
महान मुगल सम्राट अकबर के दरबार में आए दिन कई तरह की बौद्धिक चर्चाएं होती रहती थीं। इन चर्चाओं में बादशाह अकबर अक्सर बीरबल की बुद्धिमानी और तार्किकता की परीक्षा लेते थे। बीरबल भी अपनी कुशाग्र बुद्धि और हाजिरजवाबी से हर बार बादशाह को चकित कर देते थे। एक दिन दरबार में एक बेहद अनोखा विषय छिड़ा। विषय था—”मनुष्य की सबसे बड़ी प्रेरणा और शक्ति क्या है?”
दरबार की अनोखी बहस
बादशाह अकबर का मानना था कि मनुष्य के लिए प्रेम, निष्ठा और धन ही सबसे बड़ी ताकत हैं। ये चीजें किसी भी इंसान से कोई भी काम करवा सकती हैं। अकबर ने गर्व से कहा, “बीरबल, इस दुनिया में वफादारी और पुरस्कार का लालच ही सबसे बड़ी शक्ति है। यदि किसी को उचित इनाम दिया जाए या उसकी वफादारी को ललकारा जाए, तो वह असंभव कार्य भी कर सकता है।”
बीरबल ने विनम्रतापूर्वक मुस्कुराते हुए सिर झुकाया और कहा, “जहाँपनाह! मैं आपके विचारों का आदर करता हूँ, लेकिन मेरा मानना कुछ अलग है। इस संसार में मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति और प्रेरक बल ‘डर’ (भय) है। जब मनुष्य के भीतर अपनी जान खोने या किसी बड़ी अनहोनी का डर पैदा होता है, तब वह ऐसी असाधारण शक्तियां प्रदर्शित करता है जो वह सामान्य परिस्थितियों में कभी नहीं कर सकता। डर इंसान से असंभव कार्य भी करवा देता है।”
बीरबल का तर्क और बादशाह की चुनौती
बादशाह अकबर को बीरबल की यह बात पसंद नहीं आई। उन्होंने कहा, “बीरबल, तुम हमेशा अजीब तर्क देते हो। डर तो इंसान को कमजोर और कायर बनाता है। वह भला किसी की शक्ति कैसे बन सकता है? क्या तुम अपनी इस बात को साबित कर सकते हो?”
बीरबल ने बिना किसी हिचकिचाहट के कहा, “जी हुजूर, मैं इसे बिल्कुल साबित कर सकता हूँ। बस मुझे इसके लिए तीन दिन का समय और आपकी अनुमति चाहिए।”
बादशाह अकबर ने तुरंत चुनौती स्वीकार कर ली और कहा, “ठीक है, बीरबल। तुम्हारे पास तीन दिन का समय है। यदि तुम यह साबित नहीं कर पाए कि ‘डर ही सबसे बड़ी शक्ति है’, तो तुम्हें दंड भुगतना होगा।”
बीरबल की योजना और आलसी शंभू
चुनौती स्वीकार करने के बाद बीरबल ने अपनी योजना पर काम करना शुरू कर दिया। वह एक ऐसे व्यक्ति की तलाश में निकल पड़े जो बेहद कमजोर, डरपोक और आलसी हो। काफी तलाश के बाद बीरबल को अपने ही राज्य में ‘शंभू’ नाम का एक युवक मिला।
शंभू अपनी सुस्ती के लिए पूरे इलाके में बदनाम था। वह दिनभर अपनी खाट पर पड़ा रहता था और छोटे से छोटा काम करने में भी उसे आलस आता था। यहाँ तक कि यदि उसके पास से कोई कुत्ता भी गुजर जाता, तो वह डर के मारे कांपने लगता था। शारीरिक रूप से भी वह बेहद कमजोर था और कभी दो कदम तेज नहीं चला था।
बीरबल ने शंभू को चुना और बादशाह अकबर को सूचित किया कि कल सुबह शाही बगीचे में वे अपनी बात साबित करेंगे।
जब सामने आया साक्षात काल
अगली सुबह, बादशाह अकबर, बीरबल और कुछ खास दरबारी शाही बगीचे में एकत्रित हुए। बीरबल ने शंभू को बगीचे के एक बड़े मैदान के बीचोबीच खड़ा कर दिया। शंभू डर के मारे थर-थर कांप रहा था, क्योंकि उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसे राजा के सामने क्यों खड़ा किया गया है।
तभी बीरबल ने एक सैनिक को इशारा किया। सैनिक ने शाही पिंजरे का दरवाजा खोल दिया, जिसमें से एक खूंखार, भूखा और दहाड़ता हुआ जंगली शिकारी कुत्ता बाहर निकल आया। वह कुत्ता सामान्य कुत्तों से कहीं अधिक बड़ा और भयानक था। जैसे ही कुत्ते ने मैदान में खड़े शंभू को देखा, वह उसकी तरफ तेजी से भौंकते हुए लपका।
शंभू ने जैसे ही उस भयानक यमराज रूपी कुत्ते को अपनी तरफ आते देखा, उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। मौत को एकदम करीब देखकर शंभू का सारा आलस, कमजोरी और डरपोकपन हवा हो गया। जीवन बचाने की तीव्र इच्छा ने उसके भीतर एक अदभुत ऊर्जा का संचार कर दिया।
डर की असली शक्ति का अहसास
शंभू इतनी तेज गति से भागा जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। वह हवा से बातें करने लगा। उसकी रफ्तार देखकर बादशाह अकबर और दरबारी अपनी उंगलियां चबाने लगे। शंभू ने भागते हुए रास्ते में आई पांच फीट ऊंची झाड़ियों की बाड़ को एक ही छलांग में पार कर लिया, जबकि सामान्य दिनों में वह एक छोटी नाली भी पार नहीं कर पाता था।
कुत्ता लगातार उसके पीछे भाग रहा था। मैदान के अंत में एक बहुत ऊंची दीवार थी। शंभू ने बिना सोचे-समझे अपनी पूरी ताकत लगाई और उस दीवार पर बंदर की तरह फुर्ती से चढ़ गया और दूसरी तरफ कूदकर अपनी जान बचाई।
जब कुत्ता हाफता हुआ दीवार के पास रुक गया, तब बीरबल के इशारे पर सैनिकों ने उसे वापस पिंजरे में बंद कर दिया। शंभू सुरक्षित था, लेकिन उसकी सांसें बहुत तेज चल रही थीं और वह पसीने से तर-बतर था।
कहानी से सीख
बीरबल मुस्कुराए और बादशाह अकबर की तरफ मुड़कर बोले, “जहाँपनाह! अब आप ही बताइए। शंभू हमारे राज्य का सबसे आलसी और शारीरिक रूप से कमजोर व्यक्ति है। यदि आप उसे सोने के सौ सिक्के भी देते, तो भी वह इतनी ऊंची दीवार कभी नहीं फांद पाता। लेकिन आज अपनी जान खोने के ‘डर’ ने उसके भीतर वह शक्ति पैदा कर दी, जो बड़े-बड़े धावकों में भी नहीं होती। इसलिए हुजूर, डर ही मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति और प्रेरणा है।”
बादशाह अकबर बीरबल के इस जीवंत उदाहरण को देखकर निरुत्तर हो गए। उन्होंने बीरबल की बुद्धिमत्ता की दिल खोलकर तारीफ की और उन्हें कीमती उपहार देकर सम्मानित किया। इस प्रकार बीरबल ने एक बार फिर साबित कर दिया कि व्यावहारिक ज्ञान और तार्किकता में उनका कोई सानी नहीं है।
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