
मुगल सल्तनत के शहंशाह जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर अपनी शानो-शौकत, कला-संस्कृति के प्रति प्रेम और अपने दरबार के नवरत्नों के लिए इतिहास में प्रसिद्ध हैं। अकबर को दुनिया की बेहतरीन और नायाब चीजों का बहुत शौक था। विशेष रूप से, उन्हें इत्र (सुगंधित तेल) का बहुत शौक था। उनके पास दुनिया के कोने-कोने से लाए गए दुर्लभ और कीमती इत्रों का एक बड़ा संग्रह था।
एक छोटी सी भूल और शहंशाह की शर्मिंदगी
एक ठंडी शाम, शहंशाह अकबर अपने महल के निजी कक्ष में बैठे आराम कर रहे थे। उनके सामने मेज पर कई बेशकीमती इत्र की बोतलें रखी थीं। पूरे कक्ष की हवा में गुलाब, चमेली और खस की मनमोहक खुशबू तैर रही थी। अकबर बड़े चाव से एक बेहद खास और दुर्लभ इत्र की शीशी खोलकर उसे अपने रेशमी वस्त्रों पर लगा रहे थे। यह इत्र इतना कीमती था कि इसकी एक-एक बूंद की कीमत सोने की अशर्फियों के बराबर थी।
इत्र लगाते समय, अचानक अकबर के हाथ से एक छोटी सी चूक हो गई। शीशी से इत्र की एक चमकीली बूंद नीचे संगमरमर के ठंडे फर्श पर गिर गई। वह बूंद फर्श पर फैलने ही वाली थी कि शहंशाह का ध्यान उस पर गया। बिना सोचे-समझे, अपनी स्वाभाविक मानवीय प्रवृत्ति के कारण, अकबर तुरंत फर्श की ओर झुके और अपनी उंगली से उस इत्र की बूंद को समेटने की कोशिश करने लगे, ताकि वह बर्बाद न हो और उसे वे अपने कपड़ों पर लगा सकें।
ठीक उसी क्षण, बीरबल किसी महत्वपूर्ण राजकीय कार्य के सिलसिले में बिना सूचना दिए अकबर के कक्ष में प्रवेश कर रहे थे। उन्होंने शहंशाह को फर्श से इत्र की एक बूंद उठाते हुए देख लिया।
जैसे ही अकबर की नजरें बीरबल से मिलीं, शहंशाह को अपनी इस हरकत पर बेहद शर्मिंदगी महसूस हुई। एक विशाल साम्राज्य का राजा, जिसके खजाने में अपार धन-दौलत थी, वह इत्र की एक मामूली बूंद के लिए इस तरह फर्श पर झुककर उसे समेट रहा था! अकबर को लगा कि बीरबल की नजरों में उनकी छवि एक कंजूस राजा की बन गई होगी।
अकबर का भव्य दिखावा
अकबर ने तुरंत अपनी उंगली फर्श से हटाई और बात को रफा-दफा करने की कोशिश की, लेकिन बीरबल के चेहरे की हल्की सी मुस्कान ने अकबर को बेचैन कर दिया। उस रात अकबर सो नहीं पाए। वे लगातार यही सोच रहे थे कि वे बीरबल के सामने खुद को वापस एक बड़ा दिलदार और उदार शहंशाह कैसे साबित करें।
अगले दिन सुबह, अकबर ने दरबार में एक बहुत बड़ी घोषणा की। उन्होंने शाही ढिंढोरा पिटवाया कि महल के मुख्य बगीचे के विशाल तालाब (हौज) को पूरी तरह से सबसे कीमती गुलाब जल और इत्र से भर दिया जाए। साथ ही, उन्होंने यह भी ऐलान किया कि राज्य की पूरी जनता इस तालाब से जितना चाहे उतना इत्र अपने घरों के लिए मुफ्त में ले जा सकती है।
देखते ही देखते महल का वह बड़ा तालाब सुगंधित इत्र से लबालब भर गया। चारों तरफ खुशबू फैल गई। जनता में खुशी की लहर दौड़ गई। लोग बड़े-बड़े बर्तन, घड़े और पीपे लेकर महल की ओर भागे और इत्र लूटने लगे।
अकबर अपने महल के ऊंचे झरोखे से गर्व के साथ यह नजारा देख रहे थे। बीरबल भी उनके पास ही खड़े थे। अकबर ने गर्व से अपनी छाती फुलाई और बीरबल की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए बोले, “बीरबल! देखा तुमने? हम कितने दरियादिल हैं। जो प्रजा हमसे प्यार करती है, उसके लिए हम इत्र के तालाब भी भरवा सकते हैं। क्या अब भी तुम्हें लगता है कि हमारे दिल में उदारता की कमी है?”
बीरबल का लाजवाब जवाब
बीरबल अकबर की मनःस्थिति को अच्छी तरह समझ रहे थे। वे जानते थे कि यह सारा तमाशा केवल उस एक बूंद इत्र को बचाने की शर्मिंदगी को मिटाने के लिए किया गया है।
बीरबल ने मुस्कुराते हुए अपना सिर झुकाया और बड़ी ही विनम्रता से कहा, “जहाँपनाह, आपकी उदारता की कोई सीमा नहीं है। पूरा जग आपकी इस दरियादिली का कायल है। लेकिन हुजूर, एक पुरानी कहावत है— ‘जो बूंद से जाए, वो हौजों से नहीं आती।’”
अकबर चौंक गए और बोले, “बीरबल, तुम्हारी इस बात का क्या मतलब है? जरा खुलकर समझाओ।”
बीरबल ने उत्तर दिया, “जहाँपनाह, गुस्ताखी माफ हो। मेरा तात्पर्य यह है कि जो मान-प्रतिष्ठा और छवि आपकी उस रात फर्श से इत्र की एक छोटी सी बूंद को बचाने की कोशिश में चली गई, उसे साबित करने के लिए आप चाहे इत्र के पूरे हौज (तालाब) भी खाली कर दें, वह छवि वापस नहीं आ सकती। मनुष्य की असली परीक्षा उसके एकांत के व्यवहार से होती है, न कि दुनिया को दिखाने के लिए किए गए बड़े-बड़े आयोजनों से।”
बीरबल की यह गहरी और तार्किक बात सीधे अकबर के दिल पर लगी। वे समझ गए कि दिखावे से कभी भी सच्चाई को छुपाया नहीं जा सकता। अकबर ने अपनी भूल स्वीकार की और हमेशा की तरह बीरबल की हाजिरजवाबी और बुद्धिमत्ता से प्रसन्न होकर उन्हें कीमती उपहार भेंट किए।
इत्र की एक बूंद कहानी से सीख (Moral of the Story)
अकबर और बीरबल की यह कहानी हमें सिखाती है कि बाहरी दिखावा कभी भी हमारी वास्तविक पहचान या हमारे स्वभाव को नहीं बदल सकता। मनुष्य का असली चरित्र उसके उन छोटे-छोटे कार्यों से प्रकट होता है जो वह अनजाने में या अकेले में करता है। ढोंग या दिखावे की उदारता से कभी भी वास्तविक सम्मान अर्जित नहीं किया जा सकता।
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