीछे असली चेहरा छुपा होता है। वे बस उस घड़ी का इंतज़ार कर रहे थे जब इन लोगों का असली स्वभाव बाहर आए।
मानवता की कठिन Pariksha
एक महीने की अवधि समाप्त होने वाली थी। एक शाम, रियासत के पास के एक नाले में एक किसान की अनाज से भरी गाड़ी कीचड़ में फंस गई। किसान वृद्ध था और अकेला उस भारी गाड़ी को कीचड़ से बाहर निकालने में असमर्थ था। उसी रास्ते से कई उम्मीदवार गुज़र रहे थे, जिन्होंने शाम का खेल (हॉकी) खेला था और वापस अपने आवास की ओर लौट रहे थे।
अधिकतर उम्मीदवारों ने किसान की बेबसी देखी, लेकिन मदद करने के बजाय वे मुंह फेरकर निकल गए। किसी को अपने कपड़े गंदे होने का डर था, तो किसी को अपनी शान कम होने का। लेकिन तभी एक युवक वहां से गुजरा जिसका नाम पंडित जानकी नाथ था। यद्यपि वह खेल के दौरान घायल हो गया था और उसके पैर में चोट थी, लेकिन किसान की हालत देखकर उसका दिल पसीज गया।
निस्वार्थ सेवा और साहस (Pariksha)
पंडित जानकी नाथ ने अपने चोट की परवाह नहीं की। उसने अपना कोट उतारा और कीचड़ में उतर गया। उसने किसान से कहा, “आप बैल संभालिए, मैं पीछे से धक्का लगाता हूँ।” कीचड़ घुटनों तक था, लेकिन युवक ने पूरी ताकत लगा दी। अंततः कड़ी मशक्कत के बाद गाड़ी कीचड़ से बाहर निकल आई।
किसान ने युवक को गौर से देखा और उसे आशीर्वाद दिया। वह किसान कोई और नहीं, बल्कि स्वयं सरदार सुजान सिंह थे, जो वेश बदलकर उम्मीदवारों की परीक्षा ले रहे थे। उन्होंने उस युवक के भीतर छिपी दया, साहस और निस्वार्थ सेवा भाव को पहचान लिया था।
योग्यता का वास्तविक पैमाना और निर्णय
अगले दिन दरबार लगा। सभी उम्मीदवार इस उम्मीद में बैठे थे कि किस्मत किसकी चमकेगी। सरदार सुजान सिंह ने घोषणा की— “मुझे यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि देवगढ़ को नया दीवान मिल गया है। वह व्यक्ति पंडित जानकी नाथ हैं।”
दरबार में सन्नाटा छा गया। अन्य उम्मीदवार ईर्ष्या से देखने लगे। सुजान सिंह ने स्पष्ट किया कि दीवान पद के लिए केवल बुद्धि की नहीं, बल्कि एक विशाल हृदय की आवश्यकता होती है। जिसमें दया हो, जो गरीबों के दुख को समझ सके और जो खुद को जोखिम में डालकर दूसरों की मदद कर सके, वही राज्य का सच्चा सेवक हो सकता है। पंडित जानकी नाथ ने साबित कर दिया था कि वे न केवल शिक्षित हैं, बल्कि एक सच्चे इंसान भी हैं।
Pariksha – निष्कर्ष
प्रेमचंद की यह कहानी आज के समय में भी उतनी ही प्रासंगिक है। यह हमें सिखाती है कि पद और प्रतिष्ठा से बड़ा मनुष्य का आचरण होता है। सच्ची Pariksha संकट के समय ही होती है।
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