Kafan by Premchand
मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ‘कफन’ (Kafan) का संपूर्ण सारांश और भावपूर्ण चित्रण। घीसू और माधव की गरीबी और संवेदनहीनता की इस कहानी को यहाँ विस्तार से पढ़ें।

मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित ‘कफन’ केवल एक कहानी नहीं है, बल्कि यह समाज की उस नग्न सच्चाई का आईना है, जहाँ गरीबी मनुष्य की संवेदनाओं को सोख लेती है। यह कहानी प्रेमचंद की अंतिम महान रचनाओं में से एक मानी जाती है, जो ग्रामीण जीवन के यथार्थ और मनुष्य की बदलती प्रवृत्तियों का क्रूर चित्रण करती है।

झोपड़ी के बाहर की वो सर्द रात

जाड़े की एक अंधियारी रात थी। सारा गाँव गहरी नींद में सोया हुआ था, लेकिन एक झोपड़ी के बाहर घीसू और माधव, जो रिश्ते में बाप-बेटे थे, अलाव जलाकर आलू भून रहे थे। झोपड़ी के भीतर माधव की पत्नी, बुधिया, प्रसव वेदना से कराह रही थी। उसकी चीखें सर्द हवाओं को चीर रही थीं, लेकिन बाहर बैठे इन दोनों पुरुषों पर उसका कोई खास असर नहीं हो रहा था।

घीसू, जिसकी उम्र साठ के करीब थी, और उसका जवान बेटा माधव, दोनों ही अपनी आलस्य और निकम्मेपन के लिए पूरे गाँव में प्रसिद्ध थे। वे तब तक काम नहीं करते थे जब तक कि भूख से जान पर न बन आए। उनके लिए पत्नी की जान से ज्यादा जरूरी वो आधे भुने हुए आलू थे, जिन्हें वे एक-दूसरे से पहले हड़प लेना चाहते थे।

संवेदनहीनता की चरम सीमा

बुधिया अंदर तड़प-तड़प कर दम तोड़ रही थी, और माधव को डर था कि अगर वह अंदर उसे देखने गया, तो घीसू सारे आलू खा जाएगा। घीसू को डर था कि माधव आलू खत्म कर देगा। प्रेमचंद यहाँ मनुष्य की उस स्थिति का वर्णन करते हैं जहाँ भूख, रिश्तों की गरिमा और करुणा पर हावी हो जाती है। अंततः, सुबह होते-होते बुधिया की मौत हो गई। घर में न तो कफन के लिए पैसे थे और न ही अंतिम संस्कार का कोई इंतजाम।

कफन (Kafan) के नाम पर चंदा

बुधिया की मृत्यु के बाद घीसू और माधव गाँव के जमींदार के पास रोते हुए पहुँचे। जमींदार उन्हें नापसंद करता था, लेकिन एक गरीब स्त्री की मौत की बात सुनकर उसने पाँच रुपये दान स्वरूप दे दिए। इसके बाद गाँव के अन्य लोगों ने भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार पैसे दिए। कुछ ही घंटों में उनके पास पाँच-छह रुपये जमा हो गए—जो उस समय एक बड़ी राशि थी।

दोनों बाजार कफन खरीदने के लिए निकले। बाजार में घूमते-घूमते उनकी नजर एक कपड़े की दुकान से दूसरी दुकान पर जाती, लेकिन उनका मन कहीं और ही था। घीसू ने दबी आवाज में कहा, “कफन तो लाश के साथ जल ही जाता है, फिर नया कफन लेने का क्या फायदा?”

शराबखाना और अंतिम भोज

अंततः, वे दोनों एक शराबखाने के सामने जा रुके। जिस पैसे से बुधिया के लिए कफन आना था, उससे उन्होंने खूब शराब पी, तली हुई मछलियाँ खाईं और पूड़ियाँ लीं। जैसे-जैसे नशा बढ़ता गया, उनकी संवेदनहीनता तर्कों का रूप लेने लगी। वे कहने लगे कि बुधिया ने जीते जी उन्हें कभी पेट भर खाना नहीं दिया, लेकिन मरते-मरते उसने उन्हें यह दावत दे दी।

वे शराब के नशे में नाचने लगे और गाने लगे। उन्होंने शराबखाने के पास बैठे एक भिखारी को बची हुई पूड़ियाँ दान में दे दीं, मानो वे कोई बहुत बड़े परोपकारी हों। नशे की हालत में घीसू कहता है, “वह स्वर्ग जाएगी बेटा, उसने कभी किसी को सताया नहीं, वह तो हम जैसों की प्यास बुझाकर गई है।”

कहानी का सामाजिक संदेश

‘कफन’ कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या गरीबी इंसान को इतना पत्थर दिल बना सकती है? प्रेमचंद ने दिखाया है कि जब पेट की आग बुझाने का कोई रास्ता नहीं बचता, तो इंसान के नैतिक मूल्य और मर्यादाएँ धुंधली पड़ जाती हैं। यह कहानी व्यवस्था पर एक करारा प्रहार है जो एक इंसान को जीते जी सम्मान नहीं दे पाती, लेकिन उसके मरने पर दिखावे के ‘कफन’ के लिए चंदा इकट्ठा करवाती है।

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