
गुनगुनी धूप के साथ ही हवा में एक अनोखी हलचल महसूस होने लगी थी। मकर संक्रांति का त्योहार नजदीक आ रहा था। नीला आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से सजने के लिए बेताब था। इसी शहर के एक छोटे से मोहल्ले में रहने वाले आठ साल के रमन की आँखों में भी एक अलग ही चमक थी। रमन को पतंग उड़ाने का बेहद शौक था। हर साल वह अपने पिता के साथ बाजार जाता और ढेर सारी पतंगें खरीद लाता था। लेकिन इस साल रमन ने कुछ अलग करने की सोची। उसने अपने दादाजी से कहा, “दादाजी, इस बार मैं बाजार की बनी हुई पतंग नहीं उड़ाऊंगा। मैं अपनी खुद की बनाई पतंग उड़ाना चाहता हूँ।”
दादाजी की सीख और पतंग का निर्माण
दादाजी रमन की बात सुनकर बहुत खुश हुए। उन्होंने अलमारी से पुराना अखबार, बांस की पतली तीलियां, गोंद और रंगीन कागज निकाले। दादाजी ने रमन को अपने पास बिठाया और कहा, “बेटा, एक अच्छी पतंग बनाने के लिए केवल सुंदर कागज की जरूरत नहीं होती, बल्कि सही संतुलन की जरूरत होती है। जीवन में भी संतुलन उतना ही जरूरी है।”
दोनों ने मिलकर काम शुरू किया। रमन ने चमकीला लाल कागज चुना। दादाजी ने बहुत ही सावधानी से बांस की तीलियों को मोड़ा और उन्हें कागज पर चिपकाया। उन्होंने पतंग के निचले हिस्से में एक सुंदर सी पूंछ भी लगाई। रमन ने अपनी इस अनोखी पतंग का नाम रखा – “लाल परी”। लाल परी सचमुच बहुत सुंदर लग रही थी। रमन उसे देखकर फूला नहीं समा रहा था।
मैदान का मुकाबला
संक्रांति का दिन आ गया। सुबह से ही आसमान में ‘वो काटा’, ‘पकड़ो-पकड़ो’ का शोर गूंजने लगा था। छतें लोगों से पटी पड़ी थीं। हवा भी पतंग उड़ाने के लिए बिल्कुल अनुकूल थी। रमन अपनी “लाल परी” और मांझे की चरखी लेकर छत पर पहुंचा। दादाजी भी उसके साथ थे।
रमन ने धीरे से लाल परी को हवा में लहराया। दादाजी ने ढील दी और देखते ही देखते लाल परी हवा के झोंकों के सहारे आसमान की ओर बढ़ने लगी। वह बहुत ही स्थिर और गर्व से उड़ रही थी। रमन का दिल खुशी से नाच उठा। तभी मोहल्ले के सबसे माहिर पतंगबाज, रोहन की नीली पतंग रमन की पतंग के करीब आने लगी। रोहन की पतंग बहुत बड़ी और खतरनाक दिख रही थी।
धैर्य की परीक्षा
रोहन ने रमन की पतंग को काटने के लिए पेंच लड़ाना शुरू कर दिया। रमन घबरा गया। उसने दादाजी से कहा, “दादाजी, रोहन हमारी लाल परी को काट देगा! मैं मांझा खींच लेता हूँ।”
दादाजी ने रमन के कंधे पर हाथ रखा और शांत आवाज में कहा, “घबराओ मत, रमन। जब हवा तेज हो और विरोधी करीब हो, तो घबराना नहीं चाहिए। मांझे को जोर से मत खींचो, बल्कि थोड़ा ढील दो। पतंगबाजी में केवल ताकत नहीं, बल्कि धैर्य और सही समय पर ढील देना जीत दिलाता है।”
रमन ने दादाजी की बात मानी। उसने अपनी उंगलियों पर नियंत्रण रखा और मांझे को धीरे-धीरे ढील देना शुरू किया। रोहन की नीली पतंग ने कई बार हमला किया, लेकिन लाल परी अपनी जगह पर डटी रही। हवा के एक तेज झोंके के साथ ही रमन ने एक झटके से मांझा खींचा और… ‘वो काटा!’ का शोर पूरे मोहल्ले में गूंज उठा। रोहन की नीली पतंग कटकर हवा में गोते खाने लगी। रमन खुशी से उछल पड़ा।
जीवन की गहरी सीख
शाम ढलने लगी थी। आसमान में अब भी कुछ पतंगें उड़ रही थीं। तभी अचानक हवा का एक बहुत तेज झोंका आया। लाल परी हवा में डगमगाने लगी। रमन ने उसे संभालने की कोशिश की, लेकिन अचानक एक तेज खिंचाव के साथ मांझा बीच से टूट गया।
रमन की आंखों में आंसू आ गए। उसने देखा कि उसकी प्यारी “लाल परी” हवा में स्वतंत्र होकर धीरे-धीरे बादलों की ओर बढ़ रही थी। वह रोते हुए बोला, “दादाजी, मेरी लाल परी चली गई। वह हमेशा के लिए खो गई।”
दादाजी ने रमन को गले लगाया और आसमान की तरफ इशारा करते हुए कहा, “बेटा, दुखी मत हो। देखो, तुम्हारी लाल परी अब कितनी आजाद और खुश लग रही है। पतंग का असली काम पिंजरे में बंद रहना नहीं, बल्कि खुले आसमान की ऊंचाइयों को छूना है। कभी-कभी जीवन में किसी चीज को जाने देना ही उसकी असली खूबसूरती होती है। तुमने उसे खुद बनाया, उसे उड़ना सिखाया, यही तुम्हारी असली जीत है।”
रमन ने आंसू पोंछे और आसमान में उड़ती हुई लाल परी को देखा। वह सचमुच आजाद होकर बेहद खूबसूरत लग रही थी। रमन को समझ आ गया था कि जीत केवल पतंग को अपने पास रखने में नहीं, बल्कि उसे खुले दिल से उड़ते हुए देखने में भी है।
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